राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को सहेजने के साथ-साथ राज्य में धार्मिक पर्यटन को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए भजनलाल सरकार ने एक वृहद कार्ययोजना तैयार की है। इस विशेष परियोजना के अंतर्गत प्रदेश के 300 से अधिक प्रमुख मंदिरों और पवित्र स्थलों का संरक्षण, जीर्णोद्धार तथा सौंदर्याकरण किया जाएगा। योजना का मुख्य उद्देश्य दूर-दराज से आने वाले भक्तों और श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक नागरिक सुविधाओं का विस्तार करना है, जिससे आस्था के इन केंद्रों को विश्वस्तरीय पर्यटन स्थलों के रूप में स्थापित किया जा सके। बुनियादी ढांचे में सुधार के इस बड़े प्रयास से न केवल आध्यात्मिक यात्रियों का अनुभव सुखद होगा, बल्कि राज्य के विभिन्न अंचलों में रोजगार और व्यापार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
100 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृति और चरणबद्ध विकास की समयरेखा
राज्य सरकार इस संपूर्ण पुनर्विकास परियोजना को सुनियोजित और चरणबद्ध तरीके से धरातल पर उतार रही है। शुरुआती चरण में 148 धार्मिक स्थलों पर विकास कार्य शुरू करने के लिए लगभग 100 करोड़ रुपये की प्रशासनिक एवं वित्तीय मंजूरी प्रदान कर दी गई है। इन स्वीकृत कार्यों में प्राचीन संरचनाओं का संरक्षण, परिसर का सौंदर्याकरण, संपर्क मार्गों का निर्माण और पेयजल व विश्राम सुविधाओं का विस्तार शामिल है। वित्तीय आवंटन की समयरेखा को देखा जाए तो वर्ष 2024-25 के दौरान 39 धार्मिक स्थलों के विकास की घोषणा की गई थी। इसके बाद वर्ष 2025-26 के बजट में दायरा बढ़ाते हुए 278 अतिरिक्त स्थलों को बुनियादी ढांचा सुधार कार्यक्रमों से जोड़ा गया। अब सरकार का विशेष ध्यान वर्ष 2026-27 के लिए घोषित 16 प्रमुख स्थलों के कायाकल्प की स्वीकृतियों को तेजी से पूरा करने पर केंद्रित है।
प्रमुख तीर्थ क्षेत्रों और धार्मिक गलियारों का किया जाएगा विकास
धार्मिक पर्यटन के दृष्टिकोण से राजस्थान के लगभग हर जिले से महत्वपूर्ण आस्था केंद्रों को इस योजना में शामिल किया गया है। प्रसिद्ध कैलादेवी मंदिर और गोगामेड़ी स्थित गोगाजी मंदिर के विकास पर काम किया जा रहा है। इसके साथ ही कुम्हेर का दत्तात्रेय मंदिर, जयपुर का जमवाय माता मंदिर और भरतपुर का ऐतिहासिक गंगा मंदिर भी सौंदर्याकरण की इस सूची में प्रमुखता से शामिल हैं। कोटा शहर में स्थित प्रसिद्ध मथुराधीश जी मंदिर को एक भव्य धार्मिक कॉरिडोर के रूप में विकसित करने की तैयारी चल रही है, ताकि इसे अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर उभारा जा सके। वहीं विराटनगर स्थित नसियां जी और भरतपुर के दाऊ मदनमोहन मंदिर के परिसरों को भी नई सुविधाओं से सुसज्जित किया जाएगा।
त्रिनेत्र गणेश से तनोट माता तक सुधारी जाएंगी नागरिक सुविधाएं
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए दुर्गम और प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर ढांचागत सुविधाओं के विस्तार को प्राथमिकता दी जा रही है। रणथंभौर के ऐतिहासिक किले में स्थित प्रसिद्ध त्रिनेत्र गणेश मंदिर, जैसलमेर सीमा के निकट स्थित तनोट माता मंदिर और लोक देवता रामदेवरा के आस्था धाम में दर्शन व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए काम शुरू किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त सांभर लेक क्षेत्र में शाकंभरी माता मंदिर और पिंडवाड़ा स्थित मार्कण्डेश्वर महादेव मंदिर को भी इस योजना का हिस्सा बनाया गया है। राज्य की राजधानी जयपुर के अनेक ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिरों में भी जीर्णोद्धार और परिसर विकास के कार्य संपादित किए जा रहे हैं, जिससे तीर्थयात्रियों को कतार प्रबंधन और पार्किंग जैसी बुनियादी समस्याओं से राहत मिल सके।
पर्यटकों के रिकॉर्ड आंकड़ों के बीच धार्मिक पर्यटन पर विशेष ध्यान
राजस्थान में पर्यटन क्षेत्र लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। वर्ष 2023 में राज्य में 17 करोड़ 90 लाख घरेलू और 17 लाख विदेशी पर्यटकों का आगमन दर्ज किया गया था। वहीं वर्ष 2025 में यह आंकड़ा अभूतपूर्व रूप से बढ़कर 25 करोड़ 25 लाख घरेलू और 19 लाख 45 हजार विदेशी पर्यटकों तक पहुंच गया। मौजूदा वर्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो जून महीने तक ही 10 करोड़ 85 लाख घरेलू और 8 लाख 45 हजार विदेशी पर्यटक राजस्थान की यात्रा कर चुके हैं। सैलानियों की इस निरंतर बढ़ती संख्या को देखते हुए सरकार अपनी पर्यटन नीति में धार्मिक स्थलों को मुख्य आधार के रूप में विकसित कर रही है, ताकि हेरिटेज पर्यटन के साथ-साथ आध्यात्मिक पर्यटन का भी दायरा बढ़े।
स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और कारोबार को मिलेगी मजबूती
धार्मिक स्थलों के जीर्णोद्धार और वहां जनसुविधाओं के निर्माण का सीधा सकारात्मक प्रभाव स्थानीय अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलेगा। जब इन पवित्र स्थलों पर यात्रियों की आवाजाही बढ़ेगी, तो आसपास के क्षेत्रों में होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन सेवा, हस्तशिल्प और पूजा-सामग्री विक्रेताओं के व्यापार में बढ़ोतरी होगी। छोटे दुकानदारों और स्थानीय युवाओं के लिए स्व-रोजगार के नए द्वार खुलेंगे। सरकार का स्पष्ट मानना है कि धार्मिक विरासत का संरक्षण केवल आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की आर्थिक समृद्धि को गति देने का एक सशक्त माध्यम भी है।





















