खेती के बदलते दौर में फसलों की तैयारी से लेकर कटाई तक का सफर लगातार महंगा होता जा रहा है। ऐसे दौर में राजस्थान के नागौर जिले में काश्तकारों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना एक अहम संबल बनकर सामने आई है। जुताई, बुवाई, उन्नत बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं के बढ़ते दामों ने खेती का बजट काफी बढ़ा दिया है। इस स्थिति में बैंक खातों में समय पर आने वाली सरकारी किस्त से स्थानीय किसानों को नकदी की किल्लत से फौरी तौर पर राहत मिल रही है और वे बुवाई के नाजुक मौकों पर जरूरी संसाधन जुटा पा रहे हैं।
जुताई, बुवाई और ट्रैक्टर के ईंधन पर खर्च हो रही किस्त की रकम
नागौर क्षेत्र के काश्तकारों का स्पष्ट कहना है कि फसल चक्र की शुरुआत से ही पैसों की निरंतर दरकार बनी रहती है। खेत की पहली हकाई-जुताई से लेकर अंतिम सिंचाई तक नकद भुगतान की जरूरत पड़ती है। योजना से मिलने वाला पैसा हालांकि खेती के कुल खर्चों को अकेले वहन करने के लिए नाकाफी है, लेकिन यह ऐन वक्त पर बाजार से जरूरी कृषि इनपुट खरीदने में बेहद मददगार साबित होता है।
स्थानीय काश्तकार शंकर लाल यादव ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सम्मान निधि की रकम उनके लिए बुवाई के समय बड़ी मददगार बन जाती है। शंकर लाल यादव के अनुसार, वे इस राशि का इस्तेमाल मुख्य रूप से ट्रैक्टर में डीजल डलवाने, खेत की जुताई करवाने और बीज की व्यवस्था करने में करते हैं। उन्होंने साफ किया कि बुवाई के सीजन में नकद राशि हाथ में होना अनिवार्य होता है, क्योंकि ट्रैक्टर मालिक या ईंधन पंप पर उधारी चलना कठिन होता है। ऐसे महत्वपूर्ण मौकों पर यह सरकारी सहायता सीधे काम आ जाती है।
बढ़ती महंगाई के बीच सम्मान निधि की राशि में इजाफे की उठ रही आवाज
शंकर लाल यादव का यह भी मानना है कि बीते कुछ समय में खेती की लागत बहुत तेजी से बढ़ी है। डीजल, बीज, खाद और कीटनाशक दवाओं की कीमतों में निरंतर बढ़ोतरी होने से साधारण किसानों पर आर्थिक दबाव कई गुना बढ़ गया है। उनका कहना है कि इस भारी महंगाई को देखते हुए सरकार को किसान सम्मान निधि की मौजूदा राशि में इजाफा करना चाहिए, ताकि अन्नदाता को खेती के बाकी जरूरी दायित्वों को समय पर पूरा करने में और ठोस संबल मिल सके।
खेती की अनिवार्यताओं के साथ बची रकम से घरेलू जरूरतें भी पूरी
नागौर के एक अन्य काश्तकार मांगीलाल ने बताया कि योजना से मिलने वाले पैसों से वे अपनी जमीन के लिए खाद और प्रमाणित बीज का इंतजाम करते हैं। मांगीलाल के अनुसार, यदि खेती से संबंधित बुनियादी सामान जुटाने के बाद कुछ पैसे बच जाते हैं, तो उसका उपयोग वे परिवार की जरूरी घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने में कर लेते हैं।
मांगीलाल ने रेखांकित किया कि ग्रामीण परिवारों पर खेती की लागत संभालने के साथ-साथ परिवार का गुजारा चलाने की दोहरी जिम्मेदारी हमेशा बनी रहती है। दोनों मोर्चों पर लगातार नकद पूंजी की जरूरत पड़ती है। ऐसे में यह सरकारी सहायता एक साथ खेती के बुनियादी इनपुट्स और घर के जरूरी घरेलू कामकाज दोनों में मददगार साबित होती है।
बजट संतुलन के लिए किसानों ने रखी आर्थिक मदद बढ़ाने की बात
क्षेत्र के अन्य किसानों ने भी इस बात पर सहमति जताई कि आज के वक्त में खेती-किसानी करना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा खर्चीला हो चुका है। फसल सुरक्षा के लिए रसायनों के स्प्रे, प्रमाणित बीजों के भाव, यूरिया-डीएपी की खरीद और सिंचाई के लिए डीजल का उपभोग लागत को तेजी से ऊपर ले जा रहा है। यही वजह है कि नागौर के काश्तकार एक सुर में सम्मान निधि की मौजूदा किस्त राशि को बढ़ाने की आवश्यकता जता रहे हैं, जिससे खेती के चक्र को बिना किसी आर्थिक अड़चन के समय पर पूरा किया जा सके।



















