फैशन की दुनिया में आधुनिक परिधान तैयार करने के लिए प्रायः प्रतिष्ठित डिजाइनिंग संस्थानों की महंगी पढ़ाई और जटिल कंप्यूटर सॉफ्टवेयर का सहारा लिया जाता है। इसके विपरीत, राजस्थान के कोटा शहर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कैथून कस्बे की ग्रामीण महिलाएं बिना किसी औपचारिक डिग्री या संस्थानिक प्रशिक्षण के ऐसी साड़ियां तैयार कर रही हैं, जिनकी चमक देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंच रही है। यह हुनर किसी आधुनिक क्लासरूम की देन नहीं, बल्कि हथकरघे पर पीढ़ियों से चली आ रही साधना और अनूठे अनुभव का परिणाम है।
हुनर की मिसाल: बिना स्कूल गए बनीं कुशल शिल्पकार
कैथून की इन कारीगर महिलाओं की दास्तान जितनी प्रेरणादायक है, उनकी जीवनचर्या उतनी ही कठोर परिश्रम से भरी है। इनमें से कई महिलाओं ने कभी औपचारिक विद्यालय का रुख नहीं किया, तो कुछ ने केवल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है। इसके बावजूद धागों के सटीक संयोजन, रंगों के मेल और बुनाई की सूक्ष्म बनावट पर उनकी पकड़ किसी भी पेशेवर डिजाइनर से कमतर नहीं बैठती।
इस कस्बे में तायरा बानो, अजिजन, नसीम और शबाना जैसी कई महिलाएं अपने हाथों से कोटा डोरिया का ताना-बाना बुन रही हैं। 60 वर्ष की तायरा बानो ने कभी स्कूल में कदम नहीं रखा, किंतु हथकरघे के साथ उनका जुड़ाव बीते 45 वर्षों से अनवरत जारी है। रंगों और जटिल डिजाइनों की उनकी समझ इसी साढ़े चार दशक के व्यावहारिक अभ्यास से निखरी है। इसी प्रकार अजिजन भी कभी स्कूल नहीं गईं, पर पिछले 25 वर्षों से लगातार बुनाई कर रही हैं; उनके लिए उनका हथकरघा ही पाठशाला रहा है और धागे ही उनकी पुस्तकें बनी हैं।
वहीं 40 वर्षीय नसीम केवल पांचवीं कक्षा तक पढ़ी हैं और पिछले 15 वर्षों से साड़ियों की डिजाइनिंग तथा बुनाई के काम में समर्पित हैं। शबाना भी पांचवीं कक्षा तक ही शिक्षा ग्रहण कर सकीं, किंतु उन्हें इस पारंपरिक शिल्प में 25 वर्षों का लंबा अनुभव प्राप्त है। इन महिलाओं ने किसी फैंसी डिजाइनिंग कोर्स के बिना, प्रतिदिन करघे पर बैठकर और अभ्यास के जरिए यह असाधारण कला सीखी है।
महीने भर की कड़ी मेहनत और आमदनी का अंतर
कैथून की इन महिला बुनकरों की दिनचर्या बेहद कठिन और थकाऊ होती है। बुनकरों को हर दिन लगभग 12 घंटे लगातार हथकरघे पर बैठकर एकाग्रचित्त होकर काम करना पड़ता है, जबकि पूरे सप्ताह में केवल एक दिन ही आराम के लिए मिलता है। एक साधारण साड़ी को पूर्ण रूप से तैयार करने में औसतन 30 दिनों का समय लग जाता है।
इतने लंबे समय और निरंतर श्रम के उपरांत बुनकर महिला को एक साड़ी के बदले लगभग 10 हजार रुपये का पारिश्रमिक मिलता है। यदि पूरे महीने की इस मेहनत का दैनिक विश्लेषण किया जाए, तो उनकी रोज की आय करीब 380 रुपये बैठती है, जो प्रति घंटे के हिसाब से लगभग 32 रुपये की मजदूरी के बराबर है। दूसरी ओर, बाजार में इन उत्कृष्ट कोटा डोरिया साड़ियों की कीमत 1,000 रुपये से प्रारंभ होकर विशिष्ट डिजाइनों में 3 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। साड़ी की यह अंतिम कीमत उसके डिजाइन, उपयोग किए गए धागों की गुणवत्ता और उस पर किए गए बारीक शिल्प कार्य के आधार पर तय की जाती है।
मैसूर से राजस्थान तक का ऐतिहासिक सफर
कैथून में कोटा डोरिया बुनाई का इतिहास अत्यंत समृद्ध है और यह परंपरा 100 वर्ष से भी अधिक पुरानी मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, मैसूर से आए कुछ परिवारों ने कैथून में आकर इस विशेष बुनाई कला की नींव रखी थी। कालांतर में इस शिल्प को कोटा के राजपरिवार का खुला संरक्षण प्राप्त हुआ, जिसके चलते इसे पूरे क्षेत्र में व्यापक प्रतिष्ठा और पहचान मिली।
