भारतीय सेनाएं आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों के अनुसार खुद को तेजी से ढाल रही हैं और इसमें घरेलू तकनीक सबसे अहम भूमिका निभा रही है। 3 अक्टूबर को जैसलमेर में रक्षा मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। इस बैठक को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देश के सुरक्षा तंत्र के कायाकल्प और तकनीकी आत्मनिर्भरता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि मौजूदा दौर में तकनीक सैन्य अभियानों का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है, जिसके बिना आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों का मुकाबला करना संभव नहीं है।
नई सैन्य टुकड़ियों का गठन और संगठनात्मक बदलाव
तीनों सेनाओं ने अपने पारंपरिक ढांचे में व्यापक सुधार किए हैं ताकि समकालीन युद्धक्षेत्र की मांगों को पूरा किया जा सके। भारतीय सेना के भीतर विशेष रूप से तैयार की गई असनी, भैरव और शक्तिबाण प्लाटून जैसी नई इकाइयां अब बेहद अहम साबित हो रही हैं। यह इकाइयां आधुनिक परिचालन जरूरतों और रणनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप त्वरित प्रतिक्रिया देने में सक्षम हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) लगातार नई परियोजनाएं संचालित कर रहा है, जिसके तहत अत्याधुनिक हथियारों, उन्नत मिसाइलों और आधुनिक रक्षा प्रणालियों के परीक्षण तेज गति से किए जा रहे हैं।
रक्षा बजट और आधुनिकीकरण पर बड़ा खर्च
सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसी प्रतिबद्धता के तहत सरकार ने लगातार रक्षा आवंटन में बढ़ोतरी की है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश का कुल रक्षा बजट बढ़कर 7 लाख 85 हजार करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गया है। इस विशाल बजट में से केवल सैन्य साजो-सामान के आधुनिकीकरण और नई खरीद के लिए 2 लाख 19 हजार करोड़ रुपए की विशेष व्यवस्था की गई है। सरकार का मुख्य ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि सेनाओं की जरूरतों की पूर्ति स्वदेशी विनिर्माण और भारतीय औद्योगिक इकाइयों के माध्यम से की जाए। सेनाएं भी अपने प्राथमिक कार्यों को प्राथमिकता देते हुए इस बजट का अनुशासित इस्तेमाल कर रही हैं।
घरेलू उत्पादन और निर्यात में ऐतिहासिक वृद्धि
आत्मनिर्भर भारत की पहल के तहत देश के रक्षा निर्माण और निर्यात दोनों में अभूतपूर्व उछाल देखने को मिला है। आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2014-15 में भारत का कुल रक्षा उत्पादन 46,429 करोड़ रुपए था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में एक नया रिकॉर्ड बनाते हुए 1 लाख 78 हजार करोड़ रुपए दर्ज किया गया। रक्षा सामग्री के वैश्विक निर्यात में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। वर्ष 2014 में जो रक्षा निर्यात 2,000 करोड़ रुपए से भी कम था, वह अब बढ़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। सरकार ने आने वाले समय के लिए और अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए हैं, जिसके तहत वर्ष 2029 तक घरेलू रक्षा उत्पादन को 3 लाख करोड़ रुपये और अंतरराष्ट्रीय रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने की योजना पर काम चल रहा है।
निजी क्षेत्र और एमएसएमई की बढ़ती भागीदारी
रक्षा निर्माण के परिदृश्य में अब केवल सरकारी उपक्रम ही नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र की कंपनियां और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) भी बड़ा योगदान दे रहे हैं। सरकार ने निजी उद्योगों को समान अवसर प्रदान किए हैं, जिससे नवाचार को गति मिली है। राजनाथ सिंह ने रेखांकित किया कि देश की सुरक्षा तैयारी किसी एक विभाग का काम नहीं बल्कि एक साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण है। उन्होंने सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति का उल्लेख करते हुए उद्योगों के कार्य और नवाचार पर गहरा संतोष व्यक्त किया।
सामरिक निर्भरता समाप्त करने का स्पष्ट विजन
रक्षा मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि देश की प्राथमिकता मात्र विदेशों से आधुनिक उपकरण खरीदना नहीं है। असली उद्देश्य एक ऐसा मजबूत और एकीकृत रक्षा ढांचा खड़ा करना है जहां सेनाओं की परिचालन संबंधी जरूरतों के मुताबिक स्वदेशी तकनीक तैयार हो। जब भारतीय उद्योग इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनेंगे, तभी भारत की रणनीतिक निर्भरता विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर पूरी तरह समाप्त हो सकेगी और देश दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएगा।


















