राजस्थान के जयपुर जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध सांभर झील अपने खारे पानी और नमक उत्पादन के लिए जानी जाती है। ऐसे तपते और अत्यधिक लवणीय वातावरण में जहां दूब का एक तिनका उगना भी मुश्किल होता है, वहां एक घने और हरे-भरे जंगल की कल्पना करना नामुमकिन सा लगता है। लेकिन इस असंभव काम को हकीकत में बदल दिखाया है सांभरलेक के कुच्या की ढाणी के रहने वाले एक साधारण पशुपालक जयप्रकाश गुर्जर ने। उन्होंने अपनी अटूट इच्छाशक्ति और पर्यावरण के प्रति गहरे लगाव के बल पर झील के बेहद पथरीले, बंजर और खारे किनारे पर 250 से अधिक अरडू के पेड़ों का एक प्राकृतिक साम्राज्य खड़ा कर दिया है।
लॉकडाउन की तंगी और झील किनारे आशियाने का संघर्ष
जयप्रकाश गुर्जर मुख्य रूप से एक भेड़-बकरी चरवाहे हैं और अपनी आजीविका के लिए रोज पशुओं को चराने सांभर झील के आसपास के इलाकों में जाते थे। साल 2020 में जब देश में कोरोना महामारी फैली और लॉकडाउन लगा, तब उनकी आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक हो गई। तंगी के इस दौर में उन्हें मजबूरी में अपने पूरे परिवार के साथ गांव का घर छोड़कर झील के किनारे ही एक कच्ची झोपड़ी बनाकर रहना पड़ा। उस भीषण गर्मी में झील के खुले किनारे पर लू के थपेड़ों और सीधी धूप से बचने का कोई साधन नहीं था। छांव के नाम पर वहां दूर-दूर तक एक पेड़ भी नहीं था। इसी असहनीय तपिश ने जयप्रकाश को कम पानी में तेजी से बढ़ने वाले अरडू के पौधे लगाने की प्रेरणा दी।
खारी मिट्टी और ग्रामीणों के तानों के बीच दृढ़ संकल्प
खारे पानी की इस दलदली और बंजर जमीन पर कोई भी पौधा रोपना और उसे जिंदा रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। जब जयप्रकाश ने पौधे लगाने शुरू किए, तो गांव के लोगों ने उनका मजाक उड़ाया और साफ कह दिया कि इस ऊसर और नमकीन जमीन पर कभी कोई पेड़ बड़ा नहीं हो सकता। लेकिन जयप्रकाश ने लोगों की बातों को नजरअंदाज कर दिया। उनके पास सिंचाई का कोई साधन नहीं था, इसलिए वह रोजाना सुबह-शाम पास के एक कुएं से बाल्टियों में पानी खींचकर लाते और कड़ी मेहनत से एक-एक पौधे को सींचते थे। उन्होंने इन पौधों को बिल्कुल अपने बच्चों की तरह पाला और उनकी सुरक्षा की।
6 साल की तपस्या ने बना दिया प्राकृतिक एसी हाउस
लगातार छह वर्षों की कड़ी मेहनत, लगन और अथक प्रयास का परिणाम आज सबके सामने है। कभी बंजर दिखने वाला वह खारा किनारा आज घने और ऊंचे पेड़ों के जंगल में तब्दील हो चुका है। इस घनी हरियाली का असर ऐसा है कि जब मई-जून के महीनों में पूरे सांभर क्षेत्र का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस को छूने लगता है, तब भी जागी राम के इस आशियाने के आसपास का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक कम दर्ज किया जाता है। यहां की झोपड़ी में कदम रखते ही बिना किसी बिजली के पंखे या कूलर के, एकदम एयर कंडीशनर जैसी ठंडी हवा का अहसास होता है।
बच्चों की पाठशाला और सैलानियों के आकर्षण का केंद्र
यह ठंडी छांव अब केवल जयप्रकाश के परिवार का आशियाना ही नहीं रह गई है। दोपहर की तेज धूप में आसपास के बच्चे इन विशाल पेड़ों के नीचे बैठकर अपनी पढ़ाई करते हैं और आपस में खेलते हैं। सावन के सुहाने महीने में यहां पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं, जहां बच्चे और महिलाएं सावन के गीतों के साथ झूलते नजर आते हैं। खारे पानी की झील के ठीक बगल में फैली यह अनूठी हरियाली और ठंडक अब धीरे-धीरे पर्यटकों को भी अपनी ओर खींच रही है। इस अनोखे प्राकृतिक एसी हाउस को देखने के लिए अब दूर-दूर से सैलानी यहां पहुंचने लगे हैं।















