राजस्थान के सियासी परिदृश्य में हालिया शहरी निकाय चुनावों के निराशाजनक नतीजों ने प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को अपनी रणनीतिक दिशा बदलने पर मजबूर कर दिया है. शहरों में मतदाताओं का अपेक्षित भरोसा न जीत पाने के बाद अब पार्टी ग्रामीण सियासत के गढ़ में कोई कोताही बरतने के मूड में नहीं दिख रही है. वर्ष 2026 में प्रस्तावित पंचायती राज चुनावों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने एक बेहद सोची-समझी योजना पर काम शुरू कर दिया है. इसके तहत पार्टी के 20 वरिष्ठ और प्रभावशाली चेहरों को मिलाकर एक विशेष चुनाव प्रचार अभियान समिति गठित की गई है, जिससे यह संदेश दिया जा सके कि ग्रामीण इलाकों में पूरी ताकत सामूहिक नेतृत्व के सहारे झोंकी जाएगी.
निकाय चुनावों में असफलता के बाद नेतृत्व पर उठे सवाल
शहरी निकाय चुनाव परिणामों के सामने आने के बाद पार्टी के अंदरूनी हलकों में चुनावी तैयारियों और प्रचार शैली को लेकर असंतोष उभरने लगा था. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस संदर्भ में खुल कर अपनी असहमति दर्ज कराई थी. उन्होंने राज्य में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान का उदाहरण देते हुए रेखांकित किया था कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जिस तरह सड़क पर उतरकर बड़े रोड शो और आक्रामक जनसंपर्क अभियान चला रहे थे, कांग्रेस को भी उसी आक्रामकता के साथ मैदान में उतरना चाहिए था. गहलोत का मानना था कि यदि व्यापक स्तर पर रैलियां और रोड शो किए जाते, तो चुनावी परिणाम काफी भिन्न हो सकते थे.
राजनीतिक विश्लेषकों ने पूर्व मुख्यमंत्री के इस बयान को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की कार्यप्रणाली और प्रचार योजना पर एक परोक्ष प्रहार के रूप में देखा. संगठन के भीतर यह धारणा बनने लगी थी कि केवल सामान्य सभाओं के जरिए चुनाव लड़ना पर्याप्त नहीं था. इस तीखी प्रतिक्रिया के बाद प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व पर यह दबाव था कि वह पंचायत चुनावों के लिए एक ऐसा ढांचा तैयार करे जिसमें वरिष्ठ नेताओं के असंतोष को भी थामा जा सके और चुनावी रणनीति को अधिक समावेशी रूप दिया जा सके.
20 वरिष्ठ दिग्गजों की मजबूत कैंपेन कमेटी मैदान में
इस अंदरूनी मंथन और रणनीति में बदलाव के परिणामस्वरूप प्रदेश कांग्रेस ने 20 प्रमुख नेताओं की एक विस्तृत कैंपेन कमेटी का ऐलान किया, जिसे तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है. इस सूची में पार्टी के तमाम धुरंधरों को एक साथ बैठाने का प्रयास किया गया है. समिति में प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली मुख्य स्तंभ के रूप में मौजूद हैं.
इन चार प्रमुख नेताओं के अतिरिक्त कमेटी में पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सीपी जोशी, पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह, हरीश चौधरी, राज्यसभा सांसद नीरज डांगी, विधायक रामकेश मीणा और रफीक खान को शामिल किया गया है. साथ ही पूर्व मंत्रियों और कद्दावर नेताओं में उदयलाल आंजना, प्रमोद जैन भाया, शाले मोहम्मद, प्रताप सिंह खाचरियावास, शकुंतला रावत और ममता भूपेश को भी यह अहम दायित्व सौंपा गया है. इनके अलावा गणेश घोघरा, हरसहाय यादव, एमडी चोपदार और सीबी यादव को भी इस टीम में जगह दी गई है. पार्टी के विभिन्न फ्रंटल संगठनों के प्रदेश अध्यक्षों को इस अभियान समिति में अतिरिक्त सदस्यों के तौर पर जोड़ा गया है, जिससे संगठन के हर अंग को इस ग्रामीण अभियान से सीधे जोड़ा जा सके.
ग्रामीण इलाकों में स्टार प्रचारकों के दौरों की रूपरेखा
कांग्रेस नेतृत्व ने इस समिति के सभी 20 सदस्यों को केवल रणनीतिक सलाहकार नहीं, बल्कि मैदान में सक्रिय स्टार प्रचारक की दोहरी भूमिका सौंपी है. राजस्थान के विभिन्न संभागों, जातियों और सामाजिक समीकरणों में मजबूत पकड़ रखने वाले इन नेताओं को आगे करने के पीछे स्पष्ट उद्देश्य ग्रामीण अंचलों में संगठनात्मक मशीनरी को सक्रिय करना है. पार्टी का मानना है कि पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव केवल स्थानीय निकाय की कुर्सियों की लड़ाई नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए ग्रामीण मतदाताओं के बीच कांग्रेस के आधार को परखने की एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होंगे.
रणनीति के मुताबिक अशोक गहलोत और सचिन पायलट जैसे जनता में गहरा प्रभाव रखने वाले चेहरों के साथ-साथ डोटासरा और जूली लगातार गांवों में जनसभाओं, चौपालों और व्यापक दौरों का नेतृत्व करेंगे. बड़े नेताओं की प्रत्यक्ष मौजूदगी से ग्रामीण मतदाताओं तक पार्टी के संदेश को सीधे पहुंचाने की योजना तैयार की गई है, ताकि सत्तारूढ़ दल के जमीनी प्रचार का प्रभावी मुकाबला किया जा सके.
गुटबाजी थामने और कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने की चुनौती
निश्चित रूप से वरिष्ठ नेताओं की एक मजबूत सूची जारी कर देना चुनावी जीत की कोई अंतिम गारंटी नहीं है. हालिया चुनावी हार से हताश कार्यकर्ताओं में दोबारा उत्साह भरना कांग्रेस संगठन के लिए सबसे पहली और कठिन चुनौती बना हुआ है. पार्टी को बूथ और ग्राम स्तर पर एकजुटता दिखाने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आंतरिक गुटबाजी का साया टिकट वितरण पर न पड़े. उम्मीदवारों के पारदर्शी चयन और स्थानीय स्तर पर नेताओं के आपसी तालमेल के बिना केवल बड़े नामों के जरिए माहौल बनाना आसान नहीं होगा. अब यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा कि निकाय चुनावों के झटके के बाद बदली गई यह नई सामूहिक रणनीति गांवों के दंगल में कांग्रेस की नैया पार लगाने में कितनी कामयाब हो पाती है.

















