झुंझुनूं जिले के जसरापुर गांव में देशसेवा का एक अनोखा और प्रेरणादायी अध्याय लिखा जा रहा है। भारतीय सेना में सेवा पूरी कर वर्ष 2019 में सेवानिवृत्त हुए सूबेदार महेंद्र सिंह शेखावत ने आराम की जिंदगी चुनने के बजाय अपनी जन्मभूमि के नौजवानों का भविष्य संवारने का बीड़ा उठाया। अपने सैन्य जीवन के अनुशासन और तजुर्बे को उन्होंने गांव के उन युवाओं की ताकत बना दिया, जो सेना की वर्दी पहनकर सीमा पर खड़े होने का सपना देखते हैं। बीते सात सालों में उनके इस निशुल्क प्रशिक्षण अभियान ने ऐसी मिसाल पेश की है कि जसरापुर के 78 नौजवान भारतीय सेना और अग्निवीर योजना के तहत चयनित होकर देश की रक्षा में तैनात हो चुके हैं।
रिटायरमेंट के बाद शुरू हुआ निशुल्क प्रशिक्षण का मिशन
साल 2019 में जब महेंद्र सिंह सेना की सेवा से मुक्त होकर गांव लौटे, तो उन्होंने महसूस किया कि युवाओं में जज्बा तो बहुत है लेकिन सही मार्गदर्शन और शारीरिक फिटनेस के अभाव में वे सेना भर्ती रैलियों में पिछड़ जाते हैं। इसी कमी को दूर करने के लिए उन्होंने खेल मैदान में युवाओं को निशुल्क शारीरिक प्रशिक्षण देना शुरू किया। जो पहल कुछ लड़कों के साथ शुरू हुई थी, वह धीरे-धीरे एक बड़े मिशन में तब्दील हो गई। इस साल तो गांव ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया, जब एक साथ 13 युवाओं ने अग्निवीर चयन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पार कर सेना में जगह बनाई।
युवाओं के साथ खुद पसीना बहाते हैं पूर्व सूबेदार
महेंद्र सिंह का सिखाने का तरीका केवल मैदान के किनारे खड़े होकर निर्देश देने तक सीमित नहीं रहता। वे रोजाना सुबह और शाम के वक्त खुद खेल मैदान में उतरते हैं और युवाओं के साथ पसीना बहाते हैं। सेना भर्ती की बारीकियों, दौड़ की तकनीकों और शारीरिक दक्षता के हर पहलू को वे खुद अभ्यास करके समझाते हैं। युवाओं के भीतर अनुशासन और सहनशीलता विकसित करने के लिए वे किसी भी छात्र से एक पैसा शुल्क नहीं लेते।
सड़कों पर 12 किलोमीटर तक की कठिन दौड़ का अभ्यास
सेना भर्ती की तैयारी में स्टैमिना और दौड़ को सबसे निर्णायक माना जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए महेंद्र सिंह रोजाना 10 से 12 किलोमीटर तक की लंबी दौड़ का अभ्यास कराते हैं। इसके लिए वे जसरापुर से चनाना, नानूवाली बावड़ी या फिर देवता गांव की ओर जाने वाले रास्तों का चुनाव करते हैं। खास बात यह है कि इस पूरी दौड़ के दौरान महेंद्र सिंह खुद युवाओं के आगे या साथ कदमताल करते हुए दौड़ते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि जब तक गुरु खुद मैदान में पसीना नहीं बहाएगा, तब तक शिष्यों में समर्पण और अनुशासन की सच्ची भावना पैदा नहीं हो सकती।
ग्रामीणों और प्रवासी दानदाताओं ने सुधारी मैदान की सूरत
शुरुआती दिनों में यह सफर आसान नहीं था, क्योंकि गांव का खेल मैदान बेहद ऊबड़-खाबड़ और कंकड़-पत्थरों से भरा था। इससे अभ्यास के दौरान युवाओं को चोट लगने और दौड़ने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता था। इस समस्या को देखकर ग्रामीण विकास समिति सक्रिय हुई और मुंबई में रहने वाले प्रवासी भामाशाहों ने मदद का हाथ बढ़ाया। भामाशाहों के सहयोग से मैदान का समतलीकरण कराया गया और चारों ओर मजबूत तारबंदी की गई। इस सामूहिक प्रयास से मैदान की स्थिति बेहतर हो गई और वहां अभ्यास करने वाले युवाओं की संख्या भी लगातार बढ़ने लगी।
सफलता का श्रेय युवाओं और माता-पिता के संस्कारों को
हाल ही में जब एक साथ 13 युवाओं का चयन अग्निवीर में हुआ, तो पूरे गांव ने मिलकर एक भव्य सम्मान समारोह आयोजित किया। जब ग्रामीणों ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए महेंद्र सिंह शेखावत के निस्वार्थ प्रयासों की सराहना की, तो उन्होंने सारा श्रेय खुद लेने से मना कर दिया। उन्होंने विनम्रता से कहा कि यह पूरी सफलता युवाओं की हाड़-तोड़ मेहनत और उनके माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कारों का नतीजा है।
वर्दी के बिना भी जारी है देशसेवा की दूसरी पारी
महेंद्र सिंह के लिए गांव के किसी भी युवा का सेना में चुना जाना किसी बड़े मेडल से कम नहीं है। सात साल पहले शुरू हुआ उनका यह निस्वार्थ प्रयास आज जसरापुर के 78 परिवारों के लिए जीवन भर का गर्व बन चुका है। महेंद्र सिंह शेखावत ने यह साबित कर दिया है कि देशसेवा सिर्फ सीमा पर बंदूक थामकर ही नहीं होती, बल्कि अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद भी आने वाली पीढ़ी को तराशकर देश का मजबूत प्रहरी बनाया जा सकता है। रिटायरमेंट उनकी सरकारी नौकरी का अंत जरूर था, लेकिन राष्ट्र निर्माण के संकल्प की एक सशक्त शुरुआत बन गया।



















