बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र की पहचान देश भर में मखाना उत्पादन के प्रमुख केंद्र के रूप में होती रही है। इस इलाके में कई परिवार ऐसे हैं जो पीढ़ियों से मखाना तैयार करने और बेचने के काम में रमे हुए हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मधुबनी के किशोरी लाल चौक इलाके में रहने वाले सुनीता गुप्ता और उनके पति दीपक प्रसाद गुप्ता ने अपने पुश्तैनी काम को एक नई दिशा दी है। उनके परिवार में मखाने की खरीद-बिक्री का यह सिलसिला 100 साल से अधिक समय से चला आ रहा है। पहले यह कारोबार केवल मिथिलांचल के स्थानीय बाजारों तक सिमटा हुआ था, लेकिन इस दंपति ने अपनी नई सोच और बेहतर आपूर्ति व्यवस्था के दम पर इसे पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचा दिया है।
सीजन में भारी खरीदारी और कच्चा माल जुटाने की रणनीति
मखाना कारोबार की प्रकृति ऐसी है कि इसमें साल के कुछ खास महीनों के दौरान ही कच्चे माल की सबसे ज्यादा खरीदारी करनी पड़ती है। मखाने के कच्चे बीज को स्थानीय भाषा में गौरिया कहा जाता है। दंपति इस सीजन में भारी मात्रा में गौरिया की खरीद करते हैं। कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वे केवल मधुबनी के स्थानीय तालाबों पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि पूर्णिया सहित आसपास के अन्य प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों से भी बड़े पैमाने पर बीज मंगाते हैं। एक बार जब पर्याप्त मात्रा में कच्चा बीज इकट्ठा हो जाता है, तो उसे गद्दी पर पारंपरिक विधि से प्रोसेस करने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। पूरी तरह तैयार मखाने को सुरक्षित तरीके से स्टॉक करके रखा जाता है, ताकि साल के बाकी महीनों में मांग आने पर थोक और खुदरा दोनों तरह के खरीदारों को माल भेजा जा सके।
करोड़ों की पूंजी और सरकारी योजनाओं का सहारा
सुनीता गुप्ता के अनुसार इस पूरे व्यापार चक्र में शुरुआत में ही भारी आर्थिक निवेश की दरकार होती है। फसल के समय बड़ी मात्रा में गौरिया खरीदने और उसे प्रोसेस करके सुरक्षित रखने के लिए करोड़ों रुपये की पूंजी लगानी पड़ती है। जब तक तैयार माल की बिक्री शुरू नहीं होती, तब तक यह पूंजी इसी प्रक्रिया में फंसी रहती है। बाद में जैसे-जैसे साल भर बाजार से मांग निकलती है, वैसे-वैसे तैयार मखाना बिकता है और मुनाफा निकलकर सामने आता है। अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए यह दंपति सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले मखाना व्यवसाय ऋण और अन्य वित्तीय प्रोत्साहनों का भी नियमित रूप से लाभ लेता है। 100 साल पुराने पारिवारिक अनुभव के चलते उन्हें मखाने की गुणवत्ता, बाजार के उतार-चढ़ाव और ग्राहकों की प्राथमिकताओं की गहरी समझ है। यही वजह है कि आज बिहार से बाहर के व्यापारी और खुदरा ग्राहक भी उनसे सीधा संपर्क साधते हैं।
मशीन के बजाय हाथों से पारंपरिक प्रोसेसिंग
आजकल तमाम तरह के प्रसंस्करण कार्यों में मशीनों का दखल बढ़ चुका है, लेकिन इस दंपति के कारखाने में आज भी पूरी प्रक्रिया पारंपरिक तरीके से ही अपनाई जाती है। गद्दी पर मखाने को भूनने और उसकी पॉपिंग यानी लावा निकालने का नाजुक काम मशीनों से नहीं, बल्कि कारीगरों के हाथों से ही किया जाता है। इस काम के लिए करीब 5 से 6 महीने तक सात परिवारों के सदस्य दिन-रात मेहनत करते हैं। वे सुबह से शाम तक मखाने की छंटाई, भुनाई और पॉपिंग के काम में जुटे रहते हैं। जब मखाना पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो उसे बोरियों में भरकर गोदामों में सुरक्षित भंडारण किया जाता है। इसके बाद जैसे-जैसे देश भर से थोक और खुदरा ग्राहकों के ऑर्डर आते हैं, उसी अनुपात में मखाने की सुरक्षित पैकेजिंग कर गंतव्य तक रवाना किया जाता है।
स्थानीय गद्दी से राष्ट्रीय बाजार तक का सफर
सुनीता और दीपक गुप्ता ने अपने बुजुर्गों से विरासत में मिले काम को केवल रस्म अदायगी या पेट पालने का जरिया नहीं माना, बल्कि उसे एक संगठित व्यापार मॉडल में तब्दील कर दिया। स्थानीय मंडी से निकला उनका मखाना अब देश के कई राज्यों में पहुंच रहा है। साल भर माल का बफर स्टॉक रखने की चतुराई, प्रामाणिक और पारंपरिक हाथ से की जाने वाली प्रोसेसिंग, और मांग के अनुसार त्वरित आपूर्ति ने उनके इस 100 साल पुराने पारिवारिक काम को एक मजबूत पहचान दिला दी है।



















