सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र के अंतर्गत सूचीबद्ध निजी चिकित्सालयों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले क्लेम और दवाओं की बिलिंग प्रक्रिया अब वित्तीय जांच एजेंसियों के कड़े दायरे में आ गई है। झुंझुनूं में स्थित चूरू मार्ग के आर एंड आर मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल परिसर में टैक्स अधिकारियों द्वारा शुरू की गई सघन पड़ताल लगातार तीसरे दिन भी जारी देखने को मिली। इस विस्तृत जांच अभियान का मुख्य केंद्र बिंदु सार्वजनिक बीमा कार्यक्रमों के जरिए हासिल की जाने वाली सरकारी राशि और अस्पताल के आंतरिक खातों के बीच का तालमेल बैठाना है।
झुंझुनूं में तीसरे दिन भी जारी रहा वित्तीय दस्तावेजों का सत्यापन
अस्पताल परिसर में यह व्यापक तलाशी अभियान सप्ताह के आरंभ में सोमवार, 12 अक्टूबर की अलसुबह लगभग पांच बजे प्रारंभ हुआ था। उस समय पांच अलग-अलग वाहनों में सवार होकर पंद्रह से अधिक अधिकारियों और कर्मियों का दल अचानक जांच के लिए पहुंचा। बुधवार को भी दल के सदस्य संस्थान के तमाम बही-खातों, दैनिक पर्चियों, बिलिंग पंजिकाओं और कंप्यूटर प्रणालियों में सुरक्षित डिजिटल फाइलों की बारीकी से जांच करते रहे। अस्पताल की गतिविधियों से सीधे संबद्ध चार व्यक्तियों से इस संबंध में पूछताछ किए जाने की बात भी प्रकाश में आई है। जानकारी के अनुसार यह सघन प्रक्रिया शुक्रवार तक खिंच सकती है।
डिजिटल रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तकनीकी जांच
कागजी फाइलों के अतिरिक्त वित्तीय लेन-देन के इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को जुटाने के लिए विशेष सतर्कता बरती जा रही है। जांच दल में दो साइबर विशेषज्ञों को भी विशेष रूप से तैनात किया गया है। ये तकनीकी विशेषज्ञ अस्पताल के कंप्यूटर सर्वर, बिलिंग सॉफ्टवेयर और संबंधित कर्मियों के मोबाइल फोन में मौजूद डाटा को खंगाल रहे हैं। विशेषज्ञों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कंप्यूटर में दर्ज आंकड़े, दवाओं के वास्तविक स्टॉक और भौतिक रूप से तैयार किए गए बिलों में किसी तरह का विरोधाभास तो मौजूद नहीं है।
चार प्रमुख स्वास्थ्य योजनाओं के दावों का किया जा रहा मिलान
जांच अधिकारियों की मुख्य एकाग्रता उन दावों पर टिकी है जो विभिन्न राज्य और केंद्रीय स्वास्थ्य योजनाओं के लाभार्थियों के उपचार के नाम पर सरकार को भेजे गए थे। जांच के दायरे में चार प्रमुख व्यवस्थाएं सम्मिलित हैं
- चिरंजीवी योजना एवं एमएए: राजस्थान में पूर्व में संचालित मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत लाभार्थियों को निशुल्क उपचार की सुविधा प्रदान की जाती थी, जिसे बाद में मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना (MAA) के स्वरूप में आगे बढ़ाया गया। जांच दल पुराने दावों, डिस्चार्ज टिकटों और वर्तमान उपचार बिलों की प्रामाणिकता की समीक्षा कर रहा है।
- आरजीएचएस: राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम के माध्यम से सेवारत राज्य कर्मचारियों, पेंशनधारकों तथा उनके परिजनों को कैशलेस चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इसके तहत स्वीकृत दवाओं के वितरण और बिलों की सत्यता परखी जा रही है।
- आयुष्मान भारत: केंद्र सरकार के इस प्रमुख कार्यक्रम के तहत सामाजिक-आर्थिक रूप से पात्र नागरिकों को भर्ती के समय तय मानकों पर उपचार मिलता है। अस्पताल प्रशासन द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों की नियमों से अनुकूलता जांची जा रही है।
- ईसीएचएस: एक्स-सर्विसमेन कंट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम के जरिए भूतपूर्व सैन्य कर्मियों और उनके आश्रितों को चिकित्सा कवच मिलता है। इसके बिलों और दवाओं की वास्तविक आपूर्ति का सत्यापन किया जा रहा है।
इन सभी कार्यक्रमों में मरीजों की चिकित्सा पर होने वाले खर्च का भुगतान सार्वजनिक खजाने से किया जाता है। इसलिए मरीजों के पंजीकरण, दवाओं की खरीद मूल्य, उपयोग की गई सामग्री और सरकार को भेजे गए क्लेम की एक-एक प्रविष्टि का आपस में मिलान अनिवार्य हो जाता है। यदि रिकॉर्ड में कोई अंतर पाया जाता है, तो वित्तीय अनियमितता की गहराई से छानबीन की जा रही है।
तीन राज्यों में एक साथ तलाशी और बीस करोड़ की टैक्स चोरी का संशय
कार्रवाई का दायरा केवल झुंझुनूं शहर तक सीमित नहीं रहा है। 12 अक्टूबर को राजस्थान के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों हरियाणा और पंजाब में भी विभिन्न अस्पतालों तथा उनसे जुड़े प्रतिष्ठानों पर आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के संयुक्त अभियानों की जानकारी सामने आई थी। राजस्थान के भीतर जयपुर स्थित अमर मेडिकल एंड रिसर्च सेंटर, बहरोड़ का पार्क कैलाश अस्पताल और झुंझुनूं का आर एंड आर मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल इस व्यापक जांच की जद में आए।
शुरुआती आकलन के आधार पर लगभग 20 करोड़ रुपये से अधिक की संभावित कर चोरी का अंदेशा जताया गया है। जांचकर्ता मुख्य रूप से यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि अस्पतालों के पूंजीगत लेन-देन में जिस धन का प्रवाह हुआ, उसका वास्तविक स्रोत क्या था और क्या बही-खातों में दर्ज आंकड़े धरातल पर हुए वित्तीय लेन-देन की सही तस्वीर पेश करते हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं में पारदर्शिता और मरीजों का भरोसा
सामान्य जन सरकारी चिकित्सालयों में अत्यधिक भीड़ होने अथवा त्वरित और गुणवत्तापूर्ण देखभाल की आस में निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का मूल ध्येय यह रहा है कि निर्धन और मध्यम वर्ग के परिवारों पर बीमारी का असहनीय आर्थिक बोझ न पड़े। यदि कोई संस्थान इन जनकल्याणकारी नियमों का दुरुपयोग करके अनुचित वित्तीय लाभ अर्जित करता है, तो इससे न केवल सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचता है बल्कि पूरे स्वास्थ्य ढांचे की साख पर भी आंच आती है। यही कारण है कि बिलों, दवाओं के वास्तविक मूल्य और दावों के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की यह पड़ताल व्यवस्था को पारदर्शी बनाए रखने के दृष्टिकोण से अत्यंत गंभीर मानी जा रही है।























