राजस्थान निकाय चुनावों के परिणामों ने सभी को हैरान कर दिया है, जहां बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। इस जीत के बाद पार्टी के पुराने नेता और मांगरोल के पूर्व पालिका अध्यक्ष अशोक जैन की राजनीतिक यात्रा एक बार फिर से सुर्खियों में आ गई है। बारां जिले की राजनीति में आम आदमी पार्टी की यह सफलता कोई पहली बार नहीं है, क्योंकि पार्टी से जुड़े नेता बहुत पहले से यहां सक्रिय रहे हैं। साल 2012 में जब आम आदमी पार्टी का औपचारिक गठन हुआ था, उसी दौरान यह राजनीतिक दल बारां क्षेत्र में अपनी जमीन तलाशने लगा था। हालांकि, उस समय का राजनीतिक समीकरण आज की स्थिति से काफी अलग था, लेकिन स्थानीय स्तर पर नेताओं की पकड़ हमेशा से मजबूत रही है।
मांगरोल में निर्दलीय से आप तक का सफर
इस पूरी कहानी की शुरुआत साल 2009 में हुई थी जब अशोक जैन ने मांगरोल नगर पालिका के चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में शानदार जीत दर्ज की थी। उस समय मांगरोल नगर पालिका का ढांचा आज के मुकाबले काफी छोटा था और वहां कुल 20 वार्ड हुआ करते थे। खास बात यह थी कि उस दौर में निकाय प्रमुख का चुनाव पार्षदों के माध्यम से नहीं बल्कि मतदाताओं द्वारा सीधे तौर पर किया जाता था। दिनांक 23 नवंबर 2009 को अशोक जैन ने पालिका अध्यक्ष पद की कमान संभाली थी। इसके बाद जब साल 2012 के अंत में राष्ट्रीय राजधानी में आम आदमी पार्टी की नींव रखी गई, तो अशोक जैन ने इस नए राजनीतिक दल का दामन थाम लिया और पार्टी के साथ जुड़ गए। राजनीतिक पृष्ठभूमि की बात करें तो अशोक जैन ऐतिहासिक अन्ना आंदोलन का अहम हिस्सा रहे हैं और अपने शुरुआती दिनों में वे जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी पूरी तरह सक्रिय रूप से शामिल रहे थे।
राजस्थान में राइट-टू-रिकॉल का अनोखा मामला
अशोक जैन के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा मोड़ वह समय था जब उन्हें अपने पद से हटाने के लिए राजस्थान के इतिहास में पहली बार 'राइट-टू-रिकॉल' हथियार का इस्तेमाल किया गया था। राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 के प्रावधानों के तहत मतदाताओं को यह विशेष अधिकार दिया गया है कि वे जरूरत पड़ने पर अपने चुने हुए नगरपालिका अध्यक्ष के खिलाफ 'राइट-टू-रिकॉल' की प्रक्रिया अपना सकें। इसी नियम का हवाला देते हुए स्थानीय स्तर पर विपक्षी दलों यानी भाजपा और कांग्रेस के पार्षदों ने मिलकर जैन के खिलाफ अविश्वास और पद से हटाने का प्रस्ताव पेश कर दिया था। इसके बाद प्रशासन द्वारा जैन को कुर्सी पर बनाए रखने या हटाने के लिए सीधे जनता के बीच जनमत संग्रह कराया गया। लेकिन इस कड़ी अग्निपरीक्षा में अशोक जैन पूरी तरह से सफल साबित हुए और जनता ने उन्हें दोबारा समर्थन दिया, जिसके बाद उन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा किया।
तीसरे मोर्चे की चुनौतियां और लोकसभा चुनाव का अनुभव
राजस्थान की राजनीति में हमेशा से तीसरे मोर्चे की स्थिति काफी संघर्षपूर्ण रही है। प्रदेश में कई बार मजबूत तीसरा विकल्प खड़ा करने के प्रयास किए गए लेकिन वे बड़े पैमाने पर सफल नहीं हो सके। बहुजन समाज पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, माकपा और आम आदमी पार्टी जैसे दलों ने लगातार लोकसभा, विधानसभा, पंचायती राज और निकाय चुनावों में अपनी किस्मत आजमाई है। इन दलों को कुछ छिटपुट सीटों पर सफलता जरूर मिलती रही है, लेकिन वे कभी भी कांग्रेस और भाजपा के द्वि-पक्षीय मुकाबले को बड़े स्तर पर चुनौती नहीं दे पाए। इसी कड़ी में आम आदमी पार्टी ने अशोक जैन की लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कोटा लोकसभा सीट से अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाकर चुनावी मैदान में उतारा था। हालांकि वे उस चुनाव में जीत हासिल नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने करीब 18000 वोट हासिल करने में सफलता प्राप्त की थी।
बारां में आप की बड़ी जीत और वर्तमान परिदृश्य
वर्तमान समय में मांगरोल नगरपालिका का दायरा काफी बढ़ चुका है और वहां वार्डों की संख्या 20 से बढ़कर 35 हो चुकी है। वहीं दूसरी तरफ, अशोक जैन अब मांगरोल छोड़कर हैदराबाद शिफ्ट हो चुके हैं, लेकिन वे अपने पुराने राजनीतिक दिनों और संघर्षों को आज भी अच्छी तरह याद करते हैं। उनका मानना है कि आम मतदाता हमेशा एक अच्छे और कर्मठ नेता को पसंद करता है, फिर चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल से ताल्लुक रखता हो या फिर पूरी तरह से निर्दलीय चुनाव लड़ रहा हो। उनका यह भी कहना है कि शहरों और कस्बों के समग्र विकास के लिए हमेशा पार्टी से ऊपर उठकर एक योग्य प्रत्याशी को ही चुनना चाहिए ताकि स्थानीय नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। बारां नगर परिषद के हालिया चुनावों में आप पार्टी ने कुल 60 में से 31 वार्डों पर कब्जा जमाकर दोनों प्रमुख दलों को पीछे छोड़ दिया है और यह जीत आगामी राजनीति के लिए एक नया संकेत मानी जा रही है।















