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माउंट आबू के अचलगढ़ में चट्टान तराशकर बना मां काली का सिद्ध मंदिर, जहां कभी मालवा नरेश ने ली थी समाधि जैसी दीक्षाराजस्थान
15 अक्तू॰ 2026, 8:14 am (2 घंटे पहले)· 0

माउंट आबू के अचलगढ़ में चट्टान तराशकर बना मां काली का सिद्ध मंदिर, जहां कभी मालवा नरेश ने ली थी समाधि जैसी दीक्षा

राजस्थान के माउंट आबू स्थित अचलगढ़ की दुर्गम पहाड़ियों में करीब 1450 मीटर की ऊंचाई पर प्राकृतिक गुफा में मां काली का दिव्य मंदिर स्थित है, जहां कभी राजा गोपीचंद ने राजपाठ त्यागकर 12 साल घोर साधना की थी।

राजस्थान के इकलौते पर्वतीय पर्यटन स्थल माउंट आबू के अचलगढ़ इलाके में अरावली पर्वत शृंखलाओं के बीच एक बेहद पावन और रहस्यमयी प्राकृतिक गुफा मौजूद है। समुद्र तल से तकरीबन 1450 मीटर की ऊंचाई पर बसी यह प्राकृतिक कंदरा अपनी नैसर्गिक छटा के साथ-साथ गहन आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पहचान संजोए हुए है। इस दुर्गम स्थल पर स्थित सिद्ध पीठ मां काली के दर्शन करने के लिए नवरात्रि के पावन दिनों में देश ही नहीं, बल्कि विदेशी सैलानी और श्रद्धालु भी कठिन चढ़ाई पार करके यहां माथा टेकने पहुंचते हैं।

राजपाठ त्यागकर राजा गोपीचंद ने गुजारे थे 12 कठिन वर्ष

इस पवित्र स्थान से जुड़ी ऐतिहासिक परंपरा कई शताब्दियों पुरानी है। प्रचलित मान्यताओं और स्थानीय गाथाओं के मुताबिक, लगभग 550 से 600 साल पहले मालवा क्षेत्र के शासक राजा गोपीचंद ने सांसारिक सुख-सुविधाओं और पूरे राजकाज से मुंह मोड़ लिया था। मोह-माया छोड़कर उन्होंने संन्यास का मार्ग चुना और अचलगढ़ की इसी एकांत प्राकृतिक गुफा को अपना तपस्या स्थल बनाया। यहां रहकर उन्होंने लगातार 12 वर्षों तक अत्यंत कठोर साधना की थी। मान्यता है कि उनकी अनन्य भक्ति और घोर तप से प्रसन्न होकर स्वयं मां काली ने इस गुफा में उन्हें साक्षात दर्शन दिए थे।

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राजा भर्तृहरि के महल और मंदाकिनी कुंड से जुड़ा आध्यात्मिक नाता

इस साधना स्थल का सीधा जुड़ाव राजा गोपीचंद के मामा, विख्यात राजा भर्तृहरि से भी है। गुफा के ठीक सामने पहाड़ी की तलहटी में स्थित ऐतिहासिक मंदाकिनी कुंड के पास राजा भर्तृहरि का प्राचीन महल आज भी देखा जा सकता है। दोनों मामा और भांजे ने सांसारिक ऐश्वर्य को तिलांजलि देकर अरावली की इन शांत वादियों में ईश्वर की आराधना और वैराग्य का जीवन अपनाया था। आज भी इस पवित्र मंदिर परिसर में राजा गोपीचंद की प्रतिमा पूरी श्रद्धा के साथ स्थापित है, जो उनके समर्पण और वैराग्य की गवाही देती है।

जीवित चट्टान पर उकेरा गया मां काली का साढ़े छह फीट ऊंचा स्वरूप

गुफा के गर्भगृह में स्थापित मां काली की प्रतिमा अपने आप में शिल्प और आस्था का अनूठा संगम है। यहां माता का लगभग 6.5 फीट ऊंचा दिव्य विग्रह स्थापित है। इस प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे किसी अलग शिला से गढ़कर नहीं रखा गया, बल्कि जिस प्राकृतिक शैल पर मां का प्राकट्य माना गया, उसी मूल जीवंत चट्टान पर सूक्ष्म नक्काशी करके इस स्वरूप को तराशा गया है।

