राजस्थान में हाल ही में संपन्न हुए नगरीय निकाय चुनावों के नतीजों के बाद प्रदेश कांग्रेस के भीतर जारी अंदरूनी गतिरोध एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सार्वजनिक रूप से पार्टी की चुनावी तैयारियों और सांगठनिक रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसके बाद पार्टी के विभिन्न गुटों में टकराव तेज हो गया है. गहलोत का मानना है कि यदि चुनाव प्रचार में बेहतर नियोजन और आपसी समन्वय होता, तो कांग्रेस और अधिक सीटें जीतने में सफल रहती. इस बयान को राजनीतिक गलियारों में सीधे तौर पर राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा के नेतृत्व पर उठाए गए सवाल के रूप में देखा जा रहा है. गहलोत के इस तीखे रुख के बाद, सचिन पायलट ने तुरंत मोर्चा संभाला और डोटासरा के बचाव में उतरते हुए गहलोत के दावों को खारिज कर दिया.
अशोक गहलोत के तीखे सवाल और रणनीति पर आपत्ति
गुरुवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अशोक गहलोत ने कहा कि बीजेपी नेताओं और मुख्यमंत्री के बेहद आक्रामक चुनाव प्रचार का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को अपनी रणनीति और अधिक मजबूत बनानी चाहिए थी. गहलोत ने तर्क दिया कि यदि PCC ने पहले से ही एक सुनियोजित कार्यक्रम तैयार किया होता और सभी प्रमुख नेता एकजुट होकर मैदान में उतरते, तो इसका जनता पर एक अलग ही प्रभाव पड़ता. उन्होंने इस बात पर खेद जताया कि बीजेपी के विशाल रोड शो का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस की ओर से समान स्तर के रोड शो का आयोजन नहीं किया गया, जिससे चुनाव परिणामों पर असर पड़ा. पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार, राज्य की वर्तमान सरकार के खिलाफ जनता के बीच एक स्पष्ट असंतोष था, लेकिन बेहतर प्लानिंग के अभाव में कांग्रेस उस माहौल का पूरी तरह से लाभ उठाने में असमर्थ रही.
सचिन पायलट ने किया पीसीसी नेतृत्व का बचाव
पूर्व मुख्यमंत्री के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए सचिन पायलट ने अपने चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी की आलोचनाओं को खारिज कर दिया और प्रदेश अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा के प्रयासों की सराहना की. पायलट ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान बेहतरीन काम किया है और धरातल पर मजबूत अभियान चलाया है. गहलोत के आरोपों का जवाब देते हुए पायलट ने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर सीधे मतदाताओं से संपर्क साधा है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब कोई दल सरकार में होता है, तो उसके पास चुनाव प्रचार के लिए अलग प्रकार के प्रशासनिक और वित्तीय संसाधन होते हैं, जिससे प्रचार का पैमाना बदल जाता है. पायलट ने जोर देकर कहा कि PCC ने चुनाव के दौरान सभी नेताओं को उनके अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में जिम्मेदारी दी थी, जिसका सभी ने पालन किया.
बांसवाड़ा का घटनाक्रम और पुराने मतभेद
राजस्थान कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के बीच छिड़ी इस ताजा जुबानी जंग ने पार्टी संगठन के भीतर नए सिरे से असहजता पैदा कर दी है. इस आपसी कलह की पृष्ठभूमि पिछले कुछ समय से तैयार हो रही थी, जिसका संबंध हाल ही में घटित कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों से है. कुछ समय पहले बांसवाड़ा के प्रमुख आदिवासी नेता महेन्द्र जीत मालवीय ने जब अपने क्षेत्र की भारतीय आदिवासी पार्टी (BAP) के कार्यकर्ताओं को कांग्रेस की सदस्यता दिलाई थी, तब उस कार्यक्रम में अशोक गहलोत भी मौजूद थे. उसी दौरान समर्थकों द्वारा गहलोत को एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनाने के जोरदार नारे लगाए गए थे, जिसने पार्टी के दूसरे गुटों को असहज कर दिया था.
राजस्थान कांग्रेस में त्रिकोणीय संघर्ष की आहट
गहलोत के सामने लगे इन नारों पर प्रतिक्रिया देते हुए गोविन्द सिंह डोटासरा ने तब गहलोत का नाम लिए बिना उन पर निशाना साधा था. डोटासरा ने स्पष्ट किया था कि कोई भी राजनीतिक दल किसी एक व्यक्ति विशेष के सहारे नहीं चलता, बल्कि वह अपने संगठन की बदौलत आगे बढ़ता है. इस बयान के बाद राज्य कांग्रेस में केवल गहलोत बनाम पायलट का पुराना समीकरण ही नहीं, बल्कि अब गहलोत बनाम डोटासरा का एक नया मोर्चा भी खुल गया है. यद्यपि दोनों ही नेताओं ने बाद में इस तरह के मतभेदों से इनकार किया था, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे आने वाले चुनावों के लिहाज से पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती मान रहे हैं. अशोक गहलोत ने इस संबंध में अपनी चिंताओं को साझा करते हुए X पर लिखा और प्रेस वार्ता का लाइव वीडियो भी जारी किया.
























