उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में ग्रामीण आजीविका की मुख्य धुरी खेती के साथ पशुपालन पर टिकी है। यहाँ के देहाती इलाकों में बड़ी तादाद में किसान गाय और भैंस पालकर अपना घर-परिवार चलाते हैं। डेयरी व्यवसाय में बेहतर मुनाफा हासिल करने के लिए दुधारू मवेशियों का खानपान संतुलित और पोषक तत्वों से भरपूर होना आवश्यक माना जाता है। खासकर जब दूध देने वाले पशुओं की बात आती है, तो उनके नियमित भोजन में पर्याप्त हरे चारे की मौजूदगी अनिवार्य हो जाती है। यदि मवेशियों के चारे में पोषक तत्वों या हरे चारे की किल्लत हो जाए, तो उनकी सेहत बिगड़ने लगती है और दूध की पैदावार में सीधी गिरावट दर्ज की जाती है। ऐसे दौर में चारे की समस्या से जूझ रहे छोटे और सीमांत किसानों के लिए अजोला एक बेहद कारगर और सस्ता विकल्प बनकर उभरा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके उत्पादन के लिए किसी बड़े खेत या उपजाऊ जमीन की बंदिश नहीं होती, बल्कि किसान अपने घर के आंगन या आसपास की खाली जगह में भी इसे सरलता से उगा सकते हैं।
पशु आहार में क्यों खास अहमियत रखता है अजोला
दुधारू जानवरों की शारीरिक तंदुरुस्ती बनाए रखने और उनके रोजाना दूध देने की क्षमता को सुरक्षित रखने के लिए आहार में विविधता और संतुलन बहुत जरूरी है। अजोला मूल रूप से पानी की सतह पर तेजी से फैलने वाला एक जलीय फर्न है, जिसमें प्रोटीन और आवश्यक अमीनो एसिड प्रचुर मात्रा में मौजूद रहते हैं। इसके अलावा यह पौधों से मिलने वाले कई जरूरी विटामिन्स और खनिज तत्वों का समृद्ध स्रोत है। इसमें हड्डियों और दूध निर्माण के लिए जरूरी कैल्शियम, फास्फोरस के साथ-साथ आयरन जैसे महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं। इन्हीं खूबियों के चलते प्रगतिशील पशुपालक अपनी गायों और भैंसों के दैनिक राशन में इसे एक पूरक चारे के तौर पर शामिल करते हैं।
किसान आमतौर पर अजोला को सूखे भूसे, नियमित हरे चारे और पशु आहार के साथ मिलाकर खिलाते हैं, जिससे पशुओं को भोजन में मिलने वाले पोषक तत्वों का स्तर फौरन बढ़ जाता है। हालांकि विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अजोला कभी भी किसी पशु के पूरे आहार का विकल्प नहीं बन सकता। दुधारू मवेशी को स्वस्थ्य रखने के लिए उसे रोजाना पर्याप्त मात्रा में सूखा चारा, पारंपरिक हरा चारा, साफ पीने का पानी और जरूरत के अनुसार अन्य पौष्टिक दाना देना अनिवार्य रहता है।
बाजार पर निर्भरता में कमी और घर पर आसान उत्पादन
अजोला उगाने से किसानों को मिलने वाला एक बहुत बड़ा आर्थिक लाभ यह है कि उन्हें अतिरिक्त पोषक आहार या महंगे चारे के लिए हर बार बाजार के चक्कर नहीं काटने पड़ते। सही देखरेख और बुनियादी तकनीकों को अपनाकर किसान अपने घर पर ही लगातार इसका उत्पादन कर सकते हैं। यह व्यवस्था खास तौर पर उन गरीब और छोटे पशुपालकों के लिए वरदान साबित होती है, जिनके पास सीमित मवेशी होते हैं और बाजार से महंगा दाना खरीदने की क्षमता कम होती है।
अजोला की खेती के लिए जरूरी वातावरण और सावधानियां
