जयपुर में एक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने देश की संवैधानिक संस्थाओं की मौजूदा स्थिति और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश की इन प्रमुख संस्थाओं की गरिमा और साख हर हाल में बरकरार रहनी चाहिए, क्योंकि इनकी विश्वसनीयता के समाप्त होने से लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है। पायलट ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान समय में आम जनता के मन में चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर कई तरह के संदेह उत्पन्न हो रहे हैं, जिन्हें दूर करना आवश्यक है।
लगातार हो रहे हमलों और बदलावों के कारण लोकतांत्रिक संस्थाओं पर से जनता का भरोसा कुछ हद तक कम हुआ है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना सरकार और व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि हर नागरिक का यह विश्वास बना रहे कि उसका वोट पूरी तरह सुरक्षित है और चुनाव प्रक्रिया बिना किसी भेदभाव के निष्पक्ष तरीके से संचालित की जा रही है। पायलट ने याद दिलाया कि भारत को पूरी दुनिया में लोकतंत्र की जननी के रूप में देखा जाता रहा है और हमारे चुनावी तथा लोकतांत्रिक ढांचे का उदाहरण वैश्विक स्तर पर दिया जाता था, लेकिन अब इस पर आंच आ रही है।
संसद में राहुल गांधी के मुद्दों पर हो चर्चा
कांग्रेस नेता ने राहुल गांधी की ओर से संसद में उठाए गए विभिन्न मुद्दों का खुला समर्थन करते हुए कहा कि उन विषयों पर सदन के भीतर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विपक्ष के नेता द्वारा जनता से जुड़े मुद्दे उठाना न केवल उनका राजनीतिक अधिकार है बल्कि एक बड़ा कर्तव्य भी है। हालांकि, संसद में इन विषयों पर बहस होगी या नहीं, यह पूरी तरह से सरकार के रुख पर निर्भर करता है। उन्होंने पुरानी घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि जब जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन कर रहे थे, उस समय भी संसद का सत्र चल रहा था और उन हालात पर सदन के भीतर चर्चा की जा सकती थी। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए आपसी संवाद और विचार-विमर्श का सिलसिला लगातार जारी रहना चाहिए।
चयन प्रक्रिया में बदलाव और निष्पक्षता पर सवाल
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठ रहे तमाम सवालों के बीच सचिन पायलट ने मुख्य रूप से आयोग के चयन की प्रक्रिया में किए गए बदलावों पर तीखे सवाल किए। उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और पारदर्शिता को बनाए रखना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया के दौरान केंद्रीय जांच एजेंसियों जैसे ईडी की कार्रवाई और संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान में लगातार आ रही गिरावट पर गहरी चिंता व्यक्त की। पायलट ने कहा कि महंगाई और बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों से सरकारें और राजनीतिक दल मिलकर निपट सकते हैं, लेकिन देश की मूल संस्थाओं की साख को किसी भी कीमत पर नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
खेल के मैदान और अंपायर की निष्पक्षता की मिसाल
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया पर बात करते हुए सचिन पायलट ने कहा कि यह व्यवस्था साल 1952 से चली आ रही है, लेकिन आज अचानक इस पर इतना बड़ा विवाद और हंगामा क्यों खड़ा हो रहा है, यह सोचने का विषय है। उन्होंने क्रिकेट का उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि किसी खेल में अंपायर ही निष्पक्ष और तटस्थ नहीं होगा, तो वह मुकाबला कभी भी फेयर नहीं हो सकता। हम सब एक निष्पक्ष मुकाबले की उम्मीद करते हैं और इसके लिए पूरी चुनावी प्रक्रिया की साख और विश्वसनीयता का सुरक्षित रहना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि रामलीला मैदान से देश में क्या राजनीतिक माहौल बना है, इसका असर आने वाला समय खुद ब खुद स्पष्ट कर देगा। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि देश की न्यायपालिका और सुप्रीम कोर्ट में उनका पूरा विश्वास है और सत्ता के अहंकार में ताकत दिखाना बिल्कुल सही नहीं है।
संवाद स्थापित करने की पहली जिम्मेदारी सरकार की
देश के युवाओं की स्थिति का जिक्र करते हुए सचिन पायलट ने कहा कि मौजूदा हालातों की वजह से आज देश के नौजवानों के मन में असुरक्षा की भावना तेजी से घर कर रही है, जो राष्ट्रहित में बिल्कुल भी ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी भी मजबूत लोकतंत्र में संवाद सबसे अहम होता है और इस संवाद को शुरू करने की पहली और मुख्य जिम्मेदारी देश की सरकार की होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी हर मोर्चे पर अपना पूरा नियंत्रण और आधिपत्य चाहती है, जिसका विरोध विपक्ष पूरी तरह लोकतांत्रिक तरीकों से कर रहा है। राहुल गांधी भी इसी बड़ी चुनौती का डटकर सामना कर रहे हैं। पायलट ने अंत में कहा कि हम सबकी साझी जिम्मेदारी है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं की गरिमा को बचाकर रखें तथा इतिहास की गलतियों से सबक लेकर एक ऐसा पारदर्शी तंत्र विकसित करें जिस पर हर नागरिक का अटूट भरोसा बना रहे।



















