कमजोर मानसून की मार के चलते राजस्थान पर बीते दस वर्षों के सबसे गंभीर अकाल का साया मंडराने लगा है। मौसम संबंधी आंकड़ों और आपदा प्रबंधन की स्थिति से यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि प्रदेश के 11 से ज्यादा जिले इस समय भीषण सूखे के दौर से गुजर रहे हैं। खेतों में खड़ी फसलें पानी की कमी से सूख चुकी हैं और बांधों में जलस्तर तेजी से गिर रहा है। परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन आने वाले महीनों में पेयजल संकट दूर करने के लिए प्रभावित क्षेत्रों में पानी की विशेष ट्रेन चलाने की तैयारी कर रहा है।
पाली, जैसलमेर और जालोर में आधी से भी कम बारिश
प्रदेश के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में हालात सबसे अधिक चिंताजनक बने हुए हैं। विशेष रूप से पाली, जैसलमेर और जालोर में वर्षा का स्तर सामान्य के मुकाबले 50 प्रतिशत से भी नीचे रह गया है। इसके परिणामस्वरूप इन जिलों में खरीफ की खेती पूरी तरह तबाह हो चुकी है। इन तीन जिलों के अलावा सिरोही, राजसमंद, उदयपुर, हनुमानगढ़, बालोतरा, जोधपुर और बांसवाड़ा की अनेक तहसीलों में भी सूखे की स्थिति विकराल रूप ले चुकी है। संकट की जमीनी पड़ताल के लिए पटवारियों और प्रशासनिक अधिकारियों की टीमें लगातार खेतों और गांवों का दौरा कर रही हैं। प्रशासन द्वारा 15 अक्टूबर के बाद आधिकारिक रूप से अभावग्रस्त और सूखाग्रस्त जिलों की विस्तृत सूची घोषित की जाएगी।
बीते मानसून सत्र के मुकाबले बारिश के आंकड़ों में भारी गिरावट
यदि पिछले मानसून के आंकड़ों से इस वर्ष की तुलना की जाए, तो अंतर बेहद चौंकाने वाला नजर आता है। पिछले साल राज्य के 23 जिलों में सामान्य से 60 प्रतिशत तक ज्यादा वर्षा दर्ज की गई थी, जबकि इस बार राज्य का एक भी जिला ऐसा नहीं रहा जहां भारी या अत्यधिक वर्षा हुई हो। हालांकि तकनीकी वर्गीकरण में मौसम विभाग ने 24 जिलों को सामान्य वर्षा की श्रेणी में रखा है, लेकिन वास्तविक विश्लेषण दिखाता है कि इनमें से 18 जिलों में बारिश का रुझान नकारात्मक दायरे में रहा है। जयपुर, टोंक और चित्तौड़गढ़ जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सामान्य से 17 प्रतिशत से भी कम पानी बरसा। पूरे राजस्थान में केवल धौलपुर, डीग और सलूम्बर ही ऐसे जिले रहे, जहां वर्षा सामान्य से 24 से 28 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई।
बांधों में सिमटा जलस्तर और पानी की ट्रेन की सुगबुगाहट
बारिश की कमी का सीधा और गंभीर प्रभाव राजस्थान के जल भंडारों पर दिखाई दे रहा है। पिछले मानसून के समापन पर राज्य के बांध अपनी कुल जल संचयन क्षमता के 90.5 प्रतिशत तक भर चुके थे। इसके विपरीत इस वर्ष राज्य के बांधों में पानी का कुल स्तर मुश्किल से 62 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है। सबसे नाजुक स्थिति जोधपुर संभाग की है, जहां के बांधों में महज 16 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है। इस जल संकट के गहराने पर आपदा प्रबंधन तंत्र ने पाली तथा अन्य सूखाग्रस्त जिलों में पानी की ट्रेन चलाने के विकल्प पर काम करना शुरू कर दिया है। इससे पूर्व वर्ष 2022 के भीषण सूखे के दौरान भी पाली जिले में पेयजल आपूर्ति बनाए रखने के लिए पानी की ट्रेन संचालित की गई थी।
फसलों का विनाश, चारे का संकट और महंगाई की आशंका
सूखे की इस दोहरी मार से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र पूरी तरह चरमरा गए हैं। प्रमुख खरीफ फसलें जैसे बाजरा, मूंग, ग्वार, मोठ और सोयाबीन पानी के अभाव में खेतों में ही सूख कर नष्ट हो चुकी हैं। स्थानीय उत्पादन ठप होने से आने वाले समय में बाजरे और दालों की कीमतों में तीव्र उछाल आने की आशंका है, जिससे आम जनता पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा। इसके अलावा मवेशियों के लिए हरे और सूखे चारे की गंभीर कमी पैदा हो रही है। चारा महंगा होने के कारण दूध और डेयरी उत्पादों के दाम बढ़ने के आसार हैं। जरूरतों को पूरा करने के लिए राजस्थान को अन्य राज्यों से खाद्यान्न और पशु आहार मंगवाना पड़ सकता है, जिससे दैनिक मजदूरों और निम्न आय वर्ग के परिवारों का घरेलू बजट बुरी तरह प्रभावित होगा।
प्रशासन की ओर से शुरू किए गए आपातकालीन उपाय
गंभीर होते संकट को देखते हुए राज्य प्रशासन ने राहत कार्यों को गति देने के निर्देश दिए हैं। गांवों और ढाणियों में पेयजल की निरंतर उपलब्धता बनाए रखने के लिए टैंकरों से जलापूर्ति की व्यवस्था को 31 दिसंबर तक बढ़ा दिया गया है। त्वरित राहत पहुंचाने के उद्देश्य से सूखा प्रभावित जिलों के जिला कलेक्टरों को तात्कालिक कार्यों के लिए एक-एक करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत करने के विशेष वित्तीय अधिकार सौंपे गए हैं। साथ ही मवेशियों को बचाने और पशुपालकों को संबल देने के लिए बाड़मेर, बालोतरा और जैसलमेर सहित नजदीकी जिलों में नए चारा डिपो खोलने के कड़े आदेश जारी किए गए हैं।






















