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जालोर का भांडवपुर जैन तीर्थ: बैलगाड़ी टूटने से तय हुई थी जगह, 2300 साल पुरानी मूर्ति का है खास इतिहासराजस्थान
17 सित॰ 2026, 3:18 pm (1 दिन पहले)· 1

जालोर का भांडवपुर जैन तीर्थ: बैलगाड़ी टूटने से तय हुई थी जगह, 2300 साल पुरानी मूर्ति का है खास इतिहास

जालोर जिले के भुंडवा गांव में स्थित भांडवपुर जैन तीर्थ अपनी 2300 साल पुरानी भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा और बैलगाड़ी से जुड़ी स्थापना की कथा के लिए प्रसिद्ध है। यह प्राचीन तीर्थस्थल जैन समाज के साथ-साथ सभी समुदायों के लोगों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है।

राजस्थान के जालोर जिले की सायला तहसील के अंतर्गत आने वाले भुंडवा गांव में स्थित भांडवपुर जैन तीर्थ प्राचीन इतिहास और अटूट आस्था का एक जीवंत केंद्र माना जाता है। जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को समर्पित यह पवित्र स्थल अपनी अत्यंत प्राचीन प्रतिमा और उससे जुड़ी लोककथाओं के कारण देश भर में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। जैन परंपरा के जानकारों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां स्थापित भगवान महावीर स्वामी की यह मूर्ति लगभग 2300 वर्ष प्राचीन है। यही अद्भुत और प्राचीन प्रतिमा इस तीर्थ की सबसे बड़ी और खास विशेषता है, जिसके दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं। हालांकि इस तीर्थ की महानता केवल जैन समुदाय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र सर्वसमाज के लोगों की श्रद्धा का बड़ा प्रतीक बना हुआ है।

बैलगाड़ी का पहिया टूटने से जुड़ा स्थापना का दिलचस्प इतिहास

इस ऐतिहासिक तीर्थ की स्थापना और वर्तमान स्थल के चयन के पीछे एक बेहद रोचक और धार्मिक कथा जुड़ी हुई है। मंदिर के पुराने इतिहास और प्रचलित मान्यताओं के अनुसार एक कालखंड में भगवान महावीर स्वामी की इस पावन प्रतिमा को पालजी संघ द्वारा एक बैलगाड़ी में विराजमान करके ले जाया जा रहा था। प्रतिमा को सुरक्षित अपने गंतव्य तक ले जाने के लिए यह यात्रा लगातार आगे बढ़ रही थी, लेकिन जब यह काफिला भांडूक वन के भौगोलिक क्षेत्र में पहुंचा, तो अचानक बैलगाड़ी का पहिया टूट गया। तमाम प्रयासों के बावजूद जब गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकी, तो इसे दैवीय संकेत माना गया और इसी स्थान को भगवान महावीर की प्रतिमा की स्थापना के लिए सबसे उपयुक्त मान लिया गया। इसके पश्चात इसी पवित्र भूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण कार्य संपन्न हुआ, जो समय के साथ विकसित होकर भांडवपुर जैन तीर्थ के रूप में पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया।

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स्थापना की यह कथा तीर्थ की पहचान का है अहम हिस्सा

भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा और बैलगाड़ी की इस पौराणिक घटना को लेकर जो कथा प्रचलित है, वह इस तीर्थ की पहचान का सबसे महत्वपूर्ण और अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। यहां आने वाले हर श्रद्धालु के लिए वह प्रसंग जब बैलगाड़ी उस विशेष स्थान पर रुकी थी, कोई साधारण संयोग नहीं बल्कि दिव्य विधान का प्रतीक है। यही कारण है कि भांडवपुर की यात्रा करने वाले भक्तजन केवल भगवान महावीर स्वामी के दर्शन करके ही नहीं लौटते, बल्कि इस तीर्थ की स्थापना से जुड़ी उस ऐतिहासिक परंपरा को भी पूरी श्रद्धा के साथ याद करते हैं। यह कथा आज भी इस स्थान के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को जीवंत बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाती है, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी अपनी समृद्ध विरासत से जुड़ी रहती हैं।

सभी समुदायों और छत्तीस कौमों के लोगों की अटूट श्रद्धा

भांडवपुर जैन तीर्थ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सर्वधर्म समभाव वाली पृष्ठभूमि है, जहां किसी एक वर्ग तक आस्था सीमित नहीं है। जैन धर्म के अनुयायी सुजल मेहता ने बताया कि इस तीर्थ का इतिहास और इसकी मान्यताएं लंबे समय से अनगिनत लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उनके अनुसार भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा को लेकर चली आ रही परंपराएं और इस भूमि का आध्यात्मिक वातावरण सभी के लिए अत्यधिक महत्व रखता है। इस तीर्थ के साथ केवल जैन अनुयायी ही नहीं जुड़े हैं, बल्कि समाज के सभी वर्गों के लोग पूरी शिद्दत से इस स्थल को पूजते हैं और छत्तीस कौमों के नागरिक इसे अपनी श्रद्धा की नजर से देखते हैं, जो इस स्थान की सामाजिक समरसता को और अधिक मजबूत करता है।

