राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित बख्तावरपुरा गांव आधुनिक दौर में ग्रामीण विकास, स्वच्छता और सामाजिक चेतना का एक अनूठा उदाहरण पेश कर रहा है। करीब ढाई सौ साल पहले खेतड़ी रियासत के शासक राजा बख्तावर सिंह ने इस गांव की नींव रखी थी। कभी महज साधारण खेती-किसानी तक सीमित रहने वाले इस इलाके ने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर शिक्षा और सफाई व्यवस्था में राज्य स्तर पर एक खास मुकाम हासिल किया है। वर्तमान में लगभग साढ़े चार हजार की आबादी वाले इस गांव की साक्षरता दर 100 प्रतिशत दर्ज की जाती है, जहां के बाशिंदे मुख्य रूप से कृषि कार्यों और सरकारी व निजी नौकरियों के जरिए अपनी आजीविका चलाते हैं।
रियासतकालीन इतिहास और गांव का विस्तार
इतिहास के पन्नों और क्षेत्रीय बुजुर्गों की स्मृतियों के अनुसार रियासतकाल के दौरान खेतड़ी जागीर के अंतर्गत कुल 555 गांव आते थे, जिनमें बख्तावरपुरा भी प्रमुखता से शामिल था। इस गांव की बसावट की शुरुआती कड़ी खुडाना गांव के गढ़ से जुड़ी है, जहां से कटेवा परिवार के लोग आकर यहां बसे थे। प्रारंभ में इस परिवार ने यहां की उपजाऊ जमीन पर खेती करना शुरू किया। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य सामाजिक वर्गों और जातियों के लोग भी इस भूभाग पर बसते चले गए, जिससे गांव का सामाजिक दायरा लगातार बढ़ता गया। खेतड़ी के तत्कालीन राजा बख्तावर सिंह के सम्मान में ही इस नई बस्ती का नाम बख्तावरपुरा रखा गया था। समय बीतने के साथ कटेवा परिवार ने न केवल कृषि क्षेत्र में प्रगति की, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भी अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई।
स्वच्छता अभियान और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान
बख्तावरपुरा के विकास पथ में सबसे बड़ा मोड़ स्वच्छता को लेकर चलाए गए जमीनी प्रयासों से आया। तत्कालीन सरपंच महेंद्र कटेवा के नेतृत्व में गांव की सूरत बदलने के लिए व्यापक स्तर पर निर्माण कार्य शुरू किए गए। गांव के हर घर में निजी शौचालयों का निर्माण कराया गया ताकि खुले में शौच से मुक्ति मिल सके। इसके साथ ही घरों से निकलने वाले गंदे पानी के व्यवस्थित निपटान के लिए सोखते गड्ढे तैयार किए गए, जिससे गलियों में जलभराव की समस्या पूरी तरह खत्म हो गई। वर्षा जल के संचयन और सदुपयोग के लिए मजबूत व्यवस्थाएं स्थापित की गईं और प्रशासनिक कामकाज को सुगम बनाने के लिए एक मिनी सचिवालय भी निर्मित हुआ।
इन संगठित प्रयासों का सुखद परिणाम यह रहा कि वर्ष 2007 में बख्तावरपुरा को राजस्थान का पहला निर्मल गांव घोषित किया गया। नई दिल्ली स्थित अंबेडकर भवन में आयोजित एक गरिमामय समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने तत्कालीन सरपंच महेंद्र कटेवा को इस राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा था। स्वच्छता के क्षेत्र में मिली इस ऐतिहासिक कामयाबी के ठीक अगले वर्ष, यानी 2008 में, गांव को जल संरक्षण के उत्कृष्ट प्रबंधन के लिए भी विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
बाबा नत्थूराम की कुटिया और पक्षी सेवा की शताब्दी पुरानी परंपरा
बख्तावरपुरा की ख्याति केवल पक्के निर्माण, साक्षरता और पुरस्कारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां का पर्यावरण और जीव दया से जुड़ा पहलू भी बेहद समृद्ध है। गांव के समीप बख्तावरपुरा, कंवरपुरा और विजयपुर की त्रिकोणीय सीमा पर बाबा नत्थूराम की करीब 100 साल पुरानी एक कुटिया स्थित है। यह स्थल पिछले एक दशक से पक्षी सेवा का जीवंत केंद्र बना हुआ है, जहां हर दिन सुबह और शाम हजारों परिंदों के लिए अनाज डाला जाता है। तीनों समीपवर्ती गांवों के निवासियों की इस आध्यात्मिक और परोपकारी परंपरा में अटूट आस्था है।
कुटिया समिति के प्रवक्ता कपिल कटेवा काशी के अनुसार, पक्षियों के संरक्षण की यह व्यवस्था जनसहयोग से निरंतर संचालित होती है। प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के पावन पर्व पर युवाओं की टोलियां तीनों गांवों में घर-घर संपर्क साधकर पक्षियों के लिए अन्न संग्रह करती हैं। इसके अलावा, गांव के परिवारों में जब भी कोई विवाह समारोह अथवा दशोठण जैसे मांगलिक अवसर होते हैं, तो लोग अपनी खुशी साझा करने के लिए कुटिया में अनाज दान करना अपना पहला कर्तव्य मानते हैं। ग्रामीण इस निरंतर सेवा को अपनी गौरवशाली विरासत और संस्कृति का अभिन्न अंग मानते हैं।





















