राजस्थान के जनजातीय बाहुल्य डूंगरपुर जिले के शहरी निकाय चुनावों में इस बार मुकाबला अत्यंत रोचक और त्रिकोणीय दौर में पहुंच चुका है। डूंगरपुर नगर परिषद तथा सागवाड़ा नगर पालिका चुनावों के लिए नामांकन पत्रों की वापसी की निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के साथ ही चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे सभी उम्मीदवारों की तस्वीर अब पूरी तरह साफ हो गई है। डूंगरपुर नगर परिषद के इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सभापति की प्रमुख सीट को सामान्य यानी ओपन श्रेणी में रखा गया है। इस व्यवस्था के कारण सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने विभिन्न सामाजिक समूहों और जातीय समीकरणों को साधते हुए अपने प्रत्याशियों का चयन किया है। इस बार के शहरी निकाय चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) की सीधी प्रविष्टि है। ग्रामीण इलाकों में अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ बना चुकी बीएपी ने पहली बार शहरी निकाय चुनाव में अपनी दस्तक दी है। पार्टी ने डूंगरपुर नगर परिषद के साथ-साथ सागवाड़ा नगर पालिका में अपने उम्मीदवार उतारकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्य विपक्षी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
डूंगरपुर और सागवाड़ा में भारत आदिवासी पार्टी का रणनीतिक पदार्पण
भारत आदिवासी पार्टी ने डूंगरपुर नगर परिषद के कुल 40 वार्डों में से 12 चुनिंदा वार्डों में अपने अधिकृत उम्मीदवार उतारे हैं। इसी प्रकार सागवाड़ा नगर पालिका के कुल 35 वार्डों में से 11 वार्डों में बीएपी के प्रत्याशी चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। पार्टी की चुनावी रणनीति की पड़ताल करने पर यह बात स्पष्ट होती है कि उसने संपूर्ण निकाय में सभी सीटों पर लड़ने के बजाय केवल मुस्लिम और आदिवासी (एसटी) बाहुल्य वाले वार्डों पर ध्यान केंद्रित किया है। डूंगरपुर नगर परिषद के जिन 12 वार्डों में पार्टी ने दांव लगाया है, उनमें से आधे से अधिक यानी 7 प्रत्याशी मुस्लिम समुदाय से आते हैं। इसके अतिरिक्त पार्टी ने 4 टिकट अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग को तथा 1 टिकट अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को दिया है। दिलचस्प तथ्य यह है कि बीएपी ने अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग से एक भी उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है। सीमित सीटों पर रणनीति बनाकर चुनाव लड़ने की इस नीति से बीएपी मुख्य दलों के परंपरागत मतों में सेंध लगाकर निकाय बोर्ड के गठन में निर्णायक भूमिका हासिल करने की फिराक में है।
वर्ष 2021 का बीटीपी रिकॉर्ड और बीएपी का राजनीतिक सफर
डूंगरपुर के शहरी निकायों में नई क्षेत्रीय शक्तियों के उभार का एक ऐतिहासिक संदर्भ भी रहा है। पूर्व में भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) ने आदिवासी अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी गहरी पैठ बनाने के उपरांत वर्ष 2021 में पहली बार डूंगरपुर नगर परिषद के चुनाव में पहली शहरी आजमाइश की थी। उस समय बीटीपी ने अपने प्रथम प्रयास में ही नगर परिषद के 40 में से 7 वार्डों पर शानदार जीत दर्ज कर पारंपरिक राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया था। इसके पश्चात बीटीपी के लगभग पूरे सांगठनिक ढांचे और शीर्ष नेतृत्व ने पुरानी पार्टी का त्याग कर एक नए राजनीतिक दल 'भारत आदिवासी पार्टी' (बीएपी) की नींव रखी थी। राजस्थान के हालिया लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अपनी मजबूत चुनावी क्षमता साबित करने के बाद, अब बीएपी पहली बार शहरी निकायों के दंगल में उतरी है। वर्ष 2021 में बीटीपी द्वारा दिखाए गए प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए यह माना जा रहा है कि बीएपी इस बार भी शहरी क्षेत्रों के चुनावी नतीजों को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है।
