जालोर जिले में स्थित एक ढाई सौ साल पुरानी ऐतिहासिक बावड़ी हाल ही में अपनी अनूठी धार्मिक और प्राकृतिक घटना के कारण चर्चा में आ गई है। साल 2025 में इलाके में हुई मूसलाधार बारिश के चलते इस प्राचीन जलस्रोत का जलस्तर इस कदर बढ़ा कि पानी मंदिर के गर्भगृह में मौजूद शिवलिंग तक जा पहुंचा। स्थानीय लोगों के लिए यह कोई सामान्य घटना नहीं थी, क्योंकि ठीक पैंतीस साल बाद इस पवित्र परिसर में ऐसा अद्भुत दृश्य देखने को मिला था, जहां प्रकृति ने स्वयं महादेव का जलाभिषेक किया हो। इस प्राचीन बावड़ी का इतिहास और इसकी वास्तुकला आज भी जालोर के गौरवशाली अतीत की गवाही दे रही है।
तीन प्रमुख देवालयों का संगम और आस्था की कहानी
इस पावन परिसर को स्थानीय समाज में गोगड़ी बावड़ी के नाम से जाना जाता है। इस ऐतिहासिक परिसर की खासियत यह है कि यहां केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि तीन प्राचीन देवालय स्थापित हैं। इनमें मुख्य रूप से पातालेश्वर महादेव, गोगाजी महाराज और खेतलाजी के प्राचीन मंदिर शामिल हैं। इतिहासकार बंसीलाल सोनी के अनुसार, इस स्थान के नामकरण के पीछे लोक देवता गोगाजी के प्रति लोगों की गहरी श्रद्धा जुड़ी हुई है। प्राचीन समय में इस क्षेत्र में गोगाजी के उपासकों की एक बड़ी आबादी निवास करती थी, जिसके कारण धीरे-धीरे इस पूरे स्थल का नामकरण स्थानीय आस्था के अनुरूप हो गया। पहले इस मंदिर को मुख्य रूप से पातालेश्वर मंदिर कहा जाता था, जिसके भीतर से नीचे की ओर जाने वाली सीढ़ियां इस प्राचीन बावड़ी तक जाती थीं।
शिवलिंग और बावड़ी का पवित्र संबंध
इस परिसर में बनी बावड़ी का महत्व केवल पानी जमा करने तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका सीधा संबंध मंदिर की दैनिक पूजा और अनुष्ठानों से भी था। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, सदियों से पातालेश्वर महादेव के शिवलिंग का जलाभिषेक इसी बावड़ी के शुद्ध जल से किया जाता रहा है। मंदिर के भीतर से नीचे उतरती सीढ़ियां सीधे पानी तक पहुंचती हैं, जो इसकी अद्भुत प्राचीन वास्तुकला को दर्शाती हैं। एक समय था जब यह बावड़ी केवल आस्था का केंद्र नहीं थी, बल्कि पूरे आसपास के क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी भी थी। आधुनिक जलापूर्ति प्रणाली आने से पहले, इस पूरे इलाके की प्यास बुझाने का यह सबसे बड़ा और भरोसेमंद माध्यम हुआ करती थी।
सालों बाद लौटा वह अलौकिक नजारा
वर्ष 2025 में जालोर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में असाधारण रूप से भारी बरसात हुई। इस भारी बारिश का परिणाम यह हुआ कि सदियों पुरानी बावड़ी का जलस्तर तेजी से ऊपर चढ़ने लगा। देखते ही देखते पानी की लहरें ऊपर की सीढ़ियों को पार करते हुए सीधे पातालेश्वर महादेव के मुख्य शिवलिंग तक पहुंच गईं। स्थानीय बुजुर्गों और प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो ऐसा अद्भुत नजारा लगभग 35 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद दोबारा देखने को मिला था। इस स्वयंभू जलाभिषेक को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े थे, जिन्होंने इस पल को देवीय आशीर्वाद के रूप में महसूस किया।
आधुनिक युग में भी सुरक्षित है यह प्राचीन धरोहर
समय के चक्र के साथ भले ही आज घर-घर में नल कनेक्शन पहुंच चुके हैं और लोगों की पानी के लिए बावड़ी पर निर्भरता समाप्त हो गई है, लेकिन इस धरोहर की अहमियत कम नहीं हुई है। वर्ष 2026 में, यानी हाल ही में करीब दो-तीन महीने पहले, स्थानीय स्तर पर बावड़ी की सफाई और जांच का कार्य हाथ में लिया गया। इस दौरान वाटर पंप और पाइपों की सहायता से बावड़ी में जमा पानी को बाहर निकाला गया। इस सफाई अभियान के दौरान जब विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों ने बावड़ी की आंतरिक संरचना को करीब से देखा, तो हर कोई दंग रह गया। सैकड़ों वर्षों की सीलन और पानी के दबाव के बावजूद इस बावड़ी की प्राचीन दीवारें, सीढ़ियां और पत्थर पूरी तरह सुरक्षित और मजबूत स्थिति में पाए गए। स्थानीय लोग आज भी इस अनमोल विरासत के संरक्षण और नियमित रखरखाव में बढ़-चढ़कर योगदान दे रहे हैं।
















