राजस्थान के जालोर शहर से तकरीबन 10 किलोमीटर दूर कानीवाड़ा गांव में स्थित पातालेश्वर हनुमानजी का धाम श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस मंदिर की प्रसिद्धि न केवल इसके सैकड़ों साल पुराने इतिहास से जुड़ी है, बल्कि यहां स्थापित पवनपुत्र की दिव्य प्रतिमा से जुड़ी अनोखी मान्यताएं भी लोगों को अचंभित करती हैं। स्थानीय जनश्रुति के मुताबिक, मंदिर के गर्भगृह में मौजूद हनुमानजी की यह प्रतिमा किसी मनुष्य द्वारा गढ़ी या स्थापित नहीं की गई है, बल्कि यह स्वयं धरती चीरकर बाहर आई थी। पाताल लोक से अपने आप प्रकट होने के कारण ही इस पावन विग्रह को स्वयंभू पातालेश्वर हनुमानजी के नाम से पुकारा जाता है।
मेवाड़ से मारवाड़ तक का ऐतिहासिक सफर और दिव्य संकेत
मंदिर की सेवा परंपरा से जुड़े पुजारी हस्तिमल गर्ग के अनुसार, इस पवित्र स्थल का इतिहास कई पीढ़ियों पुरानी एक ऐतिहासिक घटना से जुड़ा हुआ है। सदियों पहले जब उनके पूर्वज मेवाड़ अंचल से मारवाड़ की ओर प्रस्थान कर रहे थे, उस समय उनके एक घनिष्ठ मित्र ने उन्हें भक्ति भाव से हनुमानजी का एक स्वरूप भेंट किया था। पूर्वज ने मन में संकोच व्यक्त करते हुए पूछा कि वे इस दिव्य स्वरूप को अपने साथ इतनी लंबी यात्रा पर किस तरह संभाल कर ले जा सकेंगे। तब उन्हें यह आश्वस्त किया गया था कि संकटमोचन हनुमान जमीन के ऊपर की यात्रा में भी उनके साथ रहेंगे और पाताल की गहराई में भी उनका साथ निभाएंगे। यह परिवार पहले से ही पाताल में मौजूद एक कुएं के भीतर हनुमानजी की आराधना करता आ रहा था, जिससे उनकी यह अटूट निष्ठा पहले से जुड़ी हुई थी।
जमीन के भीतर समाने और खुदाई रोकने का रहस्य
सफर के दौरान जब वे रात्रि विश्राम के लिए कानीवाड़ा पहुंचे, तो रात के समय उनके साथ लाई गई वह पवित्र वस्तु अचानक धरती के भीतर समा गई। सुबह जब उन्होंने उस पावन विग्रह को गायब देखा, तो उस स्थान पर मिट्टी हटाकर खोजबीन शुरू की गई। जैसे-जैसे लोग उस जगह की खुदाई करते गए, वह वस्तु और अधिक गहराई में धंसती चली गई। उसी दौरान पूर्वजों को एक दैवीय संदेश और स्पष्ट संकेत मिला कि उस स्थान पर और अधिक खुदाई करने की कतई आवश्यकता नहीं है। संकेत में यह कहा गया कि मुझे खोदो मत, मैं यहीं रहूंगा और इसी जगह प्रकट होऊंगा। इसके कुछ समय बाद उसी पावन भूमि से बालाजी महाराज स्वयंभू स्वरूप में धरातल पर प्रकट हो गए, जिसके बाद से उन्हें पातालेश्वर हनुमानजी नाम से पूजा जाने लगा।
छत न बनने के पीछे का चमत्कार और धार्मिक मान्यता
इस धाम से जुड़ी सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि करीब 800 साल पुराना इतिहास होने के बावजूद गर्भगृह में हनुमानजी की मूर्ति के ऊपर आज तक कोई पक्की छत नहीं बन पाई है। जानकारों के अनुसार, बीते दशकों और सदियों में कई श्रद्धालुओं तथा कारीगरों ने प्रतिमा के ऊपर मजबूत छत डालने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन हर बार उनका प्रयास विफल साबित हुआ और निर्माण कार्य कभी पूरा नहीं हो सका। ग्रामीणों और पुजारियों का दृढ़ विश्वास है कि स्वयं प्रकट हुए बालाजी किसी भी प्रकार के भौतिक बंधन या चारदीवारी में बंधकर नहीं रहना चाहते हैं। यही वजह है कि आज भी यह दिव्य प्रतिमा सीधे नीले आसमान के नीचे विराजित है और धूप, बारिश तथा हवा के बीच बिना किसी आवरण के साक्षात दर्शन देती है।
मंगलवार और शनिवार को उमड़ती है भारी भीड़
पातालेश्वर धाम में सप्ताह के दो दिन, विशेषकर मंगलवार और शनिवार को श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब देखने को मिलता है। इन दोनों पावन दिनों पर दूर-दराज के इलाकों से लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर पैदल यात्रा करते हुए दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते हैं। इन अवसरों पर मंदिर समिति और पुजारियों द्वारा पातालेश्वर हनुमानजी का अत्यंत मनोहारी और विशेष श्रृंगार किया जाता है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि जो भी भक्त सच्चे हृदय से इस खुले प्रांगण में आकर अपनी अर्जी लगाता है, पाताल से प्रकट हुए बालाजी महाराज उसके जीवन के सारे संकट हर लेते हैं।


