भाजपा की टिकट वितरण नीति और ओबीसी वर्ग पर भरोसा
डूंगरपुर नगर परिषद चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सामाजिक रणनीति के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) पर सर्वाधिक भरोसा जताया है। भाजपा द्वारा जारी 40 वार्डों की सूची में सबसे बड़ा हिस्सा ओबीसी वर्ग को मिला है, जिसके तहत 14 उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा गया है। इसके साथ ही पार्टी ने सामाजिक संतुलन और समावेशी प्रतिनिधित्व दर्शाने के उद्देश्य से 5 एसटी, 4 एससी, 5 मुस्लिम, 5 जैन तथा 3 ब्राह्मण प्रत्याशियों को पार्टी का टिकट दिया है। भाजपा के मुस्लिम प्रत्याशियों के संदर्भ में एक ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इन 5 उम्मीदवारों में 1 प्रत्याशी बोहरा मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखता है। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि ओबीसी वर्ग को सबसे अधिक भागीदारी देने से निकाय चुनाव में पार्टी की जीत की राह आसान होगी, जबकि जैन, ब्राह्मण, एससी, एसटी और बोहरा समुदाय के समन्वय से बहुमत के आंकड़े तक पहुंचना सुलभ हो जाएगा।
कांग्रेस का सामाजिक संतुलन और वर्ग-वार प्रतिनिधित्व
दूसरी तरफ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी डूंगरपुर नगर परिषद के 40 वार्डों में अपने उम्मीदवारों का चयन करते समय विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच संतुलन साधने का भरसक प्रयास किया है। कांग्रेस ने भी ओबीसी वर्ग को प्राथमिकता देते हुए अपनी सूची में सर्वाधिक 13 टिकट ओबीसी प्रत्याशियों को आवंटित किए हैं। हालांकि, भाजपा की तुलना में कांग्रेस ने जैन समुदाय पर अधिक दांव खेलते हुए 10 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। इसके साथ ही कांग्रेस ने मुस्लिम वर्ग को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व देते हुए 7 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए हैं। अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के मामले में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही समान धरातल पर हैं, क्योंकि कांग्रेस ने भी 5 एसटी प्रत्याशियों को टिकट दिया है। अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग से कांग्रेस ने 3 उम्मीदवारों को उतारा है तथा 1 ब्राह्मण प्रत्याशी को भी अपनी सूची में स्थान दिया है। इस प्रकार कांग्रेस की चुनावी रणनीति मुख्य रूप से ओबीसी, जैन और मुस्लिम मतदाताओं के एकजुट समर्थन पर आधारित दिख रही है।
सामान्य सभापति पद का गणित और भावी राजनीतिक समीकरण
डूंगरपुर नगर परिषद में इस बार सभापति का पद सामान्य (ओपन) श्रेणी के लिए नियत होने के कारण चुनाव का मुकाबला किसी एक आरक्षित वर्ग की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। सभापति का पद ओपन होने के कारण यह आवश्यक हो गया है कि प्रत्येक राजनीतिक दल अधिक से अधिक वार्ड जीतकर अपने पार्षदों की संख्याबल को मजबूत करे, क्योंकि अंततः निर्वाचित पार्षदों का बहुमत ही नए सभापति का फैसला करेगा। भाजपा और कांग्रेस जहां सभी सामाजिक और जातीय वर्गों को प्रतिनिधित्व देकर अपने दम पर पूर्ण बहुमत प्राप्त करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं, वहीं भारत आदिवासी पार्टी ने केवल मजबूत पकड़ वाले क्षेत्रों में प्रत्याशी उतारकर दोनों प्रमुख दलों के समीकरण बिगाड़ने की बिसात बिछा दी है। डूंगरपुर निकाय चुनाव के इस टिकट वितरण से स्पष्ट हो गया है कि मुकाबला केवल पार्टी चिन्ह या प्रत्याशी के व्यक्तिगत प्रभाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और जातीय गोलबंदी ही यह तय करेगी कि डूंगरपुर नगर परिषद की कमान किसके हाथों में जाएगी।



















