जयपुर: राजस्थान में दीवाली की आतिशबाजी का दौर अभी विधिवत शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन राज्य के कई हिस्सों में हवा की सेहत पहले से ही काफी ज्यादा खराब हो चुकी है। मौसम में लगातार आ रहे बदलाव, तापमान में दर्ज की जा रही गिरावट और हवा की धीमी गति के कारण विभिन्न शहरों में वायु प्रदूषण का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर की ओर भाग रहा है। स्थिति यह बन चुकी है कि त्योहार से ठीक एक दिन पहले ही प्रदेश के अधिकतर इलाकों में एयर क्वालिटी इंडेक्स सामान्य तय मानकों के मुकाबले लगभग दोगुना रिकॉर्ड किया जा रहा है। ऐसे में यह आशंका लगातार गहरी होती जा रही है कि आतिशबाजी के बाद प्रदूषण का यह स्तर आम जनता के लिए और अधिक खतरनाक साबित हो सकता है।
प्रमुख शहरों के आंकड़े
राज्य की राजधानी जयपुर की बात करें तो यहाँ हवा में प्रदूषण का स्तर बढ़कर एक्यूआई 245 के आसपास दर्ज किया गया है, जो शहरवासियों के लिए चिंता का विषय है। औद्योगिक हब के रूप में पहचाने जाने वाले भिवाड़ी में हालात सबसे ज्यादा डरावने बने हुए हैं, जहाँ एयर क्वालिटी इंडेक्स सीधे 363 के ऊंचे स्तर पर पहुँच गया है। इसके अलावा सवाई माधोपुर में भी एक्यूआई का आँकड़ा 305 तक दर्ज किया गया है। पूर्वी राजस्थान के क्षेत्र में सवाई माधोपुर एकमात्र ऐसा प्रमुख शहर बन गया है जिसने 300 के इस खतरनाक आंकड़े को पार कर लिया है।
अन्य जिलों का हाल
दौसा जिले में वायु गुणवत्ता सूचकांक 274 पर बना हुआ है, जबकि करौली में यह 266 और टोंक में 229 दर्ज किया गया है। राजधानी जयपुर के आसपास के ग्रामीण और शहरी इलाकों में भी इस बढ़ते प्रदूषण का असर साफ तौर पर देखा जा सकता है। पश्चिमी राजस्थान की भौगोलिक स्थिति को देखें तो जोधपुर में एक्यूआई 256 और बीकानेर में 224 के आसपास चल रहा है। जैसलमेर सहित पश्चिमी क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी प्रदूषण का स्तर लगातार 200 से 250 के बीच बना हुआ है। हाड़ौती अंचल भी इस जहरीली हवा की चपेट से अछूता नहीं है, जहाँ कोटा में एक्यूआई 160 दर्ज किया गया है। इसके अलावा बूंदी और झालावाड़ के क्षेत्रों में भी प्रदूषण में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वहीं दूसरी ओर अजमेर में एक्यूआई 139 और उदयपुर में 134 रिकॉर्ड किया गया है, जो अन्य शहरों के मुकाबले थोड़ा कम जरूर है लेकिन स्थिति पर नजर बनाए रखने की जरूरत है।
त्योहार के दौरान सेहत का ख्याल
विशेषज्ञों के अनुसार, मौसम में होने वाले बदलाव के कारण हवा में मौजूद प्रदूषक तत्व आसानी से ऊपर नहीं जा पाते और वे जमीन के बेहद करीब इकट्ठा होने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूपी दीवाली के दौरान होने वाली आतिशबाजी का धुआँ और उसमें मौजूद सूक्ष्म कण हवा की गुणवत्ता को और अधिक बिगाड़ सकते हैं। इस समय सबसे ज्यादा सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। खासतौर पर वे लोग जो पहले से ही सांस की किसी बीमारी से जूझ रहे हैं, इसके अलावा बुजुर्गों और छोटे बच्चों को प्रदूषण के सीधे संपर्क में आने से बचना चाहिए। दीवाली का यह पर्व रोशनी और खुशियों का प्रतीक है, लेकिन इस उल्लास के बीच खुद की और अपने आसपास के लोगों की सेहत का विशेष ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है।


















