कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और रणनीति में एक बड़ा आंतरिक बदलाव साफ तौर पर उभर कर सामने आ रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी में वर्षों तक नीति निर्धारण और बड़े फैसलों के केंद्र में रहने वाले वरिष्ठ चेहरे अब पहले जैसी निर्णायक स्थिति में नजर नहीं आ रहे हैं। राजस्थान से लेकर पंजाब तक संगठनात्मक फैसलों में यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पार्टी के पुराने रणनीतिकारों के प्रभाव क्षेत्र में कमी आई है, जबकि नई पीढ़ी के प्रतिनिधियों को महत्वपूर्ण संगठनात्मक जवाबदेही सौंपी जा रही है। हाल ही में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के दौरान उभरे घटनाक्रम ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है कि संगठन के शीर्ष स्तर पर फैसलों की दिशा अब बदल चुकी है।
कार्यसमिति की बैठक में नीतीश कुमार के मुद्दे पर बहस
कांग्रेस कार्यसमिति की हालिया बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और विरोधी राजनीतिक दल के खिलाफ भावी रणनीति तैयार करने पर गहन विचार-विमर्श चल रहा था। इसी दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने 2024 में नीतीश कुमार द्वारा INDIA गठबंधन छोड़ने का विषय सामने रखा। दिग्विजय सिंह का तर्क था कि नीतीश कुमार को गठबंधन से बाहर जाने से रोका जाना चाहिए था, क्योंकि यदि वे साथ रहते तो देश की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर काफी अलग हो सकती थी।
इस सुझाव पर सोनिया गांधी ने तत्काल अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि नीतीश कुमार का समय पर गठबंधन से अलग होना ही बेहतर साबित हुआ, क्योंकि वे लगातार बाहर निकलने के रास्ते की तलाश में लगे हुए थे। बैठक के इस पूरे संवाद ने यह बात सार्वजनिक कर दी कि पार्टी के अनुभवी सलाहकारों की राय को अब नेतृत्व की तरफ से बिना किसी संकोच के परखा जा रहा है और पारंपरिक राजनीतिक समझ के मुकाबले मौजूदा जमीनी आकलन को तरजीह मिल रही है।
जी-23 समूह का कमजोर पड़ता असर
कुछ साल पहले कांग्रेस के भीतर जी-23 समूह की सक्रियता बेहद चर्चा का विषय बनी थी। उस समय गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा और कपिल सिब्बल सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के नेतृत्व और सांगठनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। उस दौर में राहुल गांधी की संगठनात्मक भूमिका को लेकर भी आंतरिक विरोध की आवाजें उठी थीं। उस समूह ने पार्टी के कामकाज को लेकर एक व्यापक बहस छेड़ दी थी।
हालांकि मौजूदा समय में उस समूह का राजनीतिक आधार पूरी तरह बिखर चुका है। गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल अब कांग्रेस से बाहर हैं, जबकि आनंद शर्मा भी पहले की तरह किसी केंद्रीय निर्णय प्रक्रिया में नजर नहीं आ रहे हैं। इस बदलते घटनाक्रम के बाद अब यदि पार्टी के भीतर असंतुष्टों का कोई नया समूह जैसे जी-23 या जी-25 तैयार होने का प्रयास भी करे, तो उसके लिए पहले जैसा राजनीतिक दबाव बना पाना संभव नहीं दिखता। कांग्रेस का सत्ता संतुलन अब पुराने असंतुष्टों के घेरे से बाहर निकल चुका है।
युवाओं और छात्रों से सीधा जुड़ाव: छात्रों की गूंज अभियान
पार्टी की नई कार्यशैली में राहुल गांधी का ध्यान पारंपरिक और भारी-भरकम रैलियों से हटकर युवाओं और विद्यार्थियों के साथ सीधे संवाद पर टिका हुआ है। ‘छात्रों की गूंज’ नामक अभियान इसी बदली हुई सोच का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है। इस अभियान के तहत कोटा, पुणे, प्रयागराज और इंदौर जैसे प्रमुख शैक्षणिक व प्रतियोगी परीक्षा केंद्रों में जाकर छात्रों के साथ सीधी चर्चाएं की जा रही हैं।