कड़कड़ाती धूप में भी भीतर रहती है कुदरती ठंडक

गुफा का भीतरी मार्ग काफी संकरा और बेहद शांत है। अचलगढ़ के पर्वतीय क्षेत्र में जब बाहर तेज धूप और भीषण गर्मी का असर होता है, तब भी इस गुफा के भीतर आश्चर्यजनक रूप से शीतलता का अहसास बना रहता है। यह प्राकृतिक ठंडक साधकों को ध्यान और मानसिक शांति की गहरी अनुभूति कराती है। इसके अलावा, मंदिर के ऊपरी हिस्से पर मेवाड़ के प्रतापी शासक महाराणा कुंभा द्वारा बनवाया गया ऐतिहासिक अचलगढ़ दुर्ग और मां चामुंडा देवी का पुरातन मंदिर भी मौजूद है, जहां से सैलानियों को अरावली के विहंगम दृश्य देखने को मिलते हैं।

सवाल-जवाब

अचलगढ़ की यह पवित्र गुफा समुद्र तल से कितनी ऊंचाई पर स्थित है?
यह प्राकृतिक गुफा राजस्थान के माउंट आबू क्षेत्र में समुद्र तल से लगभग 1450 मीटर की ऊंचाई पर अरावली पहाड़ियों में स्थित है।
राजा गोपीचंद ने इस गुफा में कितने वर्षों तक तपस्या की थी?
मालवा के राजा गोपीचंद ने राजपाठ त्यागने के बाद इस गुफा में लगातार 12 वर्षों तक कठिन तपस्या की थी।
गुफा के भीतर स्थापित मां काली की प्रतिमा की क्या विशेषता है?
मां काली की लगभग 6.5 फीट ऊंची प्रतिमा किसी अलग पत्थर से नहीं बनाई गई है, बल्कि प्राकृतिक रूप से मौजूद जीवित चट्टान पर ही बारीक नक्काशी करके उकेरी गई है।
गुफा के पास राजा भर्तृहरि से जुड़ा कौन सा स्थल मौजूद है?
पहाड़ी की तलहटी में स्थित प्रसिद्ध मंदाकिनी कुंड के पास राजा गोपीचंद के मामा, राजा भर्तृहरि का प्राचीन महल स्थित है।
मंदिर के ऊपरी भाग में कौन से ऐतिहासिक स्थल स्थित हैं?
मंदिर के ऊपर मेवाड़ के शासक महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित अचलगढ़ किला और मां चामुंडा देवी का प्राचीन मंदिर स्थित है।
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टिप्पणियाँ 5

Priya Sharma@priya-sharma·9 मिनट पहले

माउंट आबू की उस गुफा में जाने का मौका मुझे पिछले साल मिला था। बाहर धूप चाहे कितनी भी तेज हो, अंदर जाते ही एकदम ठंडी हवा और गजब की शांति मिलती है। राजा गोपीचंद की कहानी वहां सचमुच महसूस होती है।

Ravikash Gupta@ravikash·28 मिनट पहले

माउंट आबू की इस गुफा में राजा गोपीचंद के 12 साल तक तपस्या करने वाली बात पर पूरा यकीन करना मुश्किल सा लगता है, क्योंकि उस दौर में इतनी दुर्गम चढ़ाई पर अकेले रहना इंसान के लिए नामुमकिन जैसा रहा होगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·27 मिनट पहले

रविकेश जी, बात सही है आपकी, लेकिन वो दौर राजा-महाराजाओं और साधु-संतों का था, उनके लिए ऐसे कठिन रास्ते और गुफाएं आम बात रही होंगी।

Rohan Verma@rohan-verma·47 मिनट पहले

माउंट आबू की इस गुफा के बारे में पढ़कर इतिहास और अध्यात्म का यह अनूठा मेल बहुत आकर्षित कर रहा है। अरावली की इन पहाड़ियों में राजा गोपीचंद की तपस्या की कहानी और प्राकृतिक चट्टान पर बनी मां काली की मूर्ति के दर्शन करने का मन सचमुच अचलगढ़ जाने को मचल उठा है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·46 मिनट पहले

रोहन भाई, कहानी दिलचस्प है पर 12 साल तपस्या वाली बात पर थोड़ा शक होता है। इतने साल गुफा में बिना आधुनिक सुख-सुविधाओं के रहना आम इंसान के बस की बात नहीं।

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