महादेव ऑनलाइन सट्टेबाजी सिंडिकेट से जुड़े एक बड़े घटनाक्रम में जांच एजेंसी को मुख्य कर्ताधर्ता सौरभ चंद्राकर की दो दिनों की ट्रांजिट रिमांड मिल गई है. ओमान से प्रत्यर्पण और निर्वासन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भारत पहुंचते ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने आरोपी को नई दिल्ली स्थित राउज एवेन्यू अदालत में प्रस्तुत किया था. सीबीआई मामलों के विशेष न्यायाधीश निखिल चोपड़ा ने मामले की सुनवाई करते हुए 2 नवंबर 2026 को यह आदेश पारित किया.
दिल्ली अदालत का आदेश और रायपुर ले जाने की तैयारी
जांच एजेंसी ने न्यायिक प्रक्रिया के तहत आरोपी को छत्तीसगढ़ ले जाने के लिए अदालत से दो दिन की ट्रांजिट रिमांड की गुहार लगाई थी. राउज एवेन्यू कोर्ट ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की इस अर्जी को स्वीकार कर लिया. अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि आरोपी को 4 नवंबर 2026 तक या उससे पहले रायपुर स्थित विशेष सीबीआई अदालत के समक्ष पेश किया जाए, ताकि मामले की विस्तृत कानूनी जांच आगे बढ़ सके.
फर्जी दस्तावेजों से ओमान में प्रवेश और गिरफ्तारी का घटनाक्रम
छत्तीसगढ़ के भिलाई स्थित सेक्टर-8 का रहने वाला सौरभ चंद्राकर लंबे समय से कानूनी एजेंसियों की नजरों से बच रहा था. ओमान में फर्जी यात्रा दस्तावेजों के जरिए गैरकानूनी तरीके से घुसने के आरोप में वहां के अधिकारियों ने उसे पकड़ा था. ओमान सरकार की तरफ से भारत को सौंपे जाने के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने 1 नवंबर 2026 को शाम 7:35 बजे उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया. रायपुर की विशेष अदालत ने पहले ही 9 सितंबर 2026 को आरोपी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया हुआ था.
दुबई स्थित मुख्यालय से संचालित होता था अवैध नेटवर्क
जांच के विवरण के मुताबिक सौरभ चंद्राकर ने अपने सहयोगी रवि उप्पल के साथ मिलकर महादेव बुक ऐप का नेटवर्क खड़ा किया और उसका प्रचार-प्रसार किया. इस अवैध सिंडिकेट के तहत इंटरनेट पर ऑनलाइन सट्टेबाजी के अनेक प्लेटफॉर्म तैयार किए गए थे. इस पूरे गिरोह का मुख्य कार्यालय दुबई में स्थापित किया गया था, जहां से विभिन्न गतिविधियों का प्रबंधन होता था. गैरकानूनी सट्टे से अर्जित भारी रकम को कई अलग-अलग बैंक खातों के जरिए घुमाकर संयुक्त अरब अमीरात भेजा जाता था.
अदालत में वकीलों की दलीलें और क्षेत्राधिकार पर स्थिति साफ
सुनवाई के दौरान सौरभ चंद्राकर के वकीलों ने ट्रांजिट रिमांड का विरोध करते हुए प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 21 का हवाला दिया. बचाव पक्ष का तर्क था कि ओमान की अदालत ने प्रत्यर्पण की अनुमति प्रवर्तन निदेशालय से संबंधित प्रकरण के तहत दी थी, न कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के मामले में. इसके जवाब में जांच एजेंसी के वरिष्ठ सरकारी वकील ने दलील दी कि यह कार्यवाही मात्र ट्रांजिट रिमांड के लिए है, क्योंकि गिरफ्तारी के चौबीस घंटे के भीतर आरोपी को संबंधित क्षेत्राधिकार वाली अदालत में पहुंचाना संवैधानिक व कानूनी अनिवार्यता है. जज निखिल चोपड़ा ने स्पष्ट किया कि वर्तमान अदालत का दायरा सिर्फ ट्रांजिट रिमांड तक सीमित है और पूरे मामले के गुण-दोष व अन्य विधिक बिंदुओं पर निर्णय लेने का अधिकार रायपुर की विशेष अदालत के पास ही है.



















