राजस्थान की ऐतिहासिक धरती जालोर में मौजूद सांड बावड़ी आज अपने इसी अनोखे नाम से पहचानी जाती है, मगर अतीत के पन्नों में इसका एक अलग ही गौरवशाली परिचय दर्ज रहा है। पुराने दौर में इस प्राचीन जलस्रोत को स्वर्ण बावड़ी के नाम से जाना जाता था। इस बावड़ी के नाम बदलने के पीछे राजा वीरमदेव से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प और भावुक घटना शामिल है, जो इसे इलाके की तमाम दूसरी जल संरचनाओं से बिल्कुल जुदा बना देती है। इतिहासकार बंसीलाल सोनी के अनुसार, जालोर के शासक कान्हड़देव का वैवाहिक संबंध जैसलमेर के प्रतिष्ठित भाटी राजपूत घराने में हुआ था।
जैसलमेर से जालोर तक खतरे का संदेश
इस पारिवारिक और वैवाहिक रिश्ते की वजह से वीरमदेव का नाता जैसलमेर के राजपरिवार से भांजे के तौर पर था। उस समय जैसलमेर में यह गोपनीय सूचना मिली कि वीरमदेव के प्राण संकट में हैं और कोई षड्यंत्रकारी कपट से उन पर जानलेवा हमला करने या नुकसान पहुंचाने की साजिश रच रहा है। हालात की गंभीरता को देखते हुए जैसलमेर से फौरन जालोर संदेश भिजवाने का फैसला लिया गया ताकि वीरमदेव को समय रहते सतर्क किया जा सके। इस अति आवश्यक चेतावनी को पहुंचाने के लिए एक दूत को चुना गया, जो सांड की सवारी कर जालोर की ओर तेजी से रवाना हुआ।
बावड़ी पर सांड के प्राण त्यागने की घटना
संदेशवाहक को लेकर वह सांड इतनी अप्रत्याशित गति से दौड़ा कि जैसलमेर से चलकर उसी शाम जालोर की सीमा में आ पहुंचा। जालोर पहुंचते ही इसी बावड़ी के करीब अत्यधिक थकान के कारण उस सांड ने दम तोड़ दिया और उसकी मृत्यु हो गई। इसके पश्चात दूत ने बिना वक्त गंवाए पैदल ही जालोर दुर्ग की चढ़ाई की और राजा कान्हड़देव के सामने हाजिर होकर पूरा संदेश विस्तार से सौंपा। संदेश में साफ तौर पर चेताया गया था कि वीरमदेव की जान पर गहरा खतरा मंडरा रहा है, इसलिए उन्हें किसी भी संदेहास्पद इंसान के हाथों भोजन न परोसा जाए और उनकी चौतरफा सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा किया जाए। जिस स्थान पर सांड ने अपने प्राण त्यागे, उसी घटना के बाद स्वर्ण बावड़ी को लोग सांड बावड़ी पुकारने लगे।
किले की बावड़ियों से जुड़ाव और चमत्कारी मान्यताएं
इतिहासकारों के विश्लेषण के मुताबिक, सांड बावड़ी का गहरा संबंध जालोर किले के भीतर मौजूद ऐतिहासिक बावड़ियों से भी रहा है। यह स्थल केवल अपने नामकरण की दास्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि जालोर की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली और किले की समृद्ध विरासत का एक अभिन्न हिस्सा भी है। क्षेत्रीय लोक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस बावड़ी का जल कभी समाप्त नहीं होता था और यह कभी सूखती नहीं थी। पुराने समय में इस बावड़ी के पानी के छलकने यानी ओवरफ्लो होने की बातें भी प्रचलित रही हैं। यहां के जल को लेकर कई तरह की चमत्कारी धारणाएं लंबे समय से स्थानीय लोगों के बीच चली आ रही हैं।

















