कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार मेवाड़ अंचल में बेहद हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। यदि आप इस पावन अवसर पर राजस्थान के उदयपुर शहर और उसके आसपास भ्रमण की योजना बना रहे हैं, तो खूबसूरत झीलों तथा ऐतिहासिक धरोहरों को निहारने के साथ-साथ क्षेत्र के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में शीश नवाकर पुण्य लाभ कमा सकते हैं। मेवाड़ की पहचान सदियों पुरानी वैष्णव संस्कृति और कृष्ण भक्ति से जुड़ी रही है। यहां स्थित प्राचीन मंदिर न केवल अपनी भव्य वास्तुकला के लिए विख्यात हैं, बल्कि उनका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व भी गहरा है। जन्माष्टमी के उत्सव पर इन सभी देवालयों को रंग-बिरंगी रोशनी, फूलों और कलात्मक झांकियों से विशेष रूप से सजाया जाता है, जहां देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
नाथद्वारा में बाल स्वरूप श्रीनाथजी के दिव्य दर्शन
उदयपुर शहर से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नाथद्वारा का श्रीनाथजी मंदिर कृष्ण भक्तों के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। यह पावन धाम भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की भक्ति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित श्रीनाथजी की प्रतिमा में भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाए हुए स्वरूप में दर्शन देते हैं। जन्माष्टमी के विशेष पर्व पर नाथद्वारा में अलौकिक उत्सव का माहौल रहता है। मंदिर प्रशासन और सेवादारों की ओर से विभिन्न समय पर मनमोहक झांकियां सजाई जाती हैं। इस दौरान भगवान के भव्य श्रृंगार और दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। पूरे दिन मंदिर प्रांगण में गूंजते भजन-कीर्तन और शंखनाद से वातावरण पूरी तरह कृष्णमय हो जाता है।
राजसमंद के प्रसिद्ध चारभुजा जी मंदिर की महिमा
मेवाड़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में राजसमंद जिले में स्थित चारभुजा जी मंदिर का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। भगवान द्वारकाधीश को समर्पित यह प्राचीन मंदिर वैष्णव संप्रदाय की गहरी आस्था का प्रतीक है। इतिहास के पन्नों में इस मंदिर का धार्मिक महत्व सैकड़ों साल पुराना बताया गया है। जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर चारभुजा जी मंदिर में भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव का आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाता है। मध्यरात्रि को भगवान के जन्म के समय मंदिर परिसर जयकारों से गूंज उठता है। विशेष पूजा-अर्चना, दुग्धाभिषेक और भजन-कीर्तन के दौर के बीच हजारों भक्त भगवान के दर्शन कर अपनी मन्नतें मांगते हैं।
मंडफिया के श्री सांवलियाजी मंदिर की अनूठी परंपरा
चित्तौड़गढ़ जिले के मंडफिया कस्बे में स्थित श्री सांवलियाजी मंदिर भी जन्माष्टमी के अवसर पर श्रद्धालुओं के मुख्य आकर्षणों में से एक है। यहां विराजमान भगवान सांवलिया सेठ को साक्षात भगवान कृष्ण का ही रूप माना जाता है। राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से व्यापारी और श्रद्धालु सांवलिया सेठ के दरबार में माथा टेकने आते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां की अनूठी चढ़ावा परंपरा है, जहां भक्त अपने व्यापार और आय में भगवान को हिस्सेदार बनाकर गुप्त और प्रत्यक्ष दान अर्पित करते हैं। जन्माष्टमी पर मंदिर में विशेष पूजा विधान और भव्य आयोजनों की श्रृंखला चलती है। उदयपुर से सड़क मार्ग द्वारा मंडफिया की यात्रा बेहद सुविधाजनक है, जिससे पर्यटक आसानी से यहां पहुंचकर जन्मोत्सव का आनंद ले सकते हैं।
उदयपुर शहर के हृदय स्थल में स्थित ऐतिहासिक जगदीश मंदिर
यदि आप उदयपुर शहर की सीमा में रहकर ही धार्मिक दर्शन करना चाहते हैं, तो विश्व प्रसिद्ध सिटी पैलेस के समीप स्थित जगदीश मंदिर सबसे उत्तम विकल्प है। भगवान विष्णु के जगन्नाथ स्वरूप को समर्पित यह विशाल मंदिर उदयपुर की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की रीढ़ माना जाता है। इस मंदिर की स्थापत्य कला और नक्काशी हर दर्शक को मंत्रमुग्ध कर देती है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर बनी ऊंची सीढ़ियां और पत्थरों पर तराशी गई बारीक आकृतियां प्राचीन शिल्प कला का अद्भुत नमूना प्रस्तुत करती हैं। जन्माष्टमी के पर्व पर जगदीश मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। दिन भर चलने वाले विशेष पूजा-पाठ, आरती और धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के कारण मंदिर प्रांगण में अपार जनसैलाब उमड़ता है।



















