राजस्थान के पाली जिले में कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में एक अनूठा बदलाव देखने को मिल रहा है। जिले के युवा किसान निर्मल चौधरी ने पारंपरिक खेती और सामान्य पशुपालन से आगे बढ़कर एक नई सोच अपनाई है। उन्होंने ऊंटनी के दूध के खास औषधीय महत्व को समझा और इसे केवल कच्चे दूध के रूप में बेचने के बजाय एक वैल्यू एडेड उत्पाद के रूप में प्राकृतिक साबुन तैयार करने की शुरुआत की। आज उनके द्वारा तैयार किए गए इस हर्बल साबुन की बाजार में काफी अच्छी मांग बन चुकी है।
दूध बेचने के बजाय साबुन बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई
ऊंटनी का दूध स्वास्थ्य के लिहाज से अत्यंत गुणकारी माना जाता है और वर्तमान समय में बाजार में इसके मिल्क पाउडर और चॉकलेट जैसे कई उत्पाद उपलब्ध हैं। इसके बावजूद निर्मल चौधरी ने साबुन निर्माण का विकल्प चुना। उनका मानना है कि मिल्क पाउडर अथवा चॉकलेट तैयार करने के लिए भारी निवेश, बड़े प्लांट और बेहद जटिल तकनीकी प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत साबुन एक ऐसा उत्पाद है जिसे महिलाएं बहुत आसानी से अपने घरों में भी तैयार कर सकती हैं। इसके अलावा ऊंटनी के ताजे दूध को दूरदराज के शहरी बाजारों तक सुरक्षित और ताजा पहुंचाना एक बहुत बड़ी व्यावहारिक चुनौती थी। इसी वजह से दूध को खराब होने से बचाने और स्थानीय स्तर पर ही उसकी उपयोगिता बढ़ाने के लिए वैल्यू एडिशन का रास्ता अपनाया गया।
शुरुआती अड़चनों के बाद बदला काम करने का तरीका
शुरुआती दौर में जब यह काम शुरू किया गया, तब कच्चे दूध की नियमित खपत उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पा रही थी। बाजार में तरल दूध की सीमित मांग को देखते हुए ध्यान सीधे साबुन निर्माण पर केंद्रित किया गया। साबुन बनाने की प्रक्रिया में दूध और बटर का भरपूर इस्तेमाल होता है, जिससे उत्पादित दूध की पूरी खपत स्थानीय स्तर पर ही संभव हो जाती है। यह साबुन त्वचा के लिए अत्यंत लाभकारी साबित हो रहा है। त्वचा में होने वाली खुजली और त्वचा से जुड़ी दूसरी सामान्य परेशानियों से राहत दिलाने में यह प्राकृतिक साबुन काफी असरदार माना जा रहा है, जिससे ग्राहकों के बीच इसकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ती चली गई।
पशुपालक परिवारों और स्थानीय महिलाओं को मिला आर्थिक संबल
निर्मल चौधरी के इस प्रयास ने न केवल एक नए उत्पाद को जन्म दिया है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत किया है। इस समय पाली क्षेत्र के 35 से ज्यादा ऐसे परिवार इस मुहिम से सीधे जुड़े हुए हैं जो पीढ़ियों से ऊंट पालन का काम करते आ रहे हैं। इन्हीं पशुपालकों से सीधे ऊंटनी का दूध खरीदा जाता है, जिससे उन्हें अपने घर के पास ही दूध का उचित और तय मूल्य मिल जाता है। इसके साथ ही गांव की महिलाओं को साबुन निर्माण के काम से जोड़कर घर बैठे कमाई का जरिया उपलब्ध कराया गया है। तैयार साबुन की बिक्री बेहद सहज है और उपभोक्ता इसके प्राकृतिक गुणों को काफी पसंद कर रहे हैं।
घर बैठे महिलाएं भी जुड़ सकती हैं इस बिजनेस मॉडल से
जिन ग्रामीण परिवारों या महिलाओं के पास ऊंट हैं, वे इस पहल के जरिए बिना किसी बड़े झंझट के अपनी नियमित आमदनी बढ़ा सकते हैं। चूंकि इस साबुन को बनाने का तरीका काफी सरल है, इसलिए महिलाएं घरेलू कामकाज के साथ-साथ इसे आसानी से बना सकती हैं। इस स्वरोजगार से जुड़ने की इच्छा रखने वाले लोग मिल्क स्टेशन के संचालक निर्मल चौधरी से सीधा संपर्क साध सकते हैं। इसके अलावा इस पूरे व्यवसाय मॉडल, काम शुरू करने के तरीकों और आवश्यक जानकारियों को मिल्क स्टेशन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी विस्तार से साझा किया गया है, ताकि कोई भी इच्छुक व्यक्ति इस स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ा सके।





