अजोला की बेहतर पैदावार और तेजी से बढ़वार सुनिश्चित करने के लिए साफ पानी और अनुकूल जलवायु की दरकार होती है। इसे तैयार करने के लिए हमेशा ऐसी छायादार जगह का चयन करना चाहिए जहां सूरज की तीखी और सीधी धूप न पड़ती हो। जरूरत से ज्यादा गर्मी या तेज धूप और गंदा पानी इसकी वृद्धि को पूरी तरह रोक सकते हैं। इसलिए जल और तापमान का नियमित प्रबंधन जरूरी माना गया है।
इसकी खेती की शुरुआत करने के लिए पशुपालक किसी बड़े टब, बर्तन या जमीन में उथला गड्ढा बनाकर उसमें पानी भर सकते हैं और अजोला की शुरुआती मात्रा यानी कल्चर उसमें डाल सकते हैं। इसके बाद आवश्यकतानुसार पानी के स्तर और जरूरी पोषक तत्वों की निगरानी रखी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में स्वच्छता का ख्याल रखना सबसे अहम शर्त है, ताकि कल्चर में बाहरी कचरा, कीड़े या अवांछित तत्व न पनपने पाएं। मवेशियों के आगे परोसने से पहले अजोला को हमेशा साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। यदि इसमें से दुर्गंध आ रही हो, फफूंद लगी हो या सड़ांध के लक्षण दिखें, तो इसका इस्तेमाल पशुओं के लिए कतई नहीं किया जाना चाहिए।
दूध उत्पादन क्षमता में सुधार की संभावनाएं
मवेशियों में दूध का स्तर केवल एक पहलू पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसमें पशु की नस्ल, उसकी शारीरिक उम्र, संपूर्ण स्वास्थ्य, ब्याने की अवधि और आहार की गुणवत्ता जैसे कई कारक एक साथ काम करते हैं। जब किसी दुधारू पशु के दैनिक भोजन में अजोला जैसा पोषक पूरक मिलाया जाता है, तो उसके शरीर की दैनिक सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी पूरी होने लगती है। किसानों को यह सलाह दी जाती है कि वे इसे अचानक भारी मात्रा में देने के बजाय धीरे-धीरे पशु के सामान्य चारे में शामिल करें और जानवर की पाचन क्रिया व व्यवहार पर नजर रखें। किसी भी नए आहार को शुरू करने से पहले स्थानीय पशु चिकित्सक या पोषण विशेषज्ञ से सही खुराक की जानकारी लेना हमेशा सुरक्षित कदम साबित होता है।
पशु चिकित्सक डॉ. हनी सक्सेना ने साझा किए वैज्ञानिक तथ्य
जिले के पशु चिकित्सक डॉ. हनी सक्सेना के अनुसार, अजोला पानी पर तैरने वाला एक उपयोगी जलीय फर्न है, जो प्रोटीन के अलावा शरीर के लिए जरूरी कई जीवनोपयोगी घटकों से भरा होता है। चूंकि इसे तैयार करने में नाममात्र का खर्च और बहुत कम जगह लगती है, इसलिए ग्रामीण इलाकों के कमजोर आय वर्ग वाले पशुपालक भी इसका लाभ उठा सकते हैं। डॉ. हनी सक्सेना ने बताया कि इसमें उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, आवश्यक अमीनो एसिड, विटामिन ए, विटामिन बी-12 तथा कैल्शियम, फास्फोरस और आयरन जैसे तत्व पाए जाते हैं। यदि इसे संतुलित राशन के हिस्से के रूप में मवेशी को खिलाया जाए, तो उसके पोषण स्तर में सुधार होता है और दूध की मात्रा बढ़ाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने किसानों को हिदायत दी कि अजोला हमेशा स्वच्छ पानी में ही उगाया जाए और पशु को खिलाने से पूर्व उसकी ताजगी की पूरी पड़ताल की जाए। साथ ही उन्होंने यह भी दोहराया कि पशु को सिर्फ एक चारे के भरोसे न रखें, बल्कि सूखे चारे, ताजे हरे चारे और पोषक तत्वों का उचित संतुलन बनाकर ही खिलाएं।
















