जीवन की अंतिम यात्रा को हर समाज में सम्मान और शांति का प्रतीक माना जाता है, मगर राजस्थान के पाली स्थित नया गांव का मोक्षधाम इस समय भारी बदहाली के दौर से गुजर रहा है। यहां अपने दिवंगत परिजनों को अंतिम विदाई देने पहुंचने वाले लोगों को घुटनों तक भरे पानी और गहरे कीचड़ से होकर गुजरना पड़ रहा है। अंतिम संस्कार के लिए मुखाग्नि देने से लेकर छोटे बच्चों को दफनाने तक, हर चरण में परिवारों को भारी मानसिक और शारीरिक यातना झेलनी पड़ रही है। उचित देखरेख के अभाव में यह पवित्र स्थल एक बड़े जलभराव केंद्र में तब्दील हो चुका है।
नाड़ी का रिसाव और सीवरेज का गंदा पानी बना मुसीबत
इस श्मशान घाट के अधिकांश भूभाग पर पूरे बारह महीने पानी जमा रहता है, जबकि बारिश के दिनों में यह पूरा इलाका किसी गहरे तालाब जैसा दिखने लगता है। आसपास के इलाके में रहने वाले सम्पतराम बावरी के मुताबिक, मोक्षधाम के ठीक पास में एक प्राकृतिक नाड़ी मौजूद है और उसी रास्ते से जलदाय विभाग का प्रमुख नाला भी गुजरता है। इन दोनों जलस्रोतों से लगातार हो रहे रिसाव के कारण श्मशान घाट की जमीन हमेशा दलदली बनी रहती है। इतना ही नहीं, समीपवर्ती बस्तियों से निकलने वाला गंदा पानी भी बहकर सीधे इसी परिसर में इकट्ठा हो रहा है। नगर निगम के अधिकारियों को इस विकट स्थिति के बारे में बार-बार सूचना दी गई, परंतु प्रशासन की ओर से केवल खोखले आश्वासनों के अलावा कोई जमीनी कदम नहीं उठाया गया।
पांच सालों से उपेक्षा का शिकार, फिसलकर चोटिल हो रहे लोग
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह गंभीर संकट पिछले पांच-छह सालों से लगातार बना हुआ है, लेकिन जिम्मेदार प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह चुप्पी साधे बैठा है। लिखित और मौखिक स्तर पर अनगिनत शिकायतें दर्ज कराने के बाद भी आज तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका। मानसून के समय तो यहां के हालात इतने विकट हो जाते हैं कि शव को अंदर तक ले जाना जान जोखिम में डालने जैसा साबित होता है।
स्थानीय निवासी छोगाराम देवासी ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा, “पानी भरा रहने के कारण यहां आने वाले लोग अक्सर फिसलकर गिर जाते हैं और चोटिल होते हैं।” अंतिम विदाई के अत्यंत संवेदनशील क्षणों में शोकग्रस्त परिवारों को इस प्रकार की अमानवीय परिस्थितियों से जूझना पड़ रहा है, जो नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की घोर संवेदनहीनता को दर्शाता है।
मासूमों को दफनाने वाली जमीन पर भी पानी का पहरा
इस पूरे मामले का सबसे दुखद और हृदयविदारक पहलू वह स्थान है, जहां रीति-रिवाज के अनुसार छोटे बच्चों को दफनाया जाता है। उस हिस्से में भी लगातार दूषित पानी भरा रहता है, जिसके चलते अपने मासूमों को खो चुके माता-पिता और परिजनों को दफनाने की प्रक्रिया पूरी करने में अत्यधिक पीड़ा और दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। शोक के आंसुओं के बीच परिजनों को पानी के बीच गड्ढा खोदने की विवशता झेलनी पड़ रही है।
पक्के नाले के निर्माण और भराव की मांग, आंदोलन की चेतावनी
लगातार बढ़ रही इस समस्या से त्रस्त होकर स्थानीय नागरिकों ने नगर निगम और जिला प्रशासन के समक्ष दो प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली मांग यह है कि श्मशान परिसर में जमा पानी की निकासी सुनिश्चित करने के लिए तत्काल एक मजबूत पक्के नाले का निर्माण करवाया जाए। दूसरी मांग के तौर पर लोगों ने कहा है कि जिन निचले हिस्सों में पानी भरता है, वहां पर्याप्त मिट्टी डलवाकर जमीन के स्तर को ऊंचा उठाया जाए ताकि दोबारा जलभराव की नौबत न आए। स्थानीय बाशिंदों और ग्रामीणों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने समय रहते इस गंभीर मसले का समाधान नहीं किया, तो उन्हें मजबूर होकर सड़कों पर उतरना पड़ेगा और व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू करना होगा।

















