पश्चिमी राजस्थान के जालोर जिले में इस मानसूनी सीजन में बादलों की बेरुखी ने काश्तकारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सामान्य से कम हुई बरसात के चलते परंपरागत फसलों पर संकट गहरा गया है, मगर विपरीत मौसमी परिस्थितियों में भी अरंडी यानी कैस्टर की फसल धरतीपुत्रों के लिए तारणहार बनकर सामने आई है। भूजल के घटते स्तर और नहरी पानी की तंगी के बीच जिले के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अरंडी की बुवाई को प्राथमिकता दे रहे हैं, क्योंकि यह नकदी फसल बेहद सीमित संसाधनों और कम लागत में भी संतोषजनक उत्पादन देने की क्षमता रखती है।
गहरी जड़ों का सुरक्षा कवच और नमी खींचने की कुदरती खूबी
अरंडी के पौधे की जैविक बनावट इसे सूखे से जूझने वाले शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाकों के लिए पूरी तरह अनुकूल बनाती है। इस पौधे की मूसला जड़ें जमीन के काफी नीचे तक गहराई में प्रवेश कर जाती हैं। इस प्राकृतिक गुण के चलते फसल सतह के नीचे मौजूद नमी और पोषक तत्वों को आसानी से सोख लेती है। जिन खेतों में सिंचाई के नियमित स्रोत उपलब्ध नहीं हैं या जहां केवल एक-दो बार ही पानी देने की सहूलियत है, वहां भी अरंडी के पौधे लंबे समय तक हरे-भरे बने रहते हैं और मुरझाते नहीं हैं।
सिंचाई प्रबंधन और जलभराव से बचाव की जरूरत
कम पानी की फसल होने का यह कतई अर्थ नहीं है कि अरंडी को सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक पौधे की वानस्पतिक वृद्धि के शुरुआती दौर और फलियों में बीज पकने की महत्वपूर्ण अवस्था में खेत में मुनासिब नमी का होना बेहद जरूरी है। इसके विपरीत, अधिक वर्षा होने अथवा खेत में पानी ठहरने की स्थिति में फसल को भारी क्षति पहुंच सकती है। यदि जड़ों के पास जलभराव हो जाए तो पौधे सूखने लगते हैं, इसलिए खेत में समुचित जलनिकासी सुनिश्चित करते हुए संतुलित सिंचाई व्यवस्था रखनी होती है।
औद्योगिक मांग और बहुआयामी उपयोग से मिलता है बेहतर बाजार भाव
अरंडी की खेती केवल पैदावार तक सीमित न रहकर एक मुनाफेदार व्यावसायिक सौदा मानी जाती है। इसके बीजों की पेराई से निकलने वाला तेल व्यापक औद्योगिक महत्व रखता है। प्रसाधन सामग्री, उच्च गुणवत्ता वाले साबुन, औद्योगिक ग्रीस, स्नेहक और कई तरह के विनिर्मित उत्पादों में अरंडी के तेल का कच्चे माल के तौर पर बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। स्थानीय और राष्ट्रीय मंडियों में इस तेल और इसके बीजों की निरंतर मांग बनी रहती है, जिससे किसानों को उपज का वाजिब और आकर्षक दाम हासिल होता है। जालोर के किसान मौसम के उतार-चढ़ाव और जिंसों के बाजार भाव पर नजर रखते हुए अरंडी के जरिए सूखे के नुकसान की भरपाई करने में जुटे हैं।

















