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जालोर में ड्रिप और मल्चिंग के जरिए मिर्च की खेती से किसानों को हो रहा बढ़िया मुनाफाराजस्थान
31 अक्तू॰ 2026, 6:27 pm (4 मिनट पहले)· 0

जालोर में ड्रिप और मल्चिंग के जरिए मिर्च की खेती से किसानों को हो रहा बढ़िया मुनाफा

राजस्थान के जालोर जिले में किसान पारंपरिक फसलों के बजाय आधुनिक तकनीकों के सहारे मिर्च की खेती कर रहे हैं, जिससे कम जमीन और सीमित पानी में भी अच्छी पैदावार और आमदनी मिल रही है।

राजस्थान के जालोर जिले में खेती-किसानी के तौर-तरीकों में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखा जा रहा है। यहां के काश्तकार अब केवल पारंपरिक अनाज या फसलों पर निर्भर रहने के बजाय ऐसी नकदी फसलों का रुख कर रहे हैं, जो कम रकबे में भी मजबूत वित्तीय मुनाफा दे सकें। इसी कड़ी में मिर्च की खेती किसानों के बीच मुनाफे का एक सशक्त जरिया बनकर उभर रही है। जिले के डुंगरी, आरवा और बड़गांव समेत आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खेतों में मिर्च की फसल लहलहा रही है। वर्तमान समय में पौधों के विकास और वानस्पतिक बढ़वार का दौर चल रहा है, जिसके चलते किसान इनकी नियमित देखभाल और पोषण प्रबंधन पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

ड्रिप सिंचाई और प्लास्टिक मल्चिंग से आसान हुआ प्रबंधन

मिर्च जैसी संवेदनशील फसल में बुआई की शुरुआत, जमीन की तैयारी और पौधों की सही कतारबद्ध व्यवस्था पैदावार तय करने में केंद्रीय भूमिका निभाती है। जालोर के प्रगतिशील किसान अब परंपरागत छिड़काव या खुला पानी देने के बजाय आधुनिक कृषि तकनीकों का भरपूर उपयोग कर रहे हैं। खेतों में मेड़बंदी यानी रिज प्लांटिंग के साथ ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग शीट बिछाकर पौधे रोपे जा रहे हैं। ड्रिप प्रणाली से पौधों की जड़ों तक सीधे जरूरत के अनुसार बूंद-बूंद पानी पहुंचता है, जिससे जल का अनावश्यक अपव्यय रुकता है। वहीं प्लास्टिक मल्चिंग जमीन में नमी को लंबे समय तक सुरक्षित रखती है, मिट्टी का तापमान संतुलित बनाए रखती है और अनावश्यक खरपतवारों को पनपने से पूरी तरह रोकती है, जिससे निराई-गुड़ाई का अतिरिक्त खर्च बच जाता है।

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कम संसाधनों में बेहतर पैदावार की उम्मीद

डुंगरी क्षेत्र में मिर्च की सफल खेती कर रहे किसान हिम्मताराम का कहना है कि इस फसल में रोपाई के शुरुआती दिनों से ही सघन निगरानी रखना बेहद जरूरी होता है। उनका मानना है कि ड्रिप और मल्चिंग के सम्मिलित इस्तेमाल से न केवल सिंचाई के पानी की भारी बचत होती है, बल्कि खेत का दैनिक रख-रखाव भी काफी सुगम बन जाता है। यदि समय पर सटीक सिंचाई की जाए और फसल पर मौसम के उतार-चढ़ाव की लगातार निगरानी रखी जाए, तो सीमित भूभाग से भी भरपूर और उच्च गुणवत्ता वाली पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

वैज्ञानिक तरीके से कीट और रोगों की रोकथाम

मिर्च की खेती में बदलते मौसम के प्रभाव से कई खतरनाक कीटों और रोगों का प्रकोप होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। इनमें मुख्य रूप से थ्रिप्स, माइट्स, फल छेदक सुंडी और पत्तों को सिकोड़ने वाला मोजेक वायरस फसल के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। इन खतरों से निपटने के लिए किसान खेतों में निरंतर निगरानी रख रहे हैं। कीटों की प्राथमिक पहचान और जैविक रोकथाम के लिए आवश्यकतानुसार खेतों में पीले और नीले स्टिकी ट्रैप लगाए जा रहे हैं, साथ ही वैज्ञानिक रोग प्रबंधन प्रणालियों के तहत ही अनुशंसित उपचार लागू किए जा रहे हैं।

संतुलित पोषण और खेत में हवा का संचार

फसल की गुणवत्ता और फलों के आकार को बेहतरीन बनाए रखने के लिए पानी के साथ-साथ पोषक तत्वों का संतुलित वितरण बेहद जरूरी माना जाता है। किसान ड्रिप तंत्र के माध्यम से ही तरल खाद सीधे पौधों की जड़ों में पहुंचा रहे हैं, जिससे उर्वरकों का पूरा उपयोग होता है और बर्बादी रुकती है। इसके अतिरिक्त, रोपाई के दौरान पौधों के बीच उचित दूरी का विशेष ध्यान रखा गया है, ताकि खेत में पर्याप्त धूप पहुंचे और हवा का अबाध आवागमन बना रहे। हवा और रोशनी का यह सही संचरण फंगल संक्रमण को रोकने और पौधों को स्वस्थ रखने में अनिवार्य भूमिका निभाता है। सीमित रकबे वाले छोटे किसानों के लिए यह समन्वित प्रबंधन व्यवस्था कम लागत में अधिकतम रिटर्न पाने का सबसे प्रभावी माध्यम साबित हो रही है।

सवाल-जवाब

जालोर के किन इलाकों में मिर्च की आधुनिक खेती तेजी से बढ़ रही है?
जालोर जिले के डुंगरी, आरवा और बड़गांव समेत आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान मिर्च की आधुनिक खेती कर रहे हैं।
खेती में ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक से क्या लाभ होता है?
ड्रिप से पौधों की जड़ों तक जरूरत के अनुसार पानी पहुंचता है और पानी की बचत होती है, जबकि मल्चिंग से मिट्टी में नमी बनी रहती है और खरपतवार नियंत्रित रहता है।
मिर्च की फसल को किन प्रमुख कीटों और रोगों से खतरा रहता है?
मिर्च की फसल में थ्रिप्स, माइट्स, फल छेदक सुंडी और मोजेक वायरस जैसी बीमारियों व कीटों का खतरा रहता है।
कीट प्रबंधन के लिए किसान कौन से उपाय अपना रहे हैं?
किसान खेतों की नियमित निगरानी कर रहे हैं और कीटों की रोकथाम के लिए जरूरत के अनुसार स्टिकी ट्रैप तथा वैज्ञानिक रोग प्रबंधन पद्धतियों का उपयोग कर रहे हैं।
खेत में पौधों के बीच उचित दूरी रखना क्यों जरूरी है?
पौधों के बीच उचित दूरी रखने से खेत में हवा का आना-जाना सुचारू रहता है और धूप ठीक से मिलती है, जो फसल के बेहतर स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
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