पंजाब के जालंधर जिले में स्थित डडोवाल गांव अकूत संपत्ति और गहरे सूनेपन का एक ऐसा अनूठा उदाहरण है जो किसी को भी हैरान कर सकता है। भारत के सबसे धनी और आलीशान गांवों की सूची में शुमार इस जगह पर करोड़ों रुपये की लागत से बनी भव्य कोठियां मौजूद हैं, लेकिन यह पूरी तरह से वीरान पड़ी हैं। गांव की चौड़ी और साफ-सुथरी सड़कें बिल्कुल किसी बड़े शहर का अहसास कराती हैं। यहां के हर शानदार घर के बाहर लोगों के बैठने के लिए विशेष रूप से सुंदर बेंच लगाई गई हैं, लेकिन उन पर वक्त बिताने वाला कोई नहीं है। इतना भारी निवेश करने के बावजूद इन आलीशान इमारतों में इंसानी चहल-पहल नदारद है और बंद पड़े विशाल कमरों में केवल धूल की मोटी परतें जमा हो रही हैं।
विदेशों की ओर पलायन का असर
इस अद्भुत लेकिन खाली पड़े गांव के पीछे की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाला भारी पलायन है। डडोवाल गांव के अधिकांश मूल निवासी अपना पुश्तैनी घर छोड़कर हमेशा के लिए अमेरिका, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम जैसे विकसित देशों में जाकर बस गए हैं। बेहतर आर्थिक भविष्य और शानदार करियर की तलाश में पीढ़ियों से लोग अपनी मिट्टी से दूर जा रहे हैं। हालांकि, अपनी जड़ों से उनका भावनात्मक जुड़ाव आज भी कायम है, जो इन आलीशान कोठियों के रूप में दिखाई देता है। यह भव्य घर उनकी विदेशी सफलता के प्रतीक हैं, भले ही वे साल भर में केवल चंद दिनों के लिए ही यहां रहने के लिए वापस आ पाते हों।
बिखरे हुए परिवार और छोटी मुलाकातें
इस पलायन की कहानी काफी जटिल और कई परतों वाली है। जहां एक तरफ बहुत से लोग उत्तरी अमेरिका और ब्रिटेन में बस गए हैं, वहीं गांव के कई अन्य निवासियों ने इटली में जाकर अपना शानदार करियर बनाया है। विशेषकर निर्माण और कंस्ट्रक्शन के व्यवसाय से जुड़े इन लोगों ने विदेशों में जमकर पैसा कमाया है। यह प्रवासी अपनी गाढ़ी कमाई डडोवाल भेजकर अपने सपनों का महल तैयार करवाते हैं। लेकिन इस वैश्विक बिखराव का सबसे दुखद पहलू यह है कि एक ही परिवार के सदस्य अलग-अलग महाद्वीपों में रहने को मजबूर हैं। यह विशाल कोठियां केवल तब गुलजार होती हैं जब परिवार के सदस्य किसी तरह समय निकालकर साल में बमुश्किल दो से चार दिन के लिए एक साथ मिल पाते हैं।
समृद्धि के पीछे छिपा हुआ गहरा दर्द
इन करोड़ों की इमारतों और स्पष्ट रूप से नजर आने वाली आर्थिक समृद्धि के पीछे एक गहरी और अनकही उदासी भी छिपी हुई है। विदेशों में जाकर भारी कमाई करने की इस अंधी दौड़ ने पूरे गांव को युवाओं और रौनक से महरूम कर दिया है। यहां पीछे छूट गए बुजुर्गों या दूर के रिश्तेदारों के लिए यह भव्य घर किसी काम के नहीं हैं। वे एक अंतहीन इंतजार में फंसे हुए हैं और अपने अपनों की एक झलक पाने के लिए बुरी तरह तरस रहे हैं। अपनों से दूर रहने का यह भावनात्मक दर्द इतना भारी है जिसे बाहर से देखकर महसूस नहीं किया जा सकता और दुनिया की कोई भी महंगी ईंट या पत्थर इस सूनेपन को नहीं भर सकता।
उप्पल भूपा और लावड़ा गांव का भी यही हाल
डडोवाल में दिखने वाली यह स्थिति इस पूरे क्षेत्र की एकमात्र घटना नहीं है। जालंधर के ही एक और प्रसिद्ध गांव उप्पल भूपा में भी बिल्कुल ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है, जहां की लगभग नब्बे फीसदी आबादी इस वक्त विदेशों में अपना जीवन बिता रही है। इसके अलावा लावड़ा गांव की जनसांख्यिकी भी पूरी तरह से बदल चुकी है। इन दोनों ही गांवों में गगनचुंबी और बेहद खर्चीले घर बने हुए हैं, लेकिन इनमें रहने के लिए एक भी सदस्य मौजूद नहीं है। इतने बड़े और आलीशान घरों की नियमित साफ-सफाई और देखभाल करने के लिए केयरटेकर ढूंढना भी अब एक बड़ी चुनौती बन गया है, जिसके कारण कई भव्य इमारतें अब धीरे-धीरे खस्ताहाल होने लगी हैं।
