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पश्चिम बंगाल में अपराधियों पर पुलिस को पूरी छूट, बोले मंत्री दिलीप घोषराजनीति
23 अग॰ 2026, 9:41 pm (19 दिन पहले)· 2

पश्चिम बंगाल में अपराधियों पर पुलिस को पूरी छूट, बोले मंत्री दिलीप घोष

पश्चिम बंगाल के मंत्री दिलीप घोष ने कहा है कि राज्य में पुलिस को अपराधियों के खिलाफ सख्ती बरतने की पूरी छूट दी गई है और अब डराने-धमकाने की संस्कृति खत्म हो चुकी है।

पश्चिम बंगाल सरकार में पंचायत मंत्री और खड़गपुर सदर से विधायक दिलीप घोष ने रविवार को स्पष्ट किया कि राज्य प्रशासन आपराधिक तत्वों पर नकेल कसने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दो टूक कहा कि बंगाल की धरती पर अब भय का माहौल पैदा करने वाले तत्वों के लिए कोई स्थान नहीं बचा है।

अपने संबोधन में उन्होंने जोर देकर कहा कि पुलिस बल को अपराधियों के प्रति किसी भी तरह की नरमी न बरतने के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि खड़गपुर के इलाके में किसी भी माफिया या असामाजिक तत्व को पैर पसारने की इजाजत नहीं दी जाएगी और कानून का राज स्थापित किया जाएगा।

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अंतिम विकल्प के रूप में मुठभेड़ की बात

पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं पर तंज कसते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा कि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल के तौर-तरीकों को अब पीछे छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि पुलिस को कड़े कदम उठाने की खुली छूट दी गई है ताकि कानून व्यवस्था को पूरी तरह दुरुस्त किया जा सके। उन्होंने एक अहम बयान में कहा, "यदि अपराध गंभीर है और स्थिति की मांग है, तो पुलिस द्वारा मुठभेड़ का सहारा लिया जाना अंतिम विकल्प होगा।"

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से राजनीतिक सफर की शुरुआत

दिलीप घोष का राजनीतिक सफर जमीनी स्तर के संगठनों से होकर गुजरा है। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में की थी। इस दौरान उन्होंने लंबे अरसे तक सांगठनिक दायित्व निभाए और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह समेत देश के विभिन्न हिस्सों में महत्वपूर्ण संगठनात्मक काम संभाले। इसी वैचारिक और सांगठनिक पृष्ठभूमि ने उन्हें मुख्यधारा की सक्रिय राजनीति में एक मजबूत मुकाम दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

संगठन के लंबे अनुभव को पूंजी बनाते हुए उन्होंने वर्ष 2014 में भाजपा का दामन थामा और पश्चिम बंगाल के भीतर पार्टी संगठन को विस्तार देने के अभियान में जुट गए। दिसंबर 2015 में उन्हें पश्चिम बंगाल भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, जिसके बाद उनके नेतृत्व में पार्टी ने राज्य के चुनावी फलक पर तेजी से पैर पसारे। उनके सांगठनिक कार्यकाल के दौरान ही वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई, जिसने आगे चलकर बंगाल को राष्ट्रीय राजनीति के नक्शे पर भाजपा के लिए एक प्रमुख रणभूमि के रूप में स्थापित कर दिया।

प्रमुख चुनावी सफलताएं और वर्तमान जिम्मेदारियां

अपनी बेबाक कार्यशैली और आक्रामक राजनीतिक तेवर के लिए चर्चित दिलीप घोष ने कई बड़े चुनावी संघर्षों में जीत का स्वाद चखा है। उन्होंने वर्ष 2016 में खड़गपुर सदर निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा चुनाव में विजय हासिल की और इसके बाद वर्ष 2019 के आम चुनावों में मेदिनीपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। अपनी राजनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने वर्ष 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में खड़गपुर सदर सीट से एक बार फिर शानदार जीत दर्ज की। वर्तमान में वे राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री के पद पर आसीन हैं और पंचायती राज, ग्रामीण विकास, कृषि विपणन तथा पशु संसाधन विकास जैसे अहम विभागों की कमान संभाल रहे हैं।

