राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित भीम-देवगढ़ तहसील की काछबली ग्राम पंचायत ने जनभागीदारी और महिला सशक्तिकरण की एक अनूठी नजीर पेश की है। करीब एक दशक पहले तक इस गांव की तस्वीर आज से पूरी तरह जुदा थी। गांव की गलियों में धड़ल्ले से बिकने वाली अवैध शराब ने पारिवारिक कलह, घरेलू हिंसा और अपराध को बढ़ावा दे रखा था, जिससे युवाओं का भविष्य बर्बादी की कगार पर पहुंच रहा था। इस गंभीर संकट से अपने परिवारों को उबारने के लिए गांव की महिलाओं ने संगठित होकर एक बड़े जनआंदोलन का बिगुल फूंका। इस जमीनी संघर्ष की कमान तत्कालीन सरपंच गीता रावत और जिला परिषद सदस्य हीरा कंवर ने संभाली, जिन्होंने पूरे क्षेत्र को नशामुक्त बनाने की दिशा में प्रेरित किया।
मार्च 2016 का ऐतिहासिक जनमत संग्रह और राजस्थान का पहला शराबमुक्त गांव
महिलाओं के अनवरत दबाव और कड़े विरोध के आगे आबकारी विभाग को झुकना पड़ा और पंचायत में बाकायदा मतदान कराने का फैसला हुआ। मार्च 2016 में हुए इस ऐतिहासिक मतदान में काछबली के लगभग 95 प्रतिशत मतदाताओं ने शराबबंदी के पक्ष में अपना मत दिया। इस जनादेश के साथ ही काछबली राजस्थान की ऐसी पहली ग्राम पंचायत बन गई, जहां लोकतांत्रिक वोटिंग के जरिए शराब का ठेका स्थायी रूप से बंद कर दिया गया। हालांकि, महिलाओं ने ठेका बंद होने के बाद भी अपनी सतर्कता में कोई कमी नहीं आने दी। गांव में किसी भी गुप्त रास्ते या अवैध माध्यम से शराब की आवक रोकने के लिए महिलाओं ने खुद के विशेष निगरानी दल गठित कर दिए।
सरपंच प्रत्याशियों के लिए अनिवार्य हुआ नशामुक्ति का सार्वजनिक संकल्प
काछबली के ग्रामीणों के लिए शराबबंदी का फैसला लागू करवाना जितना चुनौतीपूर्ण था, उससे कहीं अधिक कठिन काम इसे बीते 10 वर्षों तक लगातार कायम रखना रहा। ग्रामीणों ने इसे किसी एक व्यक्ति का काम मानने के बजाय पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी में तब्दील कर दिया। गांव में यह नियम बन चुका है कि पंचायत चुनाव में सरपंच पद के लिए ताल ठोकने वाले हर उम्मीदवार को पहले शराबबंदी को सख्ती से जारी रखने का संकल्प लेना होता है। तत्कालीन सरपंच गीता रावत के अनुसार, गांव के जागरूक नागरिक और महिलाएं आज भी हर वार्ड और मोहल्ले पर पूरी मुस्तैदी से अपनी नजर बनाए रखते हैं ताकि नियमों का उल्लंघन न हो।
चार पड़ोसी पंचायतों में भी फैला अभियान, शिक्षा और रोजगार में जबरदस्त उछाल
काछबली की इस क्रांतिकारी पहल का असर आसपास की अन्य पंचायतों पर भी तेजी से पड़ा। इसी प्रेरणा से मंडावर में वर्ष 2018 के दौरान 95 प्रतिशत वोट के साथ शराबबंदी लागू हुई। इसके बाद वर्ष 2021 में थानेटा पंचायत में 95 प्रतिशत ग्रामीणों के समर्थन से शराब पर पाबंदी लगाई गई, जबकि बरार और हामेला पंचायतों ने वर्ष 2020 से ही शराबबंदी को प्रभावी कर रखा है। इन सभी गांवों में एक सशक्त व्यवस्था तैयार की गई है, जिसके तहत समिति का प्रत्येक सदस्य अपने इलाके के करीब 20 घरों पर सीधी निगरानी रखता है। शराब के खात्मे से गांवों में अपराधों में भारी गिरावट दर्ज की गई और अध्ययन का सकारात्मक माहौल विकसित हुआ। इसी सामाजिक बदलाव का नतीजा है कि पिछले 10 वर्षों में इन नशामुक्त पंचायतों के 50 से अधिक युवाओं ने सरकारी नौकरियों में सफलता हासिल की है।

















