गोंडा जिले के गांवों और खेतों के आसपास प्राकृतिक रूप से उगने वाला रतनजोत का पौधा अपनी साधारण बनावट के पीछे कई औषधीय गुण छिपाए हुए है। इस वनस्पति का वैज्ञानिक नाम जट्रोफा गॉसिपिइफोलिया है और स्थानीय स्तर पर इसे लाल अरंड या विलायती अरंड के नाम से भी जाना जाता है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और आयुर्वेद में इसकी पत्तियों, छाल, जड़ों और इससे निकलने वाले लेटेक्स का इस्तेमाल सीमित रूप से किया जाता रहा है। हालांकि, यह पौधा अपनी प्रकृति से विषैला भी होता है, इसलिए किसी भी चिकित्सीय उद्देश्य के लिए इसका उपयोग बिना किसी विशेषज्ञ की देखरेख के करना जोखिम भरा हो सकता है।
इस पौधे की पहचान करना काफी आसान है क्योंकि यह एक झाड़ी के रूप में उगता है जिसकी लंबाई आमतौर पर 1 से 3 मीटर तक पहुंचती है। इसकी पत्तियों का रंग हरा और हल्का बैंगनी होता है जो इसे अन्य पौधों से अलग दिखाता है। इस पर छोटे और गहरे लाल रंग के आकर्षक फूल खिलते हैं जिनके बाद गोल आकार के हरे फल विकसित होते हैं। जैसे-जैसे ये फल पकते हैं, इनके रंगों में बदलाव देखने को मिलता है जो इसकी पहचान को और स्पष्ट करता है।
त्वचा से जुड़ी तमाम समस्याओं के समाधान के लिए ग्रामीण इलाकों में इसके बीजों से मिलने वाले तेल का बाहरी हिस्सों पर लंबे समय से प्रयोग किया जाता रहा है। पुराने समय से लोग एक्जिमा, दाद, खुजली और अन्य कई प्रकार के चर्म रोगों में राहत पाने के लिए इस तेल का इस्तेमाल करते आए हैं। आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इसके कुछ विशेष प्रयोगों का जिक्र मिलता है, परंतु जानकारों का यह मानना है कि इसका इस्तेमाल केवल किसी योग्य वैद्य के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के हानिकारक प्रभाव से बचा जा सके।
घाव को ठीक करने की प्रक्रिया में भी इसे काफी सहायक माना जाता है जिसके बारे में वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति जानकारी देते हैं। उनके अनुसार इस पौधे के तने या डंठल को तोड़ने पर अंदर से दूध जैसा सफेद लेटेक्स बाहर निकलता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इस तरल पदार्थ को छोटे-मोटे कटने या छिलने पर लगाने से खून बहने की रफ्तार धीमी हो जाती है और घाव जल्दी सूखने में मदद मिलती है। हालांकि, मौजूदा समय की आधुनिक चिकित्सा पद्धति इसे सामान्य इलाज का कोई विकल्प नहीं मानती है और एहतियात बरतने की सलाह देती है।
दांतों और मसूड़ों की सेहत के लिए भी ग्रामीण क्षेत्रों में इसका एक अलग नुस्खा अपनाया जाता रहा है। वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि बहुत से गांवों में लोग इसके डंठल को तोड़कर दातुन की तरह इस्तेमाल करते हैं। ऐसी लोक मान्यता है कि इससे मसूड़ों की बेहतर सफाई होती है और दांतों के दर्द या हल्की सूजन में आराम मिल सकता है। इसके बावजूद, दांतों की नियमित और सुरक्षित देखभाल के लिए किसी पेशेवर दंत चिकित्सक से परामर्श लेना ही सबसे उचित मार्ग माना गया है।
पेट के दर्द और कब्ज जैसी परेशानियों से निपटने के लिए पारंपरिक चिकित्सा में इसकी पत्तियों का काढ़ा बहुत ही सीमित मात्रा में इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का साफ कहना है कि यदि इसकी सही मात्रा का ध्यान न रखा जाए तो यह शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए किसी भी परिस्थिति में इसका सेवन खुद से नहीं करना चाहिए। इसकी गलत खुराक गंभीर समस्याओं को न्योता दे सकती है।
औषधीय फायदों के अलावा यह पौधा खेती और पर्यावरण की दृष्टि से भी बहुत उपयोगी साबित होता है। देश के कई हिस्सों में किसान इसे अपने खेतों की मेड़ों पर उगाते हैं क्योंकि इसकी मजबूत जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। इसके अलावा, पर्यावरण और ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिकों ने इसके बीजों से जैव ईंधन तैयार करने को लेकर भी कई तरह के शोध किए हैं, जो भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति के अनुसार रतनजोत एक जहरीला पौधा है जिसके हरे बीज और फल सबसे अधिक नुकसानदेह माने जाते हैं। यदि कोई अनजाने में इनका सेवन कर ले तो उसे उल्टी, दस्त, पेट में असहनीय दर्द और शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन जैसी गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। छोटे बच्चों और पालतू जानवरों के लिए भी इसके बीज बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं, इसलिए इनसे विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है।
सुरक्षा के लिहाज से वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति सलाह देते हैं कि रतनजोत का आंतरिक सेवन कभी भी किसी योग्य आयुर्वेद चिकित्सक या एलोपैथिक डॉक्टर से पूछे बिना बिल्कुल न करें। किसी भी बीमारी के इलाज में इसे एक साधारण घरेलू नुस्खा समझकर उपयोग करना खतरनाक हो सकता है। यदि आपके घर के आसपास या खेतों में यह पौधा मौजूद है, तो इसकी सही पहचान रखें ताकि कोई अनहोनी न हो। औषधीय गुणों से भरपूर होने के बावजूद यह पौधा पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, इसलिए इसका बाहरी उपयोग भी केवल विशेषज्ञों की सलाह से करें और इसके बीजों को हमेशा बच्चों की पहुंच से दूर सुरक्षित स्थान पर रखें।


