सवाल-जवाब

दिलीप घोष वर्तमान में किस पद पर हैं?
दिलीप घोष पश्चिम बंगाल सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और खड़गपुर सदर से विधायक हैं।
पुलिस कार्रवाई को लेकर दिलीप घोष ने क्या मुख्य निर्देश दिए हैं?
उन्होंने पुलिस को अपराधियों के खिलाफ पूरी छूट देने और किसी भी तरह की नरमी न बरतने की बात कही है।
दिलीप घोष ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत किस संगठन से की थी?
उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के रूप में की थी।
उन्होंने किस वर्ष भाजपा की सदस्यता ली थी?
उन्होंने वर्ष 2014 में भाजपा का दामन थामा था।
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टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·18 दिन पहले

दिलीप घोष के इस बयान से पश्चिम बंगाल की राजनीति में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का मुद्दा और अधिक गहरा गया है। पुलिस को अपराधियों के खिलाफ खुली छूट और मुठभेड़ को अंतिम विकल्प बताने वाली यह आक्रामक रणनीति राज्य के आगामी राजनीतिक परिदृश्य और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिससे मानवाधिकार और कानून के शासन पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·18 दिन पहले

दिलीप घोष का यह बयान पश्चिम बंगाल की राजनीति में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर एक आक्रामक प्रशासनिक रुख को दर्शाता है। पुलिस को अपराधियों के खिलाफ खुली छूट देने और गंभीर मामलों में मुठभेड़ को अंतिम विकल्प बताने की यह रणनीति राज्य के राजनीतिक गलियारों में बहस तेज कर सकती है। आगामी चुनावों के मद्देनजर इस प्रकार के कड़े बयानों से न केवल प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव बढ़ेगा, बल्कि इससे राज्य के कारोबारी माहौल और कॉर्पोरेट निवेश पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि निवेशक हमेशा एक स्थिर और शांतिपूर्ण वित्तीय वातावरण को प्राथमिकता देते हैं।

Tanvi Desai@tanvi-desai·18 दिन पहले

एक मनोरंजन और मीडिया विश्लेषक के रूप में, इस प्रकार के आक्रामक राजनीतिक बयानों और 'एनकाउंटर' जैसी शब्दावली का असर केवल प्रशासनिक गलियारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह डिजिटल मीडिया और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर बनने वाली वेब सीरीज और क्राइम थ्रिलर कहानियों के कंटेंट को भी गहराई से प्रभावित करता है। इस तरह के राजनीतिक नैरेटिव अक्सर लोकप्रिय संस्कृति में 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' और कानून व्यवस्था पर आधारित फिक्शन के लिए एक नया रुझान पैदा करते हैं, जो मनोरंजन उद्योग के बिजनेस और दर्शकों की पसंद दोनों को बदल सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·19 दिन पहले

दिलीप घोष का यह बयान कि गंभीर अपराधों में पुलिस मुठभेड़ अंतिम विकल्प हो सकती है, राज्य में कानून-व्यवस्था की नीति पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। एक क्राइम रिपोर्टर के तौर पर, पुलिस को इस तरह की खुली छूट देना और मुठभेड़ों का जिक्र करना मानवाधिकार और कानूनी प्रक्रियाओं के दायरे पर गंभीर बहस छेड़ सकता है। आगामी समय में यह देखना होगा कि इस आक्रामक प्रशासनिक रुख का अपराधियों पर कितना असर पड़ता है और न्यायिक समीक्षा इस पर क्या रुख अपनाती है।

Rohan Verma@rohan-verma·19 दिन पहले

दिलीप घोष का यह बयान कि गंभीर मामलों में पुलिस मुठभेड़ अंतिम विकल्प हो सकती है, राज्य के राजनीतिक गलियारों में गरमागरम बहस का विषय बन गया है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में इस तरह के प्रशासनिक मॉडलों को सुरक्षा और अपराध नियंत्रण के चश्मे से देखा जाता रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में यह दृष्टिकोण पुलिस बल के राजनीतिकरण और मानवाधिकार के मोर्चे पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ज़मीनी स्तर पर इसका असर यह हो सकता है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव और बढ़ेगा, जिसका सीधा असर आगामी चुनावों और क्षेत्रीय राजनीति की दिशा पर पड़ेगा।

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