उप्पल भूपा की बॉलीवुड में पहचान
उप्पल भूपा गांव की इस अनोखी दृश्यता और यहां रची-बसी पलायन की संस्कृति ने अंततः भारतीय सिनेमा का भी ध्यान अपनी ओर खींचा। इस गांव को तब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली जब बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान की बहुचर्चित फिल्म 'डंकी' के कई अहम दृश्य यहीं की सड़कों और घरों में फिल्माए गए। फिल्म की मुख्य कहानी, जो लोगों द्वारा विदेश जाने के लिए अपनाए जाने वाले खतरनाक रास्तों के इर्द-गिर्द घूमती है, वह इस गांव के निवासियों की वास्तविक जिंदगी से पूरी तरह मेल खाती थी। इसी समानता के कारण फिल्म निर्माताओं ने अपनी कहानी के लिए इस गांव को एक आदर्श पृष्ठभूमि के रूप में चुना था।
छतों पर बनी हवाई जहाज वाली अनोखी टंकियां
बाकी अमीर गांवों की तुलना में उप्पल भूपा को जो चीज सबसे अलग बनाती है, वह है यहां की एक बेहद अजीबोगरीब वास्तुकला। यहां के आलीशान घरों की छतों पर सामान्य पानी की टंकियों के बजाय हवाई जहाज और बड़े समुद्री जहाजों के आकार की खास टंकियां बनाई गई हैं। वास्तुकला का यह दिलचस्प चलन आधिकारिक तौर पर साल उन्नीस सौ पचानवे में शुरू हुआ था, जिसने पूरे इलाके की पहचान को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। छतों पर बनी यह कलाकृतियां महज सजावट का सामान नहीं हैं, बल्कि यह समाज के लिए एक बड़ा संदेश होती हैं। अगर किसी घर के ऊपर हवाई जहाज वाली टंकी मौजूद है, तो यह इस बात का स्पष्ट प्रतीक है कि उस परिवार का कम से कम एक सदस्य स्थायी रूप से विदेश में बस चुका है।
इस 'विलेज ऑफ टैंक्स' के शिल्पकार
छतों पर बनी इन खास टंकियों की व्यापक लोकप्रियता के कारण ही उप्पल भूपा और लावड़ा को अब लोग 'विलेज ऑफ टैंक्स' के नाम से भी जानने लगे हैं। घर के मालिकों द्वारा इन डिज़ाइनों को चुनने के पीछे अलग-अलग कहानियां हैं। कुछ लोग इसे सिर्फ अपने एक अनोखे शौक के रूप में बनवाते हैं, जबकि कुछ अन्य निवासियों का गर्व से यह कहना है कि उन्होंने अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी हवाई जहाजों में सफर करते हुए बिताई है, इसलिए यह एविएशन थीम उनके दिल के बहुत करीब है। इन जटिल और विशाल टंकियों के निर्माण का मुख्य श्रेय स्थानीय स्तर पर काम करने वाले पिता-पुत्र की जोड़ी, आर्किटेक्ट राम लुभाया कौल और बलविंदर कौल को जाता है, जिन्होंने लोगों की इन अनोखी कल्पनाओं को हकीकत में बदलने का काम किया है।
नई पीढ़ी के सपने और विदेश जाने की होड़
गांव में खाली पड़े आलीशान महलों के वीरान होने के बावजूद, यहां के युवाओं में विदेश जाने की ललक जरा भी कम नहीं हुई है। इन गांवों में बड़ी हो रही नई पीढ़ी का अपने पुश्तैनी घरों में रुकने या यहां कोई काम करने का कोई इरादा नहीं है। इसके बजाय, यह युवा दिन-रात विभिन्न कोचिंग संस्थानों में जाकर पढ़ाई कर रहे हैं और आईईएलटीएस जैसी परीक्षाओं की कड़ी तैयारी में जुटे हैं। उनके जीवन का भी एकमात्र लक्ष्य अपने पूर्वजों की तरह भारत छोड़कर ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में स्थायी रूप से बसना है, जिससे यह साफ होता है कि प्रवास और खाली कोठियों का यह चक्र भविष्य में भी ऐसे ही चलता रहेगा।




















