बस्तर के लोक पर्व दशहरा की अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं में सरगीपाल गांव में होने वाली बेल पूजा का विशेष स्थान है। जिला मुख्यालय से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक प्राचीन बेल पेड़ पर प्राकृतिक रूप से जुड़े हुए दो बेल फल उगते हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार इन जुड़े हुए फलों को भगवान शिव और माता शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसी आस्था के तहत हर साल इस विशेष रस्म को पूरे विधि-विधान के साथ निभाया जाता है और फिर इन फलों को मुख्य अनुष्ठानों के लिए आगे बढ़ाया जाता है।
लगभग ढाई सदी पुरानी पौराणिक कथा
इस अनूठी परंपरा के इतिहास के पीछे करीब 250 साल पुरानी एक कथा प्रचलित है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि प्राचीन काल में बस्तर के एक राजा शिकार खेलते हुए इस क्षेत्र में आए थे। उस दौरान मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी ने दो कन्याओं के रूप में राजा को अपने दर्शन दिए थे। कथा के अनुसार वे दोनों देवियां इसी विशेष बेल के पेड़ के नीचे अंतर्ध्यान हो गई थीं। उसी समय से इन जुड़वां बेल फलों को देवियों का जीवंत स्वरूप मानकर पूजा करने और उन्हें दशहरा उत्सव में शामिल करने की यह अनूठी परंपरा लगातार चली आ रही है।
शोभायात्रा और मंदिर में स्थापना की प्रक्रिया
इस विशेष पूजा-अर्चना के संपन्न होने के बाद जुड़े हुए बेल फलों को पेड़ से अत्यंत सावधानी के साथ नीचे उतारा जाता है। इसके पश्चात पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। इस यात्रा के माध्यम से इन फलों को जगदलपुर शहर में स्थित प्रसिद्ध मां दंतेश्वरी मंदिर ले जाया जाता है। मंदिर पहुंचने पर इन्हें पूरी विधि-विधान के साथ स्थापित किया जाता है, जहां बस्तर के विभिन्न गांवों से आए अन्य देवी-देवताओं की भी पूजा-अर्चना की जाती है और पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है।
राजपरिवार और पुजारियों के विचार
राजपरिवार के सदस्य कमलचन्द्र भंजदेव ने इस परंपरा के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि वे स्वयं इस जोड़े बेल की पहचान करके उसे प्राप्त करने के लिए यहां पहुंचते हैं और यह प्राचीन रीति वर्षों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। उनका कहना है कि इस जुड़े हुए बेल को एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वहीं दूसरी ओर मां दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी ने बताया कि यह पूजा रियासत काल के समय से निरंतर चली आ रही है। पुजारी पाढ़ी ने कहा कि पूजा संपन्न होने के बाद ग्रामीणजन इस जोड़ा बेल को बिल्कुल वैसे ही विदाई देते हैं जैसे किसी बेटी की शादी के बाद उसे उसके ससुराल विदा किया जाता है।



















