त्योहारी सीजन में जयपुर के प्रमुख सिंधी कैंप बस अड्डे से रोडवेज और निजी बसों के संचालन को शहर के बाहरी हिस्सों में ले जाने की कवायद पूरी तरह थम गई है। दिवाली के मौके पर जाम से निजात दिलाने के लिए यातायात पुलिस ने जो नया खाका तैयार किया था, चौतरफा विरोध और यात्रियों की दिक्कतों को देखते हुए उस पर यू-टर्न लेना पड़ा है। अब यह तय कर दिया गया है कि बसों की आवाजाही को लेकर पूर्व व्यवस्था ही लागू रहेगी। रोडवेज की एक्सप्रेस और वोल्वो सेवाओं के साथ निजी बसें भी सिंधी कैंप मुख्य बस स्टैंड से ही पहले की तरह चलती रहेंगी।
बाहर भेजने की योजना और विरोध की शुरुआत
दिवाली पर्व पर राजधानी की सड़कों पर वाहनों का भारी दबाव बढ़ जाता है। इसी भीड़भाड़ को नियंत्रित करने और सिंधी कैंप सहित आसपास के इलाकों को जाम से बचाने के इरादे से यातायात पुलिस ने 3 से 9 नवंबर तक बसों को शहर से बाहर चार अलग-अलग स्थानों से चलाने की योजना सार्वजनिक की थी। मकसद यह बताया गया था कि शहर के भीतर भारी बसों का प्रवेश रुकने से मुख्य मार्गों पर आवागमन सुचारू बना रहेगा। हालांकि, जैसे ही इस बदलाव का फरमान जारी हुआ, आम जनता, दैनिक यात्रियों और संगठनों की तरफ से कड़ा एतराज सामने आने लगा। सोमवार को दिनभर इस मुद्दे पर विरोध के सुर तेज होते रहे, जिसके बाद आखिरकार यातायात शाखा को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।
रोडवेज प्रशासन की दो टूक और विभागीय खींचतान
इस फैसले के सामने आते ही रोडवेज प्रबंधन और यातायात पुलिस के बीच खुली असहमति उभरकर सामने आ गई थी। रोडवेज के वरिष्ठ अधिकारियों ने साफ शब्दों में सिंधी कैंप को राज्य का केंद्रीय और मुख्य अधिकृत बस अड्डा बताते हुए वहां से ही परिचालन जारी रखने पर जोर दिया। रोडवेज का स्पष्ट तर्क था कि राज्य के विभिन्न जिलों और पड़ोसी राज्यों से जयपुर आने या यहां से जाने वाले यात्रियों के लिए सिंधी कैंप ही प्राथमिक संपर्क बिंदु है। अगर बसों को अचानक दूरदराज के इलाकों में भेज दिया जाता तो पूरा तंत्र चरमरा जाता। इसके अलावा रोडवेज ने ध्यान दिलाया कि ट्रांसपोर्ट नगर, हीरापुरा टर्मिनल, दुर्गापुरा और सीकर रोड पर यात्रियों की सुविधा के लिए पहले से ही निर्धारित स्टॉपेज काम कर रहे हैं, ऐसे में मुख्य बस अड्डे को पूरी तरह खाली कराने का कोई व्यावहारिक औचित्य नहीं बनता था।
यात्रियों पर अतिरिक्त खर्च और कनेक्टिविटी का संकट
प्रशासन की इस शिफ्टिंग योजना पर सबसे तीखा प्रहार यात्रियों की कनेक्टिविटी को लेकर हुआ। शहर के बाहर जिन चार स्थानों को वैकल्पिक स्टॉपेज बनाया गया था, वहां तक आम मुसाफिरों के पहुंचने के लिए कोई मुकम्मल सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था मौजूद नहीं थी। खासकर रेलवे स्टेशन पर उतरने वाले यात्रियों को यदि नए स्टैंड तक जाना पड़ता, तो उन्हें ऑटो रिक्शा या निजी कैब के लिए 500 रुपये तक का अतिरिक्त किराया जेब से ढीला करना पड़ता। जयपुर में सिटी बसों की सीमित संख्या के कारण लोगों को महंगे निजी साधनों का सहारा लेना मजबूरी बन जाता। महिलाओं, छोटे बच्चों, बुजुर्गों और भारी सामान लेकर सफर करने वाले परिवारों के लिए यह व्यवस्था भारी परेशानी का सबब साबित हो सकती थी।
बैठक के बिना फैसला लेने और निजी बसों पर विवाद
इतने बड़े पैमाने पर रूट बदलने से पहले संबंधित विभागों और हितधारकों के साथ कोई तालमेल नहीं बिठाया गया। यातायात पुलिस पर सवाल उठे कि लागू करने से पहले रोडवेज प्रशासन, जेसीटीएसएल, ऑटो चालक यूनियन और ई-रिक्शा प्रतिनिधियों के साथ कोई साझा समन्वय बैठक क्यों नहीं बुलाई गई। वहीं दूसरी तरफ, निजी बसों के सिंधी कैंप से संचालन को लेकर भी बहस छिड़ी रही। सिंधी कैंप के इर्द-गिर्द निजी ऑपरेटरों की बसों के अवैध पड़ाव और सड़क घेरने की वजह से अक्सर जाम की समस्या बनी रहती है। विरोध के बीच जब निजी ऑपरेटरों को भी पहले की तरह संचालन की छूट देने का रुख अपनाया गया, तो इस दोहरे मापदंड और स्थायी जाम के समाधान पर भी सवाल खड़े हो गए।
अधिकारियों की पुष्टि के बाद स्थिति स्पष्ट
मामले में स्थिति साफ करते हुए सिंधी कैंप के प्रबंधक राकेश राव ने जानकारी दी कि मुख्यालय की ओर से स्पष्ट निर्देश मिल चुके हैं कि सभी रोडवेज बसों का संचालन सिंधी कैंप से ही जारी रखा जाए और पुरानी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा। वहीं डीसीपी ट्रैफिक प्रवीण नायक ने भी इस बात की पुष्टि की कि शहर के बाहर अस्थायी बस अड्डे बनाने का विचार अब पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। रोडवेज अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा के बाद यह अंतिम सहमति बनी है कि रोडवेज और निजी बसें अपने पूर्व निर्धारित ठिकानों से ही काम करेंगी।


















