जैन परंपरा में सहजानंदी गिरनार भाव नव्वाणु यात्रा को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है, परंतु मूल तीर्थ पर लगभग चार हजार सीढ़ियां चढ़ना और उतनी ही उतरना उम्रदराज एवं अशक्त श्रद्धालुओं के लिए बड़ी शारीरिक चुनौती बन जाता है. बुजुर्गों की इसी शारीरिक विवशता को दूर करने और उनकी गहरी धार्मिक भावना को पूरा करने के उद्देश्य से राजस्थान के पाली में 21 उत्साही युवाओं ने एक अनूठा कदम उठाया. इन युवाओं ने 10 अक्टूबर से 26 अक्टूबर के बीच लगातार 17 दिनों तक दिन-रात परिश्रम करके गिरनार पर्वत का एक अत्यंत मनमोहक और सजीव मिनी मॉडल खड़ा कर दिया. पाली शहर के महावीर नगर स्थित श्री जिन कुशल कांति आराधना भवन में स्थापित यह प्रतिकृति उन सभी वरिष्ठ नागरिकों के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रही है जो मूल पर्वत की कठिन चढ़ाई करने में असमर्थ थे.
आराधना भवन में यह विशेष धार्मिक अनुष्ठान 27 अक्टूबर से प्रारंभ हुआ है और आगामी 23 नवंबर तक निरंतर चलेगा. इस पावन परिसर में रोजाना करीब 350 श्रद्धालु दर्शन, वंदन और साधना के लिए जुट रहे हैं. मूल तीर्थ की तुलना में यहां श्रद्धालु मात्र 2 घंटे की समयावधि में पूरे भक्ति भाव के साथ मिनी गिरनार जी की संपूर्ण यात्रा सम्पन्न कर पा रहे हैं. प्रत्येक साधक और आराधक के लिए 108 यात्राएं पूरी करने का पावन संकल्प निर्धारित किया गया है, जिसे पूरा करने में श्रद्धालु पूरे उत्साह से जुटे हुए हैं.
थर्माकॉल और टेंट की सामग्री से उभरे प्रमुख पावन स्थल
इस भव्य और विस्तृत मॉडल के निर्माण के लिए युवाओं ने मुख्य रूप से थर्माकॉल, लकड़ी और सामान्य टेंट सामग्री का बहुत ही कलात्मक उपयोग किया है. कारीगरी की विशेषता यह है कि इसमें गिरनार तीर्थ के सभी प्रमुख और पूज्य पड़ावों को हूबहू उसी रूप में उकेरा गया है. इस मॉडल में तलेटी आदेश्वर भगवान, जय तलेटी, दादा गुरुदेव की चरण पादुकाएं, अम्बिका माता का मंदिर, नेम दरबार, राजूल की गुफा और समवशरण मंदिर को बहुत ही बारीकी से दर्शाया गया है. इसके साथ ही भगवान के दीक्षा कल्याणक और केवलज्ञान कल्याणक के प्रसंगों को भी इस रचना में जीवंत स्वरूप प्रदान किया गया है, जिससे वहां पहुंचने वाले हर भक्त को मूल तीर्थ की उपस्थिति का वास्तविक अहसास होता है.
मुनि प्रशम सागर जी की प्रेरणा और दर्शन का महत्व
इस पूरे आध्यात्मिक प्रकल्प की आधारशिला मुनि प्रशम सागर जी महाराज के मार्गदर्शन से रखी गई. मुनि प्रशम सागर जी महाराज ने इस संबंध में स्पष्ट किया कि जैन दर्शन की मूल भावना में भावों अर्थात शुद्ध श्रद्धा को सर्वोपरि स्थान दिया गया है. उन्होंने बताया कि मूल गिरनार तीर्थ में लगभग 4,000 सीढ़ियां चढ़ने और लगभग 4,000 सीढ़ियां उतरने की अत्यंत कठिन शारीरिक प्रक्रिया होती है, जिसके चलते बड़ी संख्या में वृद्ध जन यात्रा की प्रबल इच्छा होते हुए भी वंचित रह जाते हैं. इसी समस्या का समाधान खोजने और श्रद्धालुओं के अंतर्मन के भावों को तृप्त करने के विचार से पाली में मिनी गिरनार का प्रारूप तैयार करने की योजना बनी, जिसे स्थानीय समाज और दानदाताओं के सहयोग से साकार रूप दिया गया.
अधूरी यात्रा को पूरा करने का मिला पावन अवसर
इस प्रतिरूप के बनने से उन वरिष्ठ नागरिकों के चेहरे खिल उठे हैं जो कभी गिरनार जाकर भी शारीरिक अक्षमता के कारण शिखर तक नहीं पहुंच पाए थे. ऐसे ही एक 68 वर्षीय श्रद्धालु जगदीश छाजेड़ ने अपनी भावनाएं साझा करते हुए बताया कि वे पूर्व में गिरनार तीर्थ की यात्रा पर गए थे, लेकिन शारीरिक कमजोरी और थकान के कारण उन्हें अपनी यात्रा बीच में ही अधूरी छोड़नी पड़ी थी. अब पाली में बने इस मिनी गिरनार मॉडल में पहुंचकर वे अपनी बरसों पुरानी अधूरी साधना और यात्रा के संकल्प को सहजता से पूरा कर पा रहे हैं. जैन मान्यताओं में गिरनार का स्थान बेहद सर्वोच्च है क्योंकि प्रभु नेमीनाथ जी को इसी पावन धरा पर मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, साथ ही चौबीसों तीर्थंकरों का आध्यात्मिक संबंध भी इस पावन भूमि से जुड़ा रहा है.
आयोजन और निर्माण में जुटा समाज का संयुक्त प्रयास
इस आध्यात्मिक निर्माण को धरातल पर उतारने और प्रतिदिन की व्यवस्थाओं को सुचारू रखने में समाज के अनेक लोगों का सक्रिय सहयोग रहा है. इस पूरी व्यवस्था और मॉडल निर्माण में रंकित धारिवाल, बंशीधर, बाबूलाल, जगदीशचंद, प्रेम प्रकाश, रतनलाल, सोहनलाल, भूरचंद और पवनकुमार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके साथ ही समस्त ट्रस्ट मंडल, ललित, अक्षय, विनय, अक्षत, प्रथम, राजू, प्रदीप, प्रवीण, आकाश तथा समस्त क्यूपी (Kyup) मंडल के सदस्यों का विशेष समर्पण और श्रम इस आयोजन को सफल बनाने में निरंतर लगा हुआ है.




















