राजस्थान के बारां जिले में अन्नदाताओं की मांगों और समस्याओं के समाधान को लेकर अनिश्चितकालीन अनशन पर डटे किसान नेता नरेश मीणा की शारीरिक स्थिति नौवें दिन बेहद नाजुक हो गई है। अपने पैतृक गांव में भूख हड़ताल पर बैठे नरेश मीणा ने लंबे समय से अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया है, जिसके चलते उनका शरीर तेजी से कमजोर पड़ता जा रहा है। चिकित्सकों और मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार उनके रक्त में शर्करा का स्तर असामान्य रूप से नीचे चला गया है, जिसके साथ ही उन्हें लगातार पानी की उल्टियां भी हो रही हैं। शारीरिक जटिलताओं के गंभीर स्तर पर पहुंचने के बावजूद किसान नेता का संकल्प अडिग बना हुआ है और उन्होंने अपना आंदोलन वापस लेने से पूरी तरह मना कर दिया है।
लगातार घटता वजन और गंभीर डिहाइड्रेशन का खतरा
लंबे समय तक भुखमरी की स्थिति में रहने के कारण नरेश मीणा के शरीर के अहम मानकों पर सीधा असर पड़ा है। भूख हड़ताल के सातवें दिन तक उनका वजन 80 किलोग्राम से गिरकर 72 किलोग्राम दर्ज किया गया था, यानी केवल एक सप्ताह के भीतर आठ किलो वजन कम हो चुका था। अनशन के नौवें दिन तक उनके भार में यह गिरावट बिना थमे जारी रही है। भोजन न मिलने की स्थिति में शरीर की ऊर्जा पूरी तरह चुकने लगी है और अब पानी की उल्टियां शुरू होने से शरीर में तरलता यानी डिहाइड्रेशन का अत्यधिक गंभीर जोखिम पैदा हो गया है। चिकित्सा विशेषज्ञों की दृष्टि से ऐसी अवस्था में लंबे समय तक रहना शरीर के आंतरिक अंगों के लिए गंभीर जटिलताएं उत्पन्न कर सकता है।
ग्रामीणों और समर्थकों की समझाइश रही बेअसर
पैतृक गांव में एकत्र हुए उनके समर्थक और क्षेत्रीय ग्रामीण नरेश मीणा की शारीरिक स्थिति को देखकर गहरे तनाव में हैं। आंदोलन स्थल पर मौजूद ग्रामीण लगातार उनसे विनती कर रहे हैं कि वे इस आमरण अनशन को तत्काल समाप्त कर दें अथवा स्थगित कर पहले डॉक्टरी इलाज लें। ग्रामीणों का तर्क है कि किसानों के हितों की रक्षा और उनकी मांगों की लड़ाई अत्यंत महत्वपूर्ण है, परंतु संघर्ष जारी रखने के लिए जीवन और स्वास्थ्य का सुरक्षित रहना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। गांव के बुजुर्गों और प्रमुख लोगों ने उन्हें मनाने के कई प्रयास किए, लेकिन नरेश मीणा अपने निर्णय पर पूरी दृढ़ता के साथ कायम हैं।
किसानों की समस्याओं के समाधान पर अडिग रुख
नरेश मीणा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जब तक किसानों की वास्तविक समस्याओं का निराकरण नहीं हो जाता और उनकी मांगों पर कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आता, तब तक वह अनशन स्थल से एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे। आंदोलनकारी नेता का यह स्पष्ट मानना है कि किसानों के अधिकारों की लड़ाई को बीच रास्ते में नहीं छोड़ा जा सकता। नौवें दिन भी धरना जारी रहने से गांव में गहमागहमी का माहौल बना हुआ है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि किसानों की इन मांगों के संदर्भ में क्या प्रशासनिक या आधिकारिक पहल की जाती है और बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।


















