पाली जिले के इतिहास में कई ऐसी शख्सियतें दर्ज हैं जिन्होंने अपनी जिद और संघर्ष से समाज की धारा को ही बदल दिया। इतिहास के पन्नों में आमतौर पर बड़े युद्धों और राजवंशों का जिक्र मिलता है, लेकिन असली क्रांति वे लोग लाते हैं जो अन्याय और असमानता के खिलाफ जमीन पर उतरकर लड़ाई लड़ते हैं। पाली के गुंदोज गांव के रहने वाले रामप्रताप शर्मा एक ऐसे ही महानायक थे, जिन्होंने अपने जीवन के हर कदम पर दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ लोहा लिया। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने और सामंतों द्वारा पुश्तैनी जमीन पर कब्जा कर लिए जाने के बाद भी उनके हौसले में कोई कमी नहीं आई। हालात से मुकाबला करने के लिए उन्होंने पहले पुलिस विभाग का रुख किया और हेड कॉन्स्टेबल के पद तक पहुंचे।
लेकिन साल 1938 का एक वाकया उनके जीवन का पूरा रुख मोड़ देता है। जोधपुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का राष्ट्रवाद से ओतप्रोत ओजस्वी भाषण सुनकर उन्होंने खाकी वर्दी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। इसके बाद वे पूरी तरह से देश की आजादी और समाज में बराबरी की लड़ाई के लिए समर्पित हो गए। उस दौर में जब समाज में छुआछूत अपने चरम पर थी और दलित वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षा के रास्ते पूरी तरह बंद थे, तब रामप्रताप शर्मा ने एक किराए के मकान में राजस्थान की पहली दलित पाठशाला की शुरुआत की थी।
नेताजी के भाषण से बदली जिंदगी और छोड़ी पुलिस की नौकरी
इस संघर्ष की शुरुआत साल 1934 से जुड़ी है, जब अपने ननिहाल बगड़ी में एक खुली अदालत के दौरान उन्होंने सामंतों द्वारा कमजोरों और सेठ-साहूकारों पर हो रहे अत्याचारों को अपनी आंखों से देखा। इस घटना ने उनके भीतर अन्यायी व्यवस्था के खिलाफ बगावत की चिंगारी जला दी। उनकी इच्छा सेना में जाने की थी, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के चलते वे साल 1938 में जोधपुर पुलिस में बतौर हेड कॉन्स्टेबल भर्ती हो गए। इसी दौरान जब विदेश से लौटे नेताजी सुभाष चंद्र बोस जोधपुर आए, तो उनकी विशाल आमसभा की सुरक्षा व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी हेड कॉन्स्टेबल रामप्रताप शर्मा को ही सौंपी गई थी।
नेताजी के जोशीले भाषण और देशप्रेम के विचारों ने उनके मन पर ऐसा गहरा प्रभाव डाला कि उन्होंने साल 1939 में ही पुलिस की नौकरी से इस्तीफा सौंप दिया। नौकरी छोड़ने के बाद वे अपने गांव वापस लौटे और मारवाड़ लोक परिषद के साथ जुड़कर जागीरदारी प्रथा के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। अंग्रेजों और स्थानीय सामंतों के जुल्मों के खिलाफ उनका यह संघर्ष आने वाले दिनों में और अधिक तेज हो गया, जिसने मारवाड़ के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया।
जेल की सलाखों और हमलों के बावजूद नहीं डगमगाया हौसला
जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री के मार्गदर्शन में चलाए जा रहे सत्याग्रह आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण साल 1943 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन पर कई तरह के झूठे और बेबुनियाद मुकदमे लाद दिए गए। लगभग दो साल तक जेल की प्रताड़ना सहने के बाद साल 1945 में वे अदालत से बरी होकर बाहर आए। जेल की दीवारों से बाहर आते ही वे एक बार फिर किसानों के हक की लड़ाई में कूद पड़े। अंग्रेजों और जागीरदारों की नीतियों का मुखर विरोध करने के कारण उन्हें कई बार जानलेवा हमलों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उनका मजबूत इरादा कभी नहीं डगमगाया।
रामप्रताप शर्मा महात्मा गांधी के करीबी और विनोबा भावे के विचारों से बेहद प्रभावित थे। वे समाज में फैली छुआछूत की कुप्रथा के घोर विरोधी थे। उस समय जब दलित बच्चों के लिए स्कूलों के दरवाजे पूरी तरह बंद रखे जाते थे, तब उन्होंने सत्याग्रही सेठ पुखराज जैन से एक मकान किराए पर लिया और साल 1945 में एक ‘शिक्षा समिति’ का गठन कर राजस्थान की पहली दलित पाठशाला की स्थापना कर डाली। शिक्षा के इस दीप को जलाने के लिए उन्होंने अपने सगे भाई मगराज की सरकारी नौकरी तक छुड़वा दी और उन्हें इन बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंप दी। वक्त के साथ यह पाठशाला आगे बढ़ी और आजादी के बाद साल 1955 में इसे अंग्रेज अधिकारियों के पुराने बंगलों में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसे आज राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, गुंदोज के नाम से जाना जाता है।
सामाजिक सुधार और जनसेवा का अनूठा सफर
जयनारायण व्यास और मथुरादास माथुर जैसे दिग्गज नेताओं के मार्गदर्शन में रामप्रताप शर्मा ने पाली जिले के गांव-गांव की पैदल यात्रा की और छुआछूत के खिलाफ सामाजिक समरसता की अलख जगाई। वे केवल उपदेश देने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने एक दलित बच्ची को गोद लेकर उसे अपनी बेटी की तरह पाला, पढ़ाया-लिखाया और उसका विवाह भी संपन्न कराया। देश के स्वतंत्र होने के बाद वे अपने गांव के पहले सरपंच के रूप में चुने गए और साल 1954 में कांग्रेस पार्टी के पहले जिलाध्यक्ष बनने का गौरव भी उन्होंने हासिल किया। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर ग्रामीण विकास और सामाजिक सुधार तक का उनका यह सफर आज भी मारवाड़ की माटी में पूरी प्रेरणा के साथ याद किया जाता है।





















