बेरोजगारी का आलम यह है कि देश के कई हिस्सों में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवा छोटे पदों पर आवेदन करने को मजबूर हैं। हाल ही में राजस्थान से एक ऐसी ही तस्वीर सामने आई है जहां चपरासी के पद पर सरकारी नौकरी पाने वाले युवा अब अपने काम को लेकर असमंजस में हैं। स्थिति यह है कि बीटेक, एमएससी, बीएड और पीजीडीसीए जैसी उच्च डिग्रियां रखने वाले युवाओं को नियुक्ति के बाद रसोई में खाना बनाने या अन्य प्रशासनिक कार्यों की बजाय सफाई और चौकीदारी जैसी जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। इस व्यवस्था के खिलाफ चयनित अभ्यर्थियों ने जयपुर में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के दफ्तर के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया है, जिससे राज्य में भर्ती प्रक्रिया और रोजगार के अवसरों को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
इंजीनियरिंग की डिग्री के बाद हॉस्टल में चूल्हा जलाने की मजबूरी
इस पूरी स्थिति का सामना कर रहे लोकेश ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की है। प्राइवेट सेक्टर में बेहतर अवसर हाथ न लगने पर उन्होंने सरकारी क्षेत्र में हाथ आजमाया और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की परीक्षा पास कर ली। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के अंतर्गत उन्हें एक छात्रावास में तैनाती मिली, लेकिन चपरासी के बजाय उन्हें वहां रसोइए का जिम्मा थमा दिया गया। उनका कहना है कि विज्ञप्ति में इस पद को सहायक कर्मचारी बताया गया था, और उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि उन्हें चूल्हा संभालना पड़ेगा। फिलहाल वे आरपीएससी प्रोग्रामर परीक्षा की तैयारी भी कर रहे हैं, लेकिन नौकरी की आवश्यकता के कारण उन्हें यह पद स्वीकार करना पड़ा था, हालांकि खाना पकाना उनके लिए संभव नहीं है।
एमएससी और बीएड डिग्रीधारकों का संघर्ष
लोकेश अकेले ऐसे शख्स नहीं हैं, बल्कि उनके साथ कई अन्य युवा भी इस विसंगति का शिकार हुए हैं। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद भरत ने बताया कि उन्होंने एमएससी, बीएड और पीजीडीसीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब कोई रास्ता नहीं सूझा, तो वे इस चतुर्थ श्रेणी भर्ती में शामिल हो गए और चयनित हो गए। इसी तरह जगदीश गुर्जर ने एमए और बीएड करने के बाद शिक्षक भर्ती का लंबा इंतजार किया, लेकिन वैकेंसी में हो रही देरी के कारण उन्होंने अंततः यह नौकरी अपना ली। उनका यह भी आरोप है कि अन्य कर्मचारियों को हफ्ते में पांच दिन का नियम मिलता है, जबकि उनसे सातों दिन काम लिया जा रहा है। अलवर से आईं दीनू और ललिता की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जो बीएड धारक होने के बावजूद समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत रसोइया का काम संभाल रही हैं और उनका मानना है कि उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार काम मिलना चाहिए।
विज्ञापन में स्पष्टता का अभाव और विभागों की अपनी जरूरतें
राजस्थान में लंबे अर्से के बाद करीब 53 हजार चतुर्थ श्रेणी पदों के लिए यह बड़ी भर्ती प्रक्रिया संपन्न हुई थी। इसमें केवल सामान्य योग्यता वाले ही नहीं, बल्कि तृतीय से लेकर प्रथम श्रेणी और सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी करने वाले प्रतिभावान युवा भी शामिल हुए थे। चयन के बाद विभिन्न विभागों ने अपनी आंतरिक आवश्यकताओं के मुताबिक इन कर्मियों की तैनाती तय की। सामाजिक न्याय विभाग के हॉस्टल में रसोई और चौकीदारी के पद खाली होने के कारण इन कर्मचारियों को वहां झोंक दिया गया। स्वास्थ्य विभाग के एक कार्यालय में तो इन कर्मियों से स्वीपर का काम तक कराए जाने की बात सामने आई है, और कुछ स्थानों पर वार्ड बॉय की जिम्मेदारी दिए जाने पर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं।
कर्मचारियों का सीधा सवाल है कि यदि उनसे रसोई या सफाई का काम ही लिया जाना था, तो चयन प्रक्रिया के वक्त जारी किए गए विज्ञापन में यह बात क्यों नहीं बताई गई। उनका तर्क है कि खानपान की व्यवस्था के लिए अलग से पद होते हैं और उसके लिए विशेष अनुभव की मांग की जाती है, ऐसे में अचानक किसी चपरासी को कुक बना देना बिल्कुल तर्कसंगत नहीं है। इस पूरी घटना ने एक तरफ जहां युवाओं की नौकरी के प्रति लाचारी को उजागर किया है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक स्तर पर नियोजन की कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।





