समय के साथ यह शिल्प कैथून की मूल पहचान बन गया और पीढ़ियों के माध्यम से एक परिवार से दूसरे परिवार तक हस्तांतरित होता चला गया। कोटा डोरिया साड़ियों की सबसे प्रमुख विशेषता उनका हल्का वजन और सूक्ष्म चौखानेदार बुनावट है, जिसे पारंपरिक रूप से 'खट' कहा जाता है। इसे बनाने में शुद्ध कपास और प्राकृतिक रेशम के धागों का उपयोग किया जाता है। बिजली से चलने वाले आधुनिक पावरलूम के बजाय कारीगर पारंपरिक लकड़ी के हथकरघों पर अपने हाथों से प्रत्येक धागा पिरोते हैं, जिसके कारण इस प्रक्रिया में भारी श्रम और धैर्य की आवश्यकता होती है।
चावल और प्याज के लेप से तैयार होते हैं धागे
कोटा डोरिया साड़ी की बुनाई सीधे हथकरघे पर शुरू नहीं की जा सकती; इसके पीछे एक लंबी और पारंपरिक तैयारी जुड़ी होती है। सबसे पहले कच्चे धागों को छांटकर तैयार किया जाता है और उसके बाद उन्हें तान पर चढ़ाया जाता है। धागों को आवश्यक मजबूती प्रदान करने तथा बुनाई के दौरान उनके टूटने के जोखिम को समाप्त करने के लिए चावल और प्याज से तैयार किए गए विशेष पारंपरिक लेप का प्रयोग किया जाता है।
जब धागे पूरी तरह मजबूत हो जाते हैं, तब निर्धारित रंग और डिजाइन के अनुसार उन्हें हथकरघे पर व्यवस्थित रूप से लगाया जाता है। इसके पश्चात सबसे जटिल चरण प्रारंभ होता है, जिसमें बुनकर एक-एक धागे को आपस में जोड़कर चौखानेदार संरचना तैयार करती हैं। साड़ी की श्रेणी और उसमें प्रयुक्त सामग्री के अनुसार उसके निर्माण में लगने वाला समय भी अलग-अलग होता है
- सामान्य कोटा डोरिया साड़ी को पूर्ण रूप से तैयार करने में करीब 15 से 20 दिन का समय लगता है।
- विशिष्ट पैटर्न वाली डिजाइनर साड़ी को तैयार करने में 20 से 25 दिन लग जाते हैं।
- सोने और चांदी के महीन तारों से सजने वाली पारंपरिक जरिया साड़ी के निर्माण में लगभग तीन महीने का लंबा वक्त लगता है।
- जरिया साड़ी के निर्माण में तीन से चार बुनकर महिलाएं एक साथ मिलकर कार्य करती हैं, जिसमें परिवार के अन्य सदस्य भी हाथ बंटाते हैं।
हजारों परिवारों के जीवनयापन का मजबूत आधार
कैथून और उसके आसपास के ग्रामीण अंचल में कोटा डोरिया का काम केवल एक धरोहर कला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हजारों लोगों की आजीविका की जीवनरेखा बना हुआ है। कैथून तथा नजदीकी 12 गांवों में वर्तमान में लगभग 3,000 हथकरघे संचालित हो रहे हैं, जिनसे सीधे तौर पर करीब 6,000 लोग जुड़े हुए हैं।
इस पूरे क्षेत्र में प्रतिदिन लगभग 400 से 500 साड़ियां बुनकर तैयार की जाती हैं। अनेक परिवारों का संपूर्ण भरण-पोषण पूरी तरह इसी बुनाई कार्य से होने वाली आय पर आश्रित है। इन ग्रामीण घरों में महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों को संभालने के साथ-साथ हथकरघे पर बैठकर परिवार की आर्थिक स्थिति को संबल प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
स्थानीय बाजारों से लेकर विदेशों तक भारी मांग
कोटा डोरिया साड़ियों की लोकप्रियता केवल राजस्थान अथवा देश के बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। देश के विभिन्न कोनों के अतिरिक्त विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय भी अपने रिश्तेदारों और परिचितों के माध्यम से कैथून से सीधे साड़ियां मंगवाते हैं।
इसकी कीमतें गुणवत्ता और कारीगरी के अनुसार भिन्न-भिन्न स्तरों पर उपलब्ध हैं। सामान्य साड़ियां लगभग 1,000 रुपये के बजट में आसानी से मिल जाती हैं, जबकि असली सोने-चांदी के तारों और उच्च गुणवत्ता वाले रेशम से तैयार की गई दुर्लभ जरिया साड़ियों का मूल्य 3 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। अपने अनूठे हल्केपन और पारंपरिक आकर्षण के कारण यह परिधान आज भी वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए है।



















