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राजस्थान के पाली में अनोखी तपस्या, पिछले 26 साल से अन्न का त्याग कर सिर्फ छाछ पर जीवित हैं संतराजस्थान
31 अग॰ 2026, 9:58 pm (1 घंटे पहले)· 2

राजस्थान के पाली में अनोखी तपस्या, पिछले 26 साल से अन्न का त्याग कर सिर्फ छाछ पर जीवित हैं संत

राजस्थान के पाली जिले में एक ऐसे संत निवास करते हैं जो पिछले 26 वर्षों से अधिक समय से बिना अन्न खाए केवल छाछ और पानी के सहारे जीवन बिता रहे हैं।

राजस्थान के पाली जिले में एक ऐसे आध्यात्मिक साधक का जीवन चर्चा का विषय बना हुआ है जिनकी जीवनशैली हर किसी को अचंभित कर देती है। पाली-उदयपुर मेगा हाईवे के पास बूसी गांव के बाहरी हिस्से में बनी एक सामान्य सी कुटिया में संत त्यागी जी महाराज का निवास स्थान है। इस स्थान पर वे पिछले 26 वर्षों से अधिक समय से बिना किसी अन्न का सेवन किए अपना जीवन गुजार रहे हैं। उनकी यह साधना साधारण उपवास से परे है और पूरी तरह से ईश्वर आराधना को समर्पित है।

उनकी यह अनूठी दिनचर्या केवल भोजन त्याग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उनका रहन-सहन भी बेहद कठिन नियमों से बंधा हुआ है। चाहे चिलचिलाती गर्मी हो जब तापमान 45 डिग्री तक पहुंच जाता है, कड़ाके की सर्दी का समय हो या फिर तेज बारिश का मौसम, वे हर स्थिति में सिर्फ एक ही वस्त्र पहनते हैं। रात के समय विश्राम करते वक्त भी वे किसी तरह के कंबल या चादर का उपयोग नहीं करते हैं। उनका पूरा समय अपनी कुटिया के भीतर बैठकर भगवान के नाम का स्मरण करने और माला फेरने में ही गुजरता है।

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संत त्यागी जी महाराज के खान-पान की बात करें तो उन्होंने करीब ढाई दशक से अधिक समय से अनाज का एक भी दाना मुंह में नहीं डाला है। वे पूरे दिन के दौरान केवल दो कटोरी छाछ और पानी का ही सेवन करते हैं। मौसम की तमाम विषम परिस्थितियां भी उनकी इस कठोरचर्या को नहीं बदल पाती हैं और वे हमेशा एक वस्त्र में रहकर बिना किसी आराम के अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

बूसी के पास स्थित उनके इस छोटे से आश्रम में विशेष अवसरों जैसे गुरु पूर्णिमा पर भारी संख्या में लोगों का जमावड़ा होता है। दूर-दूर से आने वाले भक्त संत त्यागी जी के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहां पहुंचते हैं। इस दौरान आने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में छाछ और टॉफियां वितरित की जाती हैं। इस पूरे आयोजन के बीच संत की एक खास बात यह भी रहती है कि वे किसी से भी पैसे या दान के रूप में दक्षिणा स्वीकार नहीं करते हैं।

वर्तमान समय में जब अमूमन बड़े और भव्य आश्रमों के साथ भौतिक सुख-सुविधाओं की प्रधानता बढ़ गई है, तब भी संत त्यागी जी एक बेहद साधारण और छोटी कुटिया में ही अपना जीवन बिताते हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे अपने पास आने वाले किसी भी श्रद्धालु से कभी दान-भेंट या दक्षिणा नहीं लेते। वे बिना किसी स्वार्थ के केवल अपने द्वार पर आने वाले हर भक्त को निस्वार्थ भाव से आशीर्वाद देते हैं।

भौतिकता की दौड़ से दूर संत त्यागी जी महाराज का यह जीवन समाज के लिए गहरी आस्था और प्रेरणा का स्त्रोत बन चुका है। सांसारिक मोह-माया से परे रहकर केवल ईश्वर की भक्ति में लीन रहने वाले ये संत दर्शाते हैं कि भौतिक वस्तुओं के बिना भी आत्मिक बल के सहारे जीवन जिया जा सकता है।

सवाल-जवाब

संत त्यागी जी महाराज कहां रहते हैं?
वे राजस्थान के पाली जिले में पाली-उदयपुर मेगा हाईवे के पास बूसी गांव के बाहर एक छोटी सी कुटिया में निवास करते हैं।
वे कितने समय से अन्न ग्रहण नहीं कर रहे हैं?
वे पिछले करीब 26 वर्षों से अधिक समय से अन्न का एक भी दाना ग्रहण नहीं कर रहे हैं।
वे अपने भोजन के रूप में क्या लेते हैं?
वे पूरे दिन में केवल दो कटोरी छाछ और पानी पीकर ही अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
क्या वे श्रद्धालुओं से किसी प्रकार की दक्षिणा लेते हैं?
नहीं, संत त्यागी जी अपने पास आने वाले किसी भी भक्त से किसी भी प्रकार की दक्षिणा या दान-भेंट स्वीकार नहीं करते हैं।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उनके आश्रम में क्या होता है?
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उनके आश्रम में भारी भीड़ होती है जहां श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं और प्रसाद के रूप में छाछ व टॉफियां दी जाती हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·26 मिनट पहले

पाली के बूसी गांव की यह ग्राउंड रिपोर्ट दर्शाती है कि भौतिकतावादी दौर में भी कैसे आध्यात्मिक और कठोर जीवनशैली लोगों का ध्यान खींचती है। हालांकि यह विषय उत्तर प्रदेश या राष्ट्रीय राजनीति से सीधा नहीं जुड़ता, लेकिन ग्रामीण अंचलों में ऐसे अनूठे मानव व्यवहार और लोक-आस्था से जुड़ी खबरें पाठकों के बीच गहरी जिज्ञासा पैदा करती हैं। भविष्य में ऐसे आयोजनों और मेलों के दौरान स्थानीय प्रशासन द्वारा भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान देना आवश्यक होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·26 मिनट पहले

अपराध और कानून-व्यवस्था के एक संवाददाता के रूप में मेरा यह मानना है कि यद्यपि यह मामला पूरी तरह से एक आध्यात्मिक और व्यक्तिगत साधना से जुड़ा है, फिर भी गुरु पूर्णिमा जैसे अवसरों पर जुटने वाली भारी भीड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी जिम्मेदारी बन जाता है। इस प्रकार के धार्मिक आयोजनों में बिना किसी मौद्रिक दान के बावजूद भक्तों का उमड़ना जनसमूह के प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से एक संवेदनशील मुद्दा है, जहाँ भविष्य में किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए जिला प्रशासन को पुख्ता इंतजाम करने की आवश्यकता होगी।

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