क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का मजबूत स्तंभ

आज के समय में जालोर के भुंडवा गांव में स्थित भांडवपुर जैन तीर्थ केवल एक सामान्य उपासना स्थल भर नहीं रह गया है, बल्कि यह इतिहास, धार्मिक परंपरा और लोकमान्यता का एक अद्भुत संगम बन चुका है। भगवान महावीर स्वामी की तेरह सौ से अधिक यानी करीब तेईस सौ साल पुरानी प्राचीन प्रतिमा, बैलगाड़ी के पहिए टूटने से जुड़ी स्थापना की रोमांचक कथा और छत्तीस कौमों का सामूहिक सद्भाव इस तीर्थ को एक अनूठा स्वरूप प्रदान करते हैं। जालोर अंचल में स्थित यह पावन स्थल आज भी अपनी दिव्यता के बल पर श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है और राजस्थान की समृद्ध धार्मिक विरासत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

सवाल-जवाब

भांडवपुर जैन तीर्थ किस जिले में स्थित है?
भांडवपुर जैन तीर्थ राजस्थान के जालोर जिले की सायला तहसील के भुंडवा गांव में स्थित है।
यहाँ स्थापित भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा कितनी पुरानी है?
जैन परंपरा और मान्यताओं के अनुसार यहाँ विराजमान भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा लगभग 2300 वर्ष पुरानी है।
तीर्थ की स्थापना से कौन सी कथा जुड़ी है?
पालजी संघ द्वारा बैलगाड़ी से प्रतिमा ले जाते समय भांडूक वन के पास पहिया टूट जाने के बाद इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया था।
इस तीर्थ से कितने समुदायों के लोगों की आस्था जुड़ी है?
इस तीर्थ के साथ जैन समाज के अलावा छत्तीस कौमों और विभिन्न समुदायों के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·12 घंटे पहले

जालोर का यह स्थल केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्यटन और 'रूट टूरिज्म' के लिहाज से भी अपार संभावनाएं समेटे हुए है। बैलगाड़ी की इस ऐतिहासिक कथा को यदि क्यूरेटेड हेरिटेज वॉक और ट्रैवल सर्किट के रूप में विकसित किया जाए, तो यह डेस्टिनेशन लाइफस्टाइल और स्प्रिचुअल ट्रैवलर्स के बीच एक नया वैश्विक आकर्षण बन सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·14 घंटे पहले

यह रिपोर्ट राजस्थान के जालोर जिले में स्थित भांडवपुर जैन तीर्थ के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को गहराई से उजागर करती है। 2300 वर्ष पुरानी भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा और बैलगाड़ी के टूटने से जुड़ी इसकी स्थापना की लोककथा इस स्थल को केवल धार्मिक केंद्र ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सांस्कृतिक धरोहर का एक अहम हिस्सा बनाती है। सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि यह तीर्थ 'छत्तीस कौमों' और विभिन्न समुदायों की आस्था को जोड़ता है, जो ग्रामीण राजस्थान के सामाजिक ताने-बाने और साम्प्रदायिक सद्भाव की मजबूत तस्वीर पेश करता है। ऐसे स्थल ग्रामीण पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण की दृष्टि से भी विशेष महत्व रखते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·13 घंटे पहले

भांडवपुर जैन तीर्थ जैसे ऐतिहासिक और लोक-आस्था से जुड़े स्थल केवल धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। जिस प्रकार यह क्षेत्र 'छत्तीस कौमों' की साझी आस्था का केंद्र है, यदि स्थानीय प्रशासन और पर्यटन बोर्ड बुनियादी ढांचे, जैसे कि सड़क संपर्क और यात्री सुविधाओं का विकास करें, तो यह राजस्थान के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर एक मजबूत डेस्टिनेशन के रूप में उभर सकता है, जिससे क्षेत्रीय व्यापार और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

यह रिपोर्ट न केवल धार्मिक आस्था को बल्कि ग्रामीण अंचलों में सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक ताने-बाने को भी रेखांकित करती है। 'छत्तीस कौम' यानी सभी समुदायों की भागीदारी दर्शाती यह खबर बताती है कि कैसे ऐतिहासिक धरोहरें क्षेत्रीय एकता का माध्यम बनती हैं। एक पत्रकार के रूप में, मेरा मानना है कि ऐसे प्राचीन स्थलों के संरक्षण और वहां बुनियादी ढांचे के विकास पर प्रशासन के प्रयासों को भी रिपोर्ट में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि धार्मिक पर्यटन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को होने वाले लाभों पर भी रोशनी डाली जा सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

रोहन की बात से सहमति जताते हुए, मैं इसमें सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के पहलू को जोड़ना चाहूंगा। भांडवपुर जैसे प्राचीन तीर्थस्थलों पर स्थापित २३०० साल पुरानी बहुमूल्य मूर्तियां और ऐतिहासिक धरोहरें अक्सर अंतरराष्ट्रीय तस्करों और चोरों के निशाने पर रहती हैं। ऐसे संवेदनशील धार्मिक स्थलों के विकास के साथ-साथ वहां हाई-टेक सुरक्षा प्रणाली, सीसीटीवी निगरानी और पुलिस गश्त को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है। पर्यटन और भीड़ बढ़ने के साथ सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए बड़ी जिम्मेदारी होगी, ताकि इन अमूल्य सांस्कृतिक विरासतों को सुरक्षित रखा जा सके।

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