गणेश महोत्सव के दौरान भगवान श्री गणेश को पारंपरिक और शुद्ध प्रसाद अर्पित करने की एक समृद्ध परंपरा रही है। अगर आप इस उत्सव में बप्पा के भोग के लिए कुछ ऐसा बनाना चाहते हैं जो पारंपरिक स्वाद से भरपूर हो और जिसे बनाने का तरीका भी सामान्य मिठाइयों से अलग हो, तो राजस्थान का प्रसिद्ध मोगरी का चूरमा एक बेहतरीन विकल्प है। जालौर क्षेत्र में विशेष रूप से पसंद की जाने वाली यह मिठाई गेहूं के आटे, देसी घी, गुड़, केसर और इलायची के बेहतरीन मेल से तैयार की जाती है। इसकी खास बात यह है कि स्वाद में बेहद समृद्ध होने के बावजूद इसे तैयार करने में बहुत अधिक घी की आवश्यकता नहीं होती है। जालौर की गृहिणी संतोष देवी ने इस पारंपरिक मोगरी चूरमा को बनाने की आसान और प्रामाणिक विधि साझा की है।
चूरमा के लिए आटा गूंथने और गुड़ भिगोने की विधि
मोगरी का चूरमा बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहला और महत्वपूर्ण चरण गेहूं के सही आटे का चयन और उसकी तैयारी है। संतोष देवी के अनुसार, सबसे पहले एक चौड़े बर्तन या परांत में आवश्यकतानुसार गेहूं का आटा लें। इस आटे में मोयन के लिए थोड़ा सा देसी घी डालकर दोनों हाथों से अच्छी तरह मिला लें, ताकि आटा और घी आपस में एकसार हो जाएं। इसके बाद इसमें थोड़ा सा दूध और आवश्यकतानुसार गुनगुना पानी डालते हुए आटे को गूंथना शुरू करें। ध्यान रखें कि इस आटे को बहुत ज्यादा गीला या मुलायम नहीं करना है। आटा केवल इतना ही गूंथा जाता है कि जब आप इसे अपनी हथेली में दबाएं, तो इसकी एक मजबूत मुट्ठी बन सके और आटा आपस में जमने लगे।
जब आटा इस स्थिति में आ जाए, तो इसे कुछ समय के लिए ढककर रख दिया जाता है ताकि वह अच्छी तरह सेट हो जाए। इसी दौरान चूरमे को प्राकृतिक मिठास देने के लिए गुड़ की तैयारी की जाती है। गुड़ के एक बड़े ढेले को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ लिया जाता है और फिर इन टुकड़ों को एक कटोरी में थोड़े से पानी में भिगोकर रख दिया जाता है। गुड़ को पानी में पहले से भिगोकर रखने से बाद में चाशनी बनाने की प्रक्रिया बेहद आसान और तेज हो जाती है।
छलनी से मोगरी बनाने और भूनने का आसान तरीका
इस रेसिपी का सबसे अनोखा और दिलचस्प चरण मोगरी तैयार करना है। मोगरी बनाने के लिए तैयार किए गए आटे को हाथों से एक बड़ी और साफ छलनी पर रखकर हल्के हाथों से रगड़ा जाता है। इस प्रक्रिया से आटे के छोटे-छोटे महीन दाने बनकर छलनी के नीचे गिरते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में मोगरी कहा जाता है। जो मोटा आटा छलनी के ऊपर बच जाता है, उसे अलग कर दिया जाता है और केवल नीचे बने बारीक दानों का ही उपयोग चूरमा बनाने के लिए किया जाता है।
इसके बाद मोगरी को भूनने का चरण शुरू होता है। इसके लिए एक भारी तले की कड़ाही में लगभग दोछोटे चम्मच देसी घी डालकर गर्म करें। जब घी हल्का गर्म हो जाए, तो इसमें तैयार की गई मोगरी डाल दें। अब इसे बिल्कुल धीमी आंच पर लगातार कड़छी से चलाते हुए भूनना शुरू करें। मोगरी को धीमी आंच पर भूनना बेहद जरूरी होता है ताकि दाने अंदर तक अच्छे से पक जाएं और कच्चे न रहें। इसे लगातार चलाते हुए लगभग 20 से 25 मिनट तक पकाया जाता है। जब मोगरी का रंग हल्का सुनहरा हो जाए और कड़ाही से बेहतरीन भीनी-भीनी खुशबू आने लगे, तो गैस बंद कर दें और मोगरी को किसी बर्तन में निकालकर ठंडा होने के लिए रख दें।
केसर-इलायची वाली एक तार की चाशनी और चूरमे का संयोजन
मोगरी के ठंडा होने के दौरान गुड़ की चाशनी तैयार की जाती है। भिगोकर रखे गए गुड़ के पानी को एक साफ छलनी से छानकर कड़ाही में डालें ताकि गुड़ की कोई गंदगी या तिनका चाशनी में न रहे। अब इस पानी को गर्म करें और जब इसमें उबाल आने लगे, तो इसमें थोड़ी सी केसर की पत्तियां और कुटी हुई हरी इलायची मिला दें। केसर और इलायची डालने से चाशनी में बेहद आकर्षक रंग, समृद्ध स्वाद और मनमोहक सुगंध आ जाती है। चाशनी को मध्यम आंच पर तब तक पकाया जाता है जब तक कि यह एक तार की न बन जाए। इसे जांचने के लिए उंगलियों के बीच चाशनी की एक बूंद लेकर देखें, जब एक स्पष्ट तार बनने लगे तो समझें कि चाशनी बिल्कुल तैयार है।
चाशनी के तैयार होते ही उसमें लगभग दो चम्मच देसी घी मिला दिया जाता है। इसके तुरंत बाद, पहले से भूनकर ठंडी की गई मोगरी को कड़ाही में डालकर चाशनी के साथ अच्छी तरह मिला दें। चाशनी में घी डालने का यह छोटा सा कदम चूरमे को आपस में चिपकने से रोकता है, जिससे चूरमा बेहद खिला-खिला और दानेदार बनता है। सभी सामग्रियों को अच्छी तरह मिलाने के बाद इसके ऊपर कटे हुए काजू, बादाम और पिस्ता जैसे मेवे डालें। इस प्रकार आपका स्वादिष्ट, दानेदार और खुशबूदार राजस्थानी मोगरी चूरमा भगवान श्री गणेश के भोग के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता है।




















