खेती में फसलों पर कीटों का हमला होते ही पैदावार और पौधों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ जाती है। माहू, सफेद मक्खी, थ्रिप्स और हरे तेले जैसे रस चूसक कीट कोमल टहनियों और पत्तों का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देते हैं। बाजार में मिलने वाले महंगे रासायनिक कीटनाशकों के विकल्प के तौर पर किसान अब पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों को अपना रहे हैं। जालोर जिले के सायला तहसील स्थित लखाणी जैविक फार्म से जुड़े किसान बलवंत सिंह अपने खेतों में फसलों की सुरक्षा के लिए घर पर ही नीमास्त्र तैयार कर रहे हैं।
नीमास्त्र बनाने के लिए आवश्यक सामग्री और अनुपात
प्राकृतिक कीटनाशक नीमास्त्र को तैयार करने की विधि काफी सरल है और इसके लिए उपयोग होने वाले घटक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। किसान बलवंत सिंह के अनुसार, इस मिश्रण को बनाने के लिए प्राथमिक सामग्री नीम की पत्तियां या नीम की गिरी होती है। लगभग 5 से 10 किलोग्राम नीम की सामग्री एकत्र की जाती है। इसके साथ ही लगभग 2 किलोग्राम देसी गाय का ताजा गोबर और 5 से 10 लीटर गोमूत्र की आवश्यकता होती है। इन सभी जैविक सामग्रियों को एक बड़े ड्रम में करीब 200 लीटर पानी के साथ अच्छी तरह घोल दिया जाता है।
तैयारी की प्रक्रिया और फर्मेंटेशन का समय
घोल तैयार हो जाने के तुरंत बाद इसका छिड़काव पौधों पर नहीं किया जाता। इसे प्रभावी बनाने के लिए रासायनिक प्रक्रियाओं और प्राकृतिक गुणों के सक्रिय होने का समय दिया जाता है। पूरे मिश्रण को लगभग 24 से 48 घंटे के लिए सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है। इस अवधि के दौरान दिन में कई बार घोल को डंडे की मदद से अच्छी तरह हिलाया जाता है, जिससे सभी घटक पानी में समान रूप से घुल-मिल जाएं। निर्धारित 24 से 48 घंटे पूरे होने के बाद पूरे घोल को पतले कपड़े या छलनी से अच्छी तरह छान लिया जाता है, जिसके बाद यह फसलों पर छिड़काव के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता है।
किन कीटों पर असरदार है यह देसी घोल
नीमास्त्र का उपयोग विशेष रूप से पौधों का रस चूसने वाले नुकसानदेह कीटों के नियंत्रण में बेहद असरदार साबित होता है। इनमें माहू, सफेद मक्खी, थ्रिप्स, जैसिड यानी हरा तेला और मिलीबग शामिल हैं। इसके साथ ही, शुरुआती अवस्था में मौजूद छोटे कीटों तथा इल्ली वर्ग के कीटों पर भी यह घोल प्रभावी असर दिखाता है।
कीटों के फैलाव को रोकने की कार्यप्रणाली
नीमास्त्र का छिड़काव पौधों पर एक प्राकृतिक सुरक्षा चक्र तैयार करता है। यह घोल कीटों के भोजन ग्रहण करने की क्षमता को धीमा कर देता है और उनकी अंडे देने की गतिविधि पर सीधा असर डालता है। कीटों की सक्रियता सीमित हो जाने के कारण उनका वंश आगे नहीं बढ़ पाता, जिससे फसलें सुरक्षित रहती हैं। यही वजह है कि खेती की लागत घटाने और रासायनिक अवशेषों से बचने के लिए किसान इस देसी उपाय को अपना रहे हैं।



















