राजस्थान की राजधानी जयपुर अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के साथ-साथ पारंपरिक जड़ाव आभूषणों और हस्तकला के लिए समूचे विश्व में मशहूर है। इस गुलाबी नगरी में सदियों से चली आ रही मीनाकारी की गौरवशाली परंपरा आज भी पीढ़ियों के माध्यम से फल-फूल रही है। इसी समृद्ध विरासत को जिंदा रखने में 78 वर्षीय दिग्गज कलाकार डॉ. इंद्र सिंह कुदरत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इस बेमिसाल दस्तकारी के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार और प्रतिष्ठित शिल्प गुरु सम्मान से नवाजा जा चुका है। उनके पिता सरदार कुदरत सिंह भी अपने दौर में मीनाकारी के जादूगर के रूप में जाने जाते थे।
लाहौर से जयपुर तक का ऐतिहासिक सफर
पारंपरिक कारीगरी के इतिहास को साझा करते हुए डॉ. इंद्र सिंह कुदरत ने बताया कि उन्होंने यह हुनर अपने पिता सरदार कुदरत सिंह के सानिध्य में सीखा था। जयपुर में मीनाकारी का पदार्पण राजा-महाराजाओं के शासनकाल के दौरान हुआ था। यह प्राचीन कला मूल रूप से लाहौर से जयपुर लाई गई थी, जहां तत्कालीन शासकों ने उनके पूर्वजों को विशेष रूप से आमंत्रित कर जयपुर में बसाया था। इसके बाद से ही कुदरत परिवार की कई पीढ़ियां लगातार इस बारीक दस्तकारी को आगे बढ़ा रही हैं। इसी पारिवारिक परंपरा का अनुसरण करते हुए डॉ. इंद्र सिंह कुदरत ने भारत सहित वैश्विक स्तर पर अपनी एक विशिष्ट पहचान कायम की है।
सोने और चांदी पर रंगों का सजीव संसार
मीनाकारी की जटिल तकनीक को समझाते हुए डॉ. इंद्र सिंह ने बताया कि यह अत्यधिक धैर्य, बारीकी और कठिन परिश्रम की मांग करने वाली कला है। इसके अंतर्गत सोने तथा चांदी जैसी कीमती धातुओं की सतह पर रंगीन खनिज तत्वों के मिश्रण से मनमोहक आकृतियां उकेरी जाती हैं। इन नक्काशीदार आकृतियों में विशेष रूप से फूलों, पत्तियों और विभिन्न पक्षियों के रूपांकनों का सृजन प्रमुखता से किया जाता है। आभूषणों को अलौकिक चमक और आकर्षण देने के लिए लाल, गुलाबी, नारंगी, नीला, हरा, पीला तथा काले जैसे चटक रंगों का बखूबी इस्तेमाल होता है, जो धातु पर कांच जैसी स्थायी चमक बिखेरते हैं।
वैश्विक कूटनीति में भारतीय दस्तकारी का सम्मान
मौजूदा समय में मीनाकारी आभूषण और सजावटी कलाकृतियां केवल स्थानीय बाजारों या शादियों तक ही सीमित नहीं रह गई हैं। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों को भारत की सांस्कृतिक पहचान और समृद्ध शिल्पकला के प्रतीक स्वरूप ये वस्तुएं आधिकारिक उपहार के तौर पर भेंट की जाती हैं। इस संदर्भ का उल्लेख करते हुए डॉ. इंद्र सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी थाईलैंड यात्रा के दौरान थाई प्रधानमंत्री के पति पिटक सुकसावत को मीनाकारी से अलंकृत बाघ की आकृति वाले विशेष कफलिंक भेंट स्वरूप प्रदान किए थे।
सरकारी सहयोग और नई पीढ़ी का जुड़ाव
पारंपरिक हस्तशिल्प के भविष्य पर बात करते हुए डॉ. इंद्र सिंह कुदरत ने कहा कि यद्यपि आधुनिक दौर में कई पारंपरिक कलाएं लुप्त होने के कगार पर पहुंच रही हैं, लेकिन सरकार द्वारा मिलने वाले प्रोत्साहन से शिल्पकारों को नई ऊर्जा और आगे बढ़ने के बेहतर अवसर प्राप्त हो रहे हैं। कलाकारों को राष्ट्रीय सम्मानों के साथ अपनी कला को अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में प्रदर्शित करने का मंच भी मिल रहा है। पारिवारिक निरंतरता पर गर्व जताते हुए उन्होंने बताया कि जिस तरह उन्होंने अपने पिता से यह विद्या अर्जित की थी, उसी तरह उनके दोनों पुत्र भी पूरी लगन से इस कला से जुड़े हुए हैं और उन्हें भी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। इस तरह जयपुर की यह अनमोल सांस्कृतिक धरोहर पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित हाथों में आगे बढ़ रही है।


















