राजस्थान की मरुधरा केवल अपनी अनूठी संस्कृति और रेत के धोरों के लिए ही नहीं, बल्कि अदम्य वीरता, बलिदान और चमत्कारी आस्था के लिए भी जानी जाती है। मारवाड़ अंचल का आऊवा गांव ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थान है, जहां का इतिहास 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के अमर अध्याय से गहराई से जुड़ा हुआ है। पाली जिले के मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गांव भक्ति और शक्ति के अनोखे संगम का गवाह रहा है। इस मिट्टी पर आऊवा राजघराने की कुलदेवी मां सुगाली का वास है, जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम के दौर में क्रांतिकारियों की संरक्षक देवी माना गया था।
10 सिर और 54 भुजाओं वाली अद्वितीय प्रतिमा
मां सुगाली की यह प्राचीन मूर्ति काले पत्थर से तराशी गई है और समूचे देश में अपने स्वरूप की इकलौती प्रतिमा मानी जाती है। इसके 10 मस्तक और 54 हाथ हैं, जो देवी के अत्यंत विराट और सर्वशक्तिमान रूप को दर्शाते हैं। प्रारंभ में यह दिव्य प्रतिमा आऊवा के किले के भीतर स्थापित थी। आऊवा के तत्कालीन शासक ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत मां सुगाली के अनन्य उपासक थे। लोक आस्था के अनुसार, मां सुगाली अपने भक्तों के संकट हरने वाली अत्यंत दयालु और शक्तिशाली देवी हैं, जिन्हें खासतौर पर महिलाओं और नन्हे बच्चों की रक्षा करने वाली कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।
जब अंग्रेजी फौज के सामने आंधी बनकर उतरी दिव्य शक्ति
साल 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब देश के कई छोटे-बड़े रजवाड़े ब्रिटिश हुकूमत के साथ खड़े नजर आ रहे थे, तब आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह छेड़ दिया था। उन्होंने विदेशी शासन को चुनौती देते हुए बगावत का परचम लहराया। मान्यता है कि जब भी ब्रिटिश फौज आऊवा पर धावा बोलने आती, रणक्षेत्र में एक रहस्यमयी काली आंधी छा जाती थी। अंग्रेजों को उस धूल भरी आंधी के बीच नंगी तलवारें भांजती वीरांगनाएं दिखाई पड़ती थीं, जिससे हमलावर सैनिकों में भारी भगदड़ मच जाती थी।
हमले की पूर्व सूचना और मॉक मेंसन का वध
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत को आऊवा पर होने वाले किसी भी ब्रिटिश सैन्य हमले की भनक पहले ही लग जाती थी। इसे मां सुगाली की विशेष अनुकंपा माना जाता था। स्वतंत्रता सेनानी रणभूमि में उतरने से पूर्व मंदिर में माता की विधिवत पूजा-अर्चना करते थे और शंखनाद कर युद्ध का बिगुल फूंकते थे। इसी अदम्य साहस और आस्था के दम पर आऊवा के वीर बांकुरों ने जोधपुर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेंसन को मौत के घाट उतार दिया था। क्रांतिकारियों ने मॉक मेंसन का सिर काटकर आऊवा किले की ऊंची प्राचीर पर लटका दिया था, जिसने ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी थी।
अंग्रेजों का खौफ और प्रतिमा का खंडन
आऊवा के रण में बार-बार मात खाने से ब्रिटिश हुकूमत बेहद बौखला गई थी। जब उनके गुप्तचर तंत्र ने यह खबर दी कि आऊवा के सैनिकों का असली मनोबल और सैन्य शक्ति मां सुगाली के आशीर्वाद से संचालित है, तो अंग्रेजी सेना ने सीधे आऊवा के किले को निशाना बनाया। भय और कुंठा में डूबे अंग्रेज सैनिकों ने मंदिर पर हमला बोल दिया। उन्होंने माता की पवित्र प्रतिमा पर गाय का रक्त डालकर उसे अपवित्र और खंडित कर दिया। इसके बाद वे उस ऐतिहासिक प्रतिमा को अपने साथ उठाकर ले गए।
गर्दन का तिरछा होना और पैनोरमा की स्थापना
स्वतंत्रता संग्राम समाप्त होने के बाद आऊवा शासक के वंशज और डिंगल भाषा के प्रसिद्ध कवि ठाकुर नाहर सिंह ने मां सुगाली की प्रतिमा को दोबारा मंदिर में स्थापित कराने का प्रयास किया। उस समय पत्थर से बनी इस प्रतिमा की गर्दन अपने आप एक ओर तिरछी हो गई। गर्दन का यह झुकाव आज भी लोगों के लिए असीम कौतूहल और गहरी आस्था का विषय बना हुआ है। समय बीतने के साथ इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने की मांग उठती रही। इसके बाद वर्ष 2018 में आऊवा गांव में 1857 प्रथम स्वाधीनता संग्राम पैनोरमा का निर्माण किया गया और उसे ग्रामीणों को सौंपा गया।
162 साल बाद हूबहू नई मूर्ति और नवरात्रि का उल्लास
पैनोरमा परिसर में 162 साल बाद मां सुगाली की ठीक वैसी ही 10 सिर और 54 हाथों वाली नई प्रतिमा बनाकर प्रतिष्ठापित की गई, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग आते हैं। वर्तमान समय में आऊवा के मुख्य मंदिर में दो प्रतिमाएं विराजमान हैं, जिनकी दैनिक पूजा-अर्चना एक साथ पूरी विधि-विधान से संपन्न होती है। नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान आऊवा गांव में श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है। राजस्थान के स्थानीय गांवों के अलावा पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर मां के दरबार में शीश नवाने पहुंचते हैं।






















