राजस्थान के भरतपुर जिले के ग्रामीण अंचलों में कृषि के साथ पशुपालन आजीविका का मजबूत आधार बना हुआ है। यहाँ के किसान फसलों की कटाई और बदलते मौसम के चक्र को ध्यान में रखते हुए अपने मवेशियों के खान-पान में रणनीतिक बदलाव करते हैं। इस वार्षिक चक्र में सबसे अहम फेरबदल खरीफ की फसल कटने के बाद देखने को मिलता है, जब पशुओं के नियमित आहार में गेहूं के भूसे के स्थान पर बाजरे की कड़बी की कुट्टी को प्रमुखता से शामिल किया जाता है। स्थानीय किसानों का मानना है कि यह देसी आहार दुधारू पशुओं की सेहत को दुरुस्त रखता है और दूध की पैदावार में भी स्थिरता लाता है।
फसल अवशेषों का सदुपयोग और कुट्टी तैयार करने की विधि
भरतपुर क्षेत्र में खरीफ सीजन के दौरान बड़े पैमाने पर बाजरे की बुवाई की जाती है। जब दाने पूरी तरह पक जाते हैं और उनकी कटाई तथा गहाई पूरी हो जाती है, तब बचे हुए सूखे डंठलों को सुरक्षित सहेज लिया जाता है। इन्हीं सूखे डंठलों को ग्रामीण बोलचाल में कड़बी कहा जाता है। इसके बाद विशेष मशीनों की मदद से इस कड़बी के बारीक टुकड़े करके कुट्टी तैयार की जाती है। पशुपालक इस सूखी कुट्टी में दलिया मिलाकर मवेशियों को परोसते हैं, जिससे पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं। इस व्यवस्था से खेतों से निकलने वाले डंठलों का सही निपटारा हो जाता है और किसानों को अतिरिक्त चारा खरीदने की चिंता से भी राहत मिलती है।
साल में केवल एक बार बदलती है मवेशियों की दैनिक खुराक
पशुओं के खान-पान में यह बदलाव पूरे वर्ष में केवल एक बार, यानी बाजरे की फसल कटने के तुरंत बाद किया जाता है। वर्ष के सामान्य महीनों में किसान अपने मवेशियों को गेहूं का सूखा भूसा, खेतों से काटा गया हरा चारा और अन्य सामान्य पोषण देते हैं। जैसे ही बाजरे की नई कड़बी का भंडारण हो जाता है, इसे मुख्य चारे के रूप में उपयोग में लाया जाने लगता है। इस व्यवस्था से पशुपालकों के मासिक बजट पर दबाव कम होता है और घर की खेती से ही चारे का पर्याप्त प्रबंध हो जाता है।
संतुलित देखभाल और पोषक तत्वों से सुधरती है दुग्ध क्षमता
पशुपालन से जुड़े जानकारों और स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ सूखे चारे का प्रकार बदलना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि समग्र पोषण पर ध्यान देना जरूरी है। कड़बी की कुट्टी के साथ मवेशियों को भरपूर साफ पानी, समय पर हरा चारा और आवश्यक पौष्टिक आहार देना अनिवार्य होता है ताकि पशुओं के शरीर में सभी पोषक तत्वों की भरपाई हो सके। भरतपुर के ग्रामीण परिवारों के लिए यह पारंपरिक खान-पान प्रबंधन न केवल पशुओं को तंदुरुस्त रखता है, बल्कि उनकी घरेलू अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती प्रदान करता है।



















