राजस्थान के भरतपुर स्थित भोंडा गांव में स्टोन क्रशर के रास्ते और जमीन को लेकर चल रहे टकराव ने खूनी संघर्ष का रूप ले लिया। पूर्व भाजपा विधायक अतर सिंह भड़ाना की उग्र भीड़ द्वारा लाठियों और लोहे की रॉड से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। करीब 12 साल से धधक रहे इस विवाद में क्रशर के ट्रकों की आवाजाही, चरागाह मार्ग की रुकावट और प्राकृतिक जलधारा का अवरोध प्रमुख वजह बनकर सामने आए हैं। 11 अक्टूबर की शाम अचानक हालात बेकाबू हो गए, जिसके बाद भीड़ ने क्रशर परिसर पर धावा बोल दिया। वारदात के बाद इलाके में भारी तनाव फैल गया और कार्रवाई के डर से गांव के ज्यादातर पुरुष इलाका छोड़कर चले गए हैं। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है और अब तक पांच लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।
12 साल पुराना क्रशर विवाद और ग्रामीणों की आपत्तियां
भोंडा क्षेत्र में पत्थर निकालने की खदानें वर्ष 1997 से संचालित की जा रही थीं। वर्ष 2012 में अतर सिंह भड़ाना ने इलाके की एक स्टोन क्रशर यूनिट में साझेदारी हासिल की थी। इसके बाद से ही स्थानीय ग्रामीणों, विशेष रूप से महिलाओं ने इस इकाई के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। ग्रामीणों का मुख्य आरोप था कि क्रशर यूनिट से निकलने वाले भारी पत्थर लदे ट्रक उनके मवेशियों के चरागाह तक जाने वाले पारंपरिक मार्ग को पूरी तरह रोक देते हैं। इसके अलावा क्रशर गतिविधियों के कारण क्षेत्र की प्राकृतिक जलधारा का प्रवाह भी बाधित हो गया था। इस समस्या को लेकर ग्रामीणों ने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया था और कानूनी याचिका दायर की थी। स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि पूर्व विधायक और ग्रामीणों के बीच बीते एक दशक से अधिक समय से लगातार तनातनी चल रही थी।
11 अक्टूबर की शाम का हिंसक घटनाक्रम
मामले में दर्ज कराई गई एफआईआर के विवरण के अनुसार, 11 अक्टूबर की शाम लगभग 6 से 7 बजे के बीच 100 से अधिक लोगों का समूह हथियारों के साथ मौके पर पहुंचा। इस भीड़ के हाथों में लाठियां, लोहे की रॉड, कुल्हाड़ियां और बंदूकें थीं। भड़ाना की पत्नी कमलेश के अनुसार, हमले की शुरुआत होते ही उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए पहली मंजिल पर बने कमरे में खुद को बंद कर लिया। हमलावरों ने पूर्व विधायक को चारों तरफ से घेर लिया और उनके सिर, पसलियों, छाती, हाथ, पैर और पीठ पर लाठियों से बेरहमी से वार किए। लगातार हो रहे प्रहारों से भड़ाना का सिर फट गया और अत्यधिक खून बहने की वजह से वह मौके पर ही अचेत हो गए।
परिसर में तोड़फोड़, आगजनी और फायरिंग के दावे
कमलेश को निशाना बनाने के लिए हमलावरों ने कमरे का मुख्य दरवाजा तोड़ने की भरपूर कोशिश की, परंतु वे अंदर दाखिल नहीं हो सके। इसके पश्चात उपद्रवियों ने परिसर में स्थित उस शेड में आग लगा दी जहां मजदूर रहते थे और मशीनरी रखी गई थी। वहां मौजूद भारी क्रशर मशीनों में भी व्यापक तोड़फोड़ की गई। शेड में मौजूद कर्मी आग की लपटें तेजी से फैलने से ठीक पहले जान बचाकर बाहर भागने में सफल रहे। दूसरी तरफ, स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि पहले भड़ाना की ओर से गोलीबारी की गई थी, जिसके आक्रोश में यह हमला हुआ। हालांकि पुलिस जांच में मौके पर किसी भी तरह की गोलीबारी या कारतूस के साक्ष्य नहीं मिले हैं। वैर थाना प्रभारी धीरेंद्र बासवाल ने स्पष्ट किया कि सूचना मिलने के बाद पुलिस तुरंत रवाना हुई, लेकिन अंधेरा होने और रास्ते की बदहाली के कारण घटनास्थल तक पहुंचने में समय लगा।
घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया और पुरानी एफआईआर
वारदात के दो दिन बीत जाने के बाद भी घटनास्थल पर हिंसा की भयावह तस्वीर दिखाई दे रही थी। क्रशर परिसर में टूटी हुई मशीनों के कलपुर्जे, बिखरे हुए कांच और जले हुए बिस्तरों के अवशेष फैले थे। जिस जगह भड़ाना को पीटा गया, वहां जमीन पर खून के गहरे धब्बे मौजूद थे। परिसर की सुरक्षा के लिए तीन निजी गार्ड तैनात किए गए थे। परिजनों ने पुलिस प्रशासन को सूचित किया है कि वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग जल्द ही जांच अधिकारियों को सौंप दी जाएगी। भरतपुर के पुलिस अधीक्षक राजेश मीना ने जानकारी दी कि भड़ाना और स्थानीय ग्रामीणों के बीच पिछले कई वर्षों में एक-दूसरे के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज कराए जा चुके थे। इनमें से कई मामलों में पुलिस पहले ही न्यायालय में आरोप पत्र पेश कर चुकी है।
घाटरी की जांच रिपोर्ट और सिलिकोसिस का गंभीर खतरा
भोंडा से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित घाटरी गांव में भी स्टोन क्रशर का विवाद पुराना है। वर्ष 2015 में राज्य सरकार ने स्टोन क्रशर के पर्यावरणीय और स्वास्थ्य प्रभावों का आकलन करने के लिए पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। उस समिति की आधिकारिक रिपोर्ट में उजागर हुआ था कि अधिकांश क्रशर बस्तियों से केवल 500 मीटर की दूरी पर चलाए जा रहे थे, जबकि नियमों के तहत यह न्यूनतम दूरी कम से कम 1,500 मीटर होनी अनिवार्य है। इस रिपोर्ट के करीब 11 वर्ष बाद भी पूरे क्षेत्र में अवैध खनन और गंभीर बीमारियों का प्रकोप थमने का नाम नहीं ले रहा है। घाटरी के निवासियों का कहना है कि यदि सारे नियम पूरे थे तो क्षेत्र के इतने सारे लोग सिलिकोसिस जैसी असाध्य और घातक बीमारी की चपेट में क्यों आ रहे हैं।
राजनीतिक विरोध और अतर सिंह भड़ाना का सफर
चरागाह भूमि पर कथित अवैध खनन के मुद्दे पर करौली-धौलपुर की सांसद संजना जाटव ने भी कड़ा रुख अपनाया था और भूख हड़ताल की थी। सांसद ने सोशल मीडिया पर भड़ाना के खिलाफ बयान जारी करते हुए आरोप लगाया था कि सत्ताधारी भाजपा सरकार के संरक्षण में यह सब फल-फूल रहा है। इस विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस के कई प्रमुख नेता भी शामिल हुए थे। दूसरी ओर, भरतपुर के जिला कलेक्टर कुमार उल जमान ने इलाके में चल रहे अवैध खनन पर कोई भी सार्वजनिक टिप्पणी करने से मना कर दिया। भड़ाना के राजनीतिक जीवन पर नजर डालें तो वह वर्ष 2003 से 2008 तक बयाना विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए थे। बाद के वर्षों में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की कोशिश की थी, लेकिन सफलता न मिलने पर वह पुनः भाजपा में शामिल हो गए थे। पुलिस अब क्रशर संचालन, पुरानी रंजिश और भीड़ के हमलों की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है।

