इन संवाद कार्यक्रमों में शिक्षा प्रणाली की कमियां, बेरोजगारी का संकट और पेपर लीक की घटनाओं जैसे गंभीर मुद्दों पर सीधे बातचीत की जा रही है। राहुल गांधी पारंपरिक मंचों से लंबा भाषण देने के बजाय युवाओं की आपबीती सुन रहे हैं और उनके सवालों के जवाब दे रहे हैं। इस शैली ने पार्टी के भीतर भी एक स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाले समय में चुनावी रणनीति और संगठन में नए चेहरों और युवा सोच को प्राथमिक स्थान मिलेगा।
पंजाब में सचिन पायलट को मिली अहम जिम्मेदारी
संगठनात्मक स्तर पर युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने का एक ठोस उदाहरण पंजाब कांग्रेस के हालिया घटनाक्रम में देखने को मिला है। पंजाब प्रदेश इकाई में लंबे समय से अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच वर्चस्व और मतभेद की स्थिति बनी हुई थी। दोनों गुटों के आपसी तनाव के चलते राज्य में सांगठनिक संतुलन साधना एक कठिन चुनौती बन चुका था। इस समस्या को सुलझाने के लिए पहले भूपेश बघेल को जिम्मेदारी दी गई थी।
बाद में पार्टी ने राजस्थान के युवा नेता सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी नियुक्त किया। पायलट ने वहां के विभिन्न गुटों, विधायकों और स्थानीय पदाधिकारियों के साथ सिलसिलेवार बातचीत की और जमीन से मिला पूरा फीडबैक हाईकमान के सामने रखा। उनकी रिपोर्ट के आधार पर ही अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने का कड़ा फैसला लिया गया। इस पूरे प्रकरण ने यह साबित किया कि जटिल आंतरिक विवादों को सुलझाने में भी अब नई पीढ़ी के नेताओं पर गहरा भरोसा जताया जा रहा है।
गहलोत और बघेल जैसे दिग्गजों के दायरे में बदलाव
कांग्रेस की राजनीति में अशोक गहलोत उन बड़े नेताओं में गिने जाते रहे हैं जिन्होंने संकटमोचक की भूमिका निभाई। चाहे राजस्थान का 2020 का सियासी संकट रहा हो या 2022 में मुख्यमंत्री पद को लेकर पैदा हुआ आंतरिक गतिरोध, गहलोत हर समय राष्ट्रीय स्तर के विमर्श में केंद्र बिंदु बने रहे। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद पर रहने के बाद भूपेश बघेल भी पार्टी संगठन में एक प्रभावशाली चेहरे के तौर पर स्थापित हुए।
इसके बावजूद जब पंजाब जैसी संवेदनशील राज्य इकाई के प्रबंधन की बात आई, तो भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट को आगे कर दिया गया। यह बदलाव अनुभवी नेताओं के राजनीतिक योगदान की समाप्ति नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि पार्टी हाईकमान अब जटिल जिम्मेदारियों में युवा नेताओं की भूमिका का दायरा लगातार बढ़ा रहा है। वरिष्ठ सलाहकारों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय पार्टी अब संगठनात्मक भविष्य की नई रूपरेखा तैयार करने में जुटी है।
फैसलों में राहुल गांधी की स्वायत्तता
इन तमाम संगठनात्मक बदलावों के बीच सबसे बड़ा संकेत यह मिल रहा है कि पार्टी के फैसले अब राहुल गांधी की प्राथमिकताओं के अनुरूप तय हो रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं की पारंपरिक सलाह अब आखिरी फैसला नहीं बनती। सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं को अग्रिम मोर्चे पर लाना और छात्रों के जमीनी मुद्दों को केंद्र में रखकर अभियान चलाना यह दर्शाता है कि पार्टी पुरानी परंपराओं से निकलकर नए राजनीतिक रास्तों पर आगे बढ़ रही है। इन घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संगठन की धुरी अब पूरी तरह राहुल गांधी की कार्यशैली और नई टीम के आसपास घूम रही है।



















