राजस्थान के सीकर जिले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ खाटूश्यामजी के दरबार में भक्तों की भारी भीड़ के बीच खेल जगत से जुड़े जाने-माने चेहरे भी शीश नवाने पहुंच रहे हैं। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व तेज गेंदबाज रहे ईशांत शर्मा अपने पूरे परिवार के साथ खाटूधाम पहुंचे। मंदिर परिसर में कदम रखते ही उन्होंने विधिवत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ बाबा श्याम की पूजा-अर्चना संपन्न की और अपने परिवार के साथ-साथ पूरे देश की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना की।
मंदिर कमेटी ने भेंट किया श्याम दुपट्टा और पावन निशान
तीर्थ स्थल पर आगमन के दौरान श्री श्याम मंदिर कमेटी की तरफ से इस दिग्गज खिलाड़ी का गर्मजोशी से स्वागत किया गया। मंदिर कमेटी के मंत्री मानवेंद्र सिंह चौहान ने ईशांत शर्मा का अभिनंदन करते हुए उन्हें सम्मान स्वरूप श्याम दुपट्टा ओढ़ाया। इसके साथ ही कमेटी की ओर से उन्हें बाबा श्याम का पवित्र निशान और स्मृति के तौर पर विशेष प्रतीक चिह्न भी सौंपा गया। सम्मान समारोह और औपचारिक भेंट के पश्चात क्रिकेटर अपने परिजनों के साथ मुख्य गर्भगृह में दर्शन के लिए आगे बढ़े, जहां उन्होंने बाबा श्याम के दिव्य स्वरूप के दर्शन किए।
क्रिकेट के मैदान से भक्ति के आंगन तक
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी लंबी कद-काठी और धारदार तेज गेंदबाजी के दम पर लंबे समय तक भारतीय टीम की रीढ़ रहे ईशांत शर्मा ने टेस्ट प्रारूप में कई यादगार उपलब्धियां हासिल की हैं। मैदान पर अपनी आक्रामक गेंदबाजी के लिए पहचाने जाने वाले इस अनुभवी तेज गेंदबाज की धार्मिक यात्रा ने वहां उपस्थित अन्य श्रद्धालुओं और उनके प्रशंसकों का ध्यान भी आकर्षित किया। मंदिर के प्रांगण में मौजूद लोगों के बीच क्रिकेटर की एक झलक पाने की होड़ और खासा उत्साह देखा गया। मंदिर कमेटी के मंत्री मानवेंद्र सिंह चौहान ने इस अवसर पर कहा कि बाबा श्याम के प्रति हर भक्त के मन में अगाध श्रद्धा है और समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख लोगों का यहां आना इस धाम की व्यापक मान्यता को उजागर करता है।
हारे का सहारा कहलाने की पौराणिक गाथा
खाटूश्यामजी को जनमानस में हारे का सहारा माना जाता है और मान्यता के अनुसार उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का ही कलयुगी स्वरूप माना गया है। महाभारत काल की कथा के अनुसार भीम के पौत्र बर्बरीक जब कौरवों की तरफ से युद्ध में भाग लेने जा रहे थे, तब मार्ग में भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का वेश धरकर उनसे उनका शीश दान मांग लिया। बर्बरीक ने तनिक भी संकोच किए बिना सहर्ष अपना शीश भगवान को समर्पित कर दिया। इस अनुपम त्याग से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें यह वरदान दिया कि कलयुग के दौर में वे स्वयं श्याम के नाम से पूजे जाएंगे और जीवन में संघर्ष कर रहे असहाय व हारे हुए लोगों का सबसे बड़ा संबल बनेंगे। इसी वरदान के कारण सदियों से श्रद्धालु उन्हें हारे के सहारे के रूप में पूजते आ रहे हैं।



















