राजस्थान का सिरोही जिला अपनी प्राचीन विरासत और आध्यात्मिक स्थलों के कारण देशभर के श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान रखता है। जिले के शिवगंज तहसील क्षेत्र में पड़ने वाले राड़बर गांव की ऊंची अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य एक ऐसा ऐतिहासिक मंदिर मौजूद है, जिसकी पूजा परंपरा समूचे भारत में अद्वितीय मानी जाती है। सामान्य तौर पर मंदिरों में भगवान गणेश की एकल प्रतिमा स्थापित होती है, परंतु इस पवित्र स्थल पर प्रथम पूज्य भगवान गणेश अपनी दोनों शक्तियों रिद्धि और सिद्धि के स्वरूप में दो अलग-अलग प्रतिमाओं के रूप में एक ही गर्भगृह में सुशोभित हैं। पर्वत की ऊंचाई पर स्थित इस अलौकिक धाम तक पहुंचने के लिए आने वाले भक्तों को 100 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
पांडव काल से जुड़ा 3900 वर्ष पुराना गौरवशाली इतिहास
धार्मिक परंपराओं और स्थानीय निवासियों के अनुसार इस तीर्थ स्थल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि लगभग 3900 वर्ष पुरानी बताई जाती है। क्षेत्र में प्रचलित मान्यताओं के आधार पर इस मंदिर की नींव पांडव काल के समय रखी गई थी। प्राचीन दौर में राड़बर गांव को 'राजगढ़' नाम से पहचाना जाता था। सदियों के अंतराल में समय बीतने के साथ-साथ स्थानीय समुदाय और श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर का संरक्षण, जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण कार्य करवाया जाता रहा। यही वजह है कि यह स्थल न केवल सिरोही अंचल बल्कि संपूर्ण राजस्थान के सर्वाधिक प्राचीन गणेश देवालयों की फेहरिस्त में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
एक ही गर्भगृह में सिद्धि और रिद्धि गणेश का दुर्लभ स्वरूप
मंदिर के मुख्य गर्भगृह की बनावट और विग्रह स्थापना बेहद अनूठी है। स्थानीय भक्त नरेश राजपुरोहित के अनुसार, गर्भगृह के बाईं ओर काले पाषाण से तराशी गई अत्यंत नयनाभिराम मूर्ति स्थापित है, जिसे सिद्धि गणेश के रूप में पूजा जाता है। दूसरी तरफ दाईं ओर स्थापित प्रतिमा को रिद्धि गणेश का विग्रह माना गया है। पूरे भारतवर्ष में संभवतः यह अकेला ऐसा गणेश मंदिर है जहां एक ही गर्भगृह में दो गणेश विग्रहों की सामूहिक अर्चना की जाती है। मंदिर की मान्यताओं के अनुसार, दोनों प्रतिमाओं में रिद्धि गणेश का विग्रह सबसे पुराना है, जबकि सिद्धि गणेश की प्रतिमा को उसके कुछ समय बाद गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया गया था।
प्राकृतिक छटा, शांत माहौल और सदियों पुरानी जीवंत बावड़ी
अरावली पर्वतमाला के शीर्ष भाग पर अवस्थित होने के कारण यह मंदिर प्राकृतिक सुरम्यता से परिपूर्ण है। मंदिर परिसर के चारों तरफ घने हरे-भरे वृक्ष और एकांत शांत परिवेश बना रहता है, जिससे यहां दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं को गहन मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। इस पावन परिसर के भीतर एक अत्यंत प्राचीन एवं ऐतिहासिक बावड़ी भी निर्मित है। सदियां बीत जाने के बाद भी यह पारंपरिक बावड़ी आज तक एक सक्रिय जल स्रोत के रूप में बनी हुई है और इसके शुद्ध जल का उपयोग मंदिर के समस्त धार्मिक अनुष्ठानों व पूजा-विधान में किया जाता है।
बुधवार की विशेष पूजा और भाद्रपद मेले में उमड़ती भीड़
राड़बर के इस पावन धाम में प्रत्येक बुधवार को विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है, जिसमें आसपास के क्षेत्रों से बड़ी तादाद में लोग पहुंचते हैं। इसके अलावा भाद्रपद मास में पड़ने वाले पावन गणेश चतुर्थी उत्सव के दौरान यहां का वातावरण किसी भव्य मेले जैसा नजर आता है। इस अवसर पर सिरोही जिले के अतिरिक्त संपूर्ण राजस्थान और पड़ोसी राज्य गुजरात से भी भारी संख्या में भक्त अपनी मन्नतें लेकर यहां शीश नवाने आते हैं। क्षेत्र में यह गहरी मान्यता विद्यमान है कि जो भी श्रद्धालु सच्ची निष्ठा से 100 से अधिक सीढ़ियां चढ़कर रिद्धि और सिद्धि गणेश के दर्शन करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।



















