राजस्थान के सीकर जिले में मौजूद सुप्रसिद्ध खाटूश्याम जी धाम में भक्तों के प्रवेश पर अस्थायी रोक लगाई गई है। विशेष धार्मिक अनुष्ठान और पवित्र परंपराओं के निर्वहन के कारण मंदिर के कपाट 19 घंटे के लिए श्रद्धालुओं के लिए बंद रखे जा रहे हैं। इस तय समय सीमा के दौरान देश और विदेश से आने वाले श्रद्धालु बाबा श्याम के दर्शन नहीं कर सकेंगे। श्री श्याम मंदिर कमेटी ने इस संबंध में पहले ही आधिकारिक सूचना जारी कर दी थी, ताकि दर्शनार्थियों को असुविधा का सामना न करना पड़े।
विशेष पूजा और तिलक श्रृंगार की गोपनीय परंपरा
खाटूश्याम जी मंदिर के पट इतनी लंबी अवधि के लिए बंद किए जाने के पीछे एक प्राचीन और रहस्यमयी परंपरा जुड़ी हुई है। श्री श्याम मंदिर कमेटी के कोषाध्यक्ष रवि सिंह चौहान के अनुसार, मंदिर में वर्षों से यह नियम चला आ रहा है कि अमावस्या की विशेष तिथि पर बाबा श्याम को स्नान कराया जाता है। इस स्नान प्रक्रिया के समय बाबा के मुख पर स्थित आकर्षक एवं प्रसिद्ध तिलक श्रृंगार को पूरी तरह हटाया जाता है।
जब पुराना तिलक श्रृंगार उतारा जाता है, तब बाबा श्याम अपने वास्तविक और मूल शालिग्राम स्वरूप में प्रकट होते हैं। एक पूरे महीने में केवल यही कुछ दुर्लभ क्षण होते हैं जब मंदिर के मुख्य पुजारियों को बाबा के इस अलौकिक शालिग्राम रूप को देखने और पूजन करने का सौभाग्य मिलता है। इसके उपरांत, विधि-विधान से वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ शालिग्राम स्वरूप पर पुनः नया तिलक श्रृंगार किया जाता है। इस पूरी धार्मिक प्रक्रिया में बहुत अधिक समय और एकाग्रता की आवश्यकता होती है। अत्यंत गोपनीयता और पवित्रता के साथ संपन्न होने वाली इस पूजा में केवल मंदिर के अधिकृत पुजारियों को ही शामिल होने की अनुमति होती है।
दर्शन की समय सारणी और समिति की अपील
मंदिर प्रबंधन द्वारा तय कार्यक्रम के अनुसार, 16 सितंबर यानी बुधवार की रात्रि 10 बजे शयन आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए। इसके बाद अगले दिन 17 सितंबर यानी गुरुवार को दिनभर मंदिर के पट पूरी तरह बंद रहे। लगभग 19 घंटे चलने वाले इस विशेष अनुष्ठान के संपन्न होने के बाद, गुरुवार शाम 5 बजे संध्या आरती के पावन अवसर पर मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए दोबारा खोल दिए जाएंगे।
श्री श्याम मंदिर कमेटी ने दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले सभी भक्तों से विशेष अपील की है कि वे मंदिर आने से पूर्व समय सारणी का पूरी तरह ध्यान रखें। पट बंद रहने की अवधि के दौरान मंदिर परिसर में न पहुंचें, ताकि किसी भी प्रकार की भीड़भाड़ या असुविधा से बचा जा सके।
महाभारत काल से जुड़ी 'हारे के सहारे' की पौराणिक कथा
बाबा खाटूश्याम जी को पूरे संसार में 'हारे का सहारा' माना जाता है और भक्त उन्हें कलयुग में भगवान श्रीकृष्ण का ही एक स्वरूप मानते हैं। धार्मिक मान्यताओं और महाभारत की कथा के अनुसार, बाबा श्याम पांडव पुत्र भीम के पौत्र और वीर घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक हैं। महाभारत के भीषण युद्ध के दौरान बर्बरीक ने कौरवों और पांडवों के बीच हो रहे युद्ध में भाग लेने का निर्णय लिया था। उन्होंने अपनी माता को वचन दिया था कि वे युद्ध में केवल उसी पक्ष का साथ देंगे जो हार रहा होगा।
बर्बरीक की असीम शक्तियों और संहारक धनुर्विद्या के बारे में जानकर भगवान श्रीकृष्ण चिंतित हो गए। युद्ध का संतुलन बनाए रखने के लिए श्रीकृष्ण एक विप्र यानी ब्राह्मण का रूप धारण करके बर्बरीक के समक्ष उपस्थित हुए और उनसे दान में उनका शीश मांग लिया। दानवीर बर्बरीक ने बिना किसी संकोच के अपने हाथ से अपना सिर काटकर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया।
बर्बरीक के इस अद्वितीय त्याग और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में उन्हें श्रीकृष्ण के ही नाम 'श्याम' से पूजा जाएगा। इसके साथ ही भगवान ने यह आशीर्वाद भी दिया कि जो भी दुखी, हताश और निराश व्यक्ति सच्चे मन से उनकी शरण में आएगा, बाबा श्याम उसके सभी कष्ट दूर करके उसके सबसे बड़े मददगार बनेंगे। इसी वरदान के कारण आज करोड़ों श्रद्धालु उन्हें 'हारे के सहारे' के नाम से पूजते हैं।

















