भरतपुर स्थित विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (घना) इन दिनों एक बेहद गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में विख्यात यह अभयारण्य हर साल लाखों देसी-विदेशी पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर खींचता है, लेकिन इस बार जुलाई का महीना बीतने के बावजूद यहां पानी का घोर अभाव है। उद्यान की जीवनरेखा माने जाने वाले पांचना बांध से हर वर्ष जुलाई के दूसरे या तीसरे सप्ताह तक जो पानी पहुंच जाना चाहिए था, वह अब तक नहीं आ सका है। पानी के इस विलंब ने पार्क के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और यहां के प्राकृतिक आवास को खतरे में डाल दिया है।
विश्व धरोहर की पहचान पर संकट
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान दुनिया भर के पक्षी प्रेमियों के लिए एक स्वर्ग के समान है। जानकारों के अनुसार, यह पार्क 375 से अधिक विभिन्न प्रकार की पक्षी प्रजातियों का एक अहम आश्रय स्थल है। सर्दी के मौसम में यहां सुदूर देशों से हजारों की संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं। इन पक्षियों के रहने, खाने और प्रजनन के लिए पर्याप्त जल स्तर का होना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान में जिस तरह से पार्क के जल स्रोत सूख रहे हैं, उससे यहां के प्राकृतिक पर्यावरण को गहरा नुकसान पहुंच रहा है। अगर यह जल संकट ऐसे ही बरकरार रहा, तो इस साल आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
पक्षियों और जलीय जीवन पर सीधा असर
इस राष्ट्रीय उद्यान को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए हर साल लगभग 550 एमसीएफटी पानी की जरूरत होती है। आमतौर पर यह आवश्यकता पांचना बांध के पानी से पूरी की जाती है। इस बार बांध का पानी न पहुंचने से पार्क के अंदर जलीय वनस्पति (एक्वा वेजिटेशन) और मछलियों की तादाद कम होने लगी है। पक्षियों का मुख्य भोजन मछलियां और जलीय पौधे ही होते हैं। पानी की कमी के चलते भोजन का यह अहम स्रोत सिकुड़ रहा है, जिससे न केवल पक्षियों बल्कि यहां मौजूद अन्य वन्य जीवों के जीवन पर भी सीधा संकट पैदा हो गया है।
नाममात्र की वैकल्पिक व्यवस्था
पानी की इस भारी किल्लत को देखते हुए स्थानीय प्रशासन द्वारा कुछ वैकल्पिक इंतजाम किए गए हैं। चंबल नदी से समय-समय पर करीब 3 एमसीएफटी पानी की आपूर्ति केवलादेव उद्यान को की जा रही है। लेकिन 550 एमसीएफटी की विशाल आवश्यकता के सामने यह मात्रा ऊंट के मुंह में जीरे के समान साबित हो रही है। इस नाममात्र की आपूर्ति से न तो झीलों का जल स्तर सुधर पा रहा है और न ही पक्षियों के लिए आवश्यक जलीय पर्यावरण का निर्माण हो पा रहा है।
स्थानीय लोगों के रोजगार पर मंडराता खतरा
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान केवल पर्यावरण और वन्य जीवों के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भरतपुर और आसपास के हजारों परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार भी है। इस पार्क में काम करने वाले नेचर गाइड, रिक्शा चालक और आसपास के ग्रामीण पूरी तरह से इसी उद्यान पर निर्भर हैं। यदि जल संकट के कारण पार्क की रौनक खत्म होती है और पर्यटकों का आना कम हो जाता है, तो इन लोगों की रोजी-रोटी सीधे तौर पर छिन जाएगी। रिक्शा चालकों और गाइड्स के लिए पर्यटन सीजन ही कमाई का मुख्य जरिया होता है, जो अब दांव पर लगा हुआ है।
सरकार से स्थायी समाधान की मांग
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय लोगों का गुस्सा अब फूटने लगा है। पार्क पर आश्रित नेचर गाइड, रिक्शा चालक, विभिन्न पर्यावरण संरक्षण संगठन, प्रकृति प्रेमी और आसपास के ग्रामीण बड़ी संख्या में घना गेट पर इकट्ठा हुए और उन्होंने सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। उनका स्पष्ट कहना है कि अगर समय रहते इस समस्या का कोई ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो केवलादेव की विश्वस्तरीय पहचान धूमिल हो जाएगी। उन्होंने सरकार से मांग की है कि पांचना बांध से तुरंत पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए और भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए एक स्थायी जल प्रबंधन योजना लागू की जाए, ताकि इस अमूल्य विश्व धरोहर और इससे जुड़े हजारों लोगों के जीवन को सुरक्षित रखा जा सके।